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राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026: क्या लड़ाकू विमान सौदे में हुआ बड़ा खेल?

राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026

राफेल सौदे की पूरी कहानी अब भी एक गहन राजनीतिक-आर्थिक विवाद का केंद्र बनी हुई है, जहां 2016 में भारत ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान 7.8 बिलियन यूरो (लगभग ₹58,000 करोड़) में खरीदे थे। यह डील इंटर-गवर्नमेंटल समझौते के तहत हुई, लेकिन इसमें Dassault Aviation ने भारतीय ऑफसेट पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को चुना, जबकि HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) जैसे अनुभवी सरकारी संगठन को साइडलाइन कर दिया गया।

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने Mediapart को दिए इंटरव्यू में स्पष्ट कहा था कि भारतीय सरकार ने ही अनिल अंबानी को पार्टनर के रूप में प्रस्तावित किया था, और फ्रांस के पास कोई विकल्प नहीं था। राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026 की नई परतों ने इस विवाद को और हवा दे दी है, जिसे राहुल गांधी और कांग्रेस ने “मोदी-अंबानी की लूट” करार देते हुए क्रोनी कैपिटलिज्म और रिश्वतखोरी का आरोप लगाया है।

फ्रांस की न्यायिक जांच और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

फ्रांस में PNF (नेशनल फाइनेंशियल प्रॉसिक्यूटर) की जांच 2021 से लगातार चल रही है। जज Virginie Tilmont के नेतृत्व में भ्रष्टाचार, पक्षपात और वित्तीय अपराधों की यह जांच फरवरी 2026 तक सक्रिय है। भारत की नई 114 राफेल डील (संभावित ₹3.25 ट्रिलियन) की चर्चाओं के बीच पुरानी डील की छाया हटने का नाम नहीं ले रही है।

जांच का मुख्य केंद्र यह है कि क्या रिलायंस डिफेंस को दिया गया कॉन्ट्रैक्ट किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। फ्रांस के विपक्ष और NGO Sherpa ने इस पर भारी दबाव बनाया है, हालांकि स्ट्रैटेजिक संवेदनशीलता के कारण फ्रेंच सरकार ने सहयोग को सीमित रखा है।

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जूली गाये और फिल्म फंडिंग: निवेश या ‘सॉफ्ट इन्फ्लुएंस’?

फ्रांसीसी जांचकर्ताओं का एक प्रमुख फोकस अनिल अंबानी और जूली गाये (पूर्व राष्ट्रपति ओलांद की पार्टनर) के बीच कथित कनेक्शन पर है। 2016 में, जब राफेल डील फाइनल हो रही थी, अनिल अंबानी की रिलायंस एंटरटेनमेंट ने गाये द्वारा को-प्रोड्यूस की गई फिल्म ‘Tout là-haut’ में 1.6 मिलियन यूरो (लगभग ₹12-13 करोड़) का निवेश किया था।

फरवरी 2026 में गाये से तीन दिनों तक पूछताछ की गई कि क्या यह निवेश राफेल डील में फेवर हासिल करने के लिए था। ओलांद और गाये ने किसी भी लिंक से इनकार किया है, लेकिन यह निवेश ठीक उसी समय हुआ जब ओलांद भारत यात्रा पर थे और MoU साइन हुआ था। राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026 के दस्तावेजों के बीच यह “सॉफ्ट इन्फ्लुएंस” का संदेह जांच को और लंबा खींच रहा है।

एप्स्टीन फाइल्स का खुलासा: अंबानी और जेफरी एप्स्टीन के रिश्ते

अनिल अंबानी का जेफरी एप्स्टीन से कनेक्शन राफेल विवाद को और भी जटिल बनाता है। 2026 में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी एप्स्टीन फाइल्स से पता चलता है कि 2017-2019 के बीच दोनों के बीच नियमित iMessage, ईमेल और मीटिंग्स हुई थीं। इन बातचीत में डिफेंस डील्स, भारत-US रिलेशंस और मोदी सरकार तक पहुंच की बातें शामिल थीं।

एप्स्टीन ने अंबानी को “Modi का आदमी” कहा था और भारत के डिफेंस सेक्टर में कब्जा जमाने की महत्वाकांक्षा जाहिर की थी। राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026 यह भी उजागर करता है कि अंबानी ने एप्स्टीन से $750 मिलियन के लोन और डिफेंस फाइनेंसिंग पर चर्चा की थी, जो उनकी डिफेंस महत्वाकांक्षाओं को और संदिग्ध बनाता है।

ब्रिजिट मैक्रॉन और टैक्स छूट का रहस्यमय विवाद

जांच में एक और अहम बिंदु रिलायंस की फ्रेंच सब्सिडियरी ‘Reliance FLAG Atlantic France’ के टैक्स डेब्ट का है। इमैनुएल मैक्रॉन (जो तब अर्थव्यवस्था मंत्री थे) के कार्यकाल में इस कंपनी के टैक्स को €151 मिलियन से घटाकर मात्र €7.6 मिलियन कर दिया गया था।

हालांकि ब्रिजिट मैक्रॉन (वर्तमान राष्ट्रपति की पत्नी) का नाम किसी विश्वसनीय रिपोर्ट में इस मामले से नहीं जुड़ा है और यह दावा बेबुनियाद लगता है, लेकिन टैक्स में मिली यह भारी छूट जांच के घेरे में है। राफेल-एप्स्टीन कनेक्शन 2026 के इस दौर में भारत सरकार द्वारा फ्रेंच जांचकर्ताओं के दस्तावेज़ अनुरोधों पर कोई प्रतिक्रिया न देना जांच की गति को धीमा कर रहा है।

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नई 114 राफेल डील और पुरानी जांच का साया

फरवरी 2026 में भारत ने 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को मंजूरी दी है, जिसमें Dassault-Reliance JV (DRAL) में लोकल प्रोडक्शन शामिल है। हालांकि, फ्रांस ने SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट के सोर्स कोड ट्रांसफर से इनकार कर दिया है, जो भारत की स्वतंत्र अपग्रेड क्षमता को सीमित करता है।

एक तरफ भारत-फ्रांस के मजबूत डिफेंस टाईज की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ पुराने घोटाले की जांच लटकी तलवार की तरह मोदी सरकार और अंबानी पर मंडरा रही है। ‘The Wire’ की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रेंच जांचकर्ता अभी भी पुरानी अनियमितताओं को खंगालने में जुटे हैं।

क्रोनी कैपिटलिज्म और अनुभवहीनता का सवाल

यह पूरा प्रकरण क्रोनी कैपिटलिज्म का एक क्लासिक उदाहरण माना जा रहा है। बिना किसी एयरोस्पेस अनुभव वाली कंपनी को इतना बड़ा ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट दिया गया, जहां Dassault ने रिलायंस को 94% फंडिंग के साथ 49% स्टेक दिया।

भारत में CBI, ED और सुप्रीम कोर्ट ने 2018-2019 में डील को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन फ्रांस की जांच में पारदर्शिता की कमी और ‘पक्षपात’ के आरोप अब भी बने हुए हैं। अगर जांच निष्पक्ष रहती है, तो ऑफसेट सौदों में हुई अनियमितताओं की कड़वी हकीकत सामने आ सकती है, वरना यह एक और अनसुलझा अंतरराष्ट्रीय घोटाला बनकर रह जाएगा।

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पाप का ज्वालामुखी और भविष्य की चुनौतियां

अंत में, राफेल डील में पारदर्शिता की कमी और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शनों ने जनता के मन में गहरा संदेह पैदा किया है। फ्रांस की जांच अभी भी जारी है और 2026 में नई डील के साथ पुरानी छाया मजबूती से टिकी हुई है। जैसा कि कहा जाता है कि पाप का ज्वालामुखी जरूर फूटेगा, क्योंकि इसकी गर्मी आज भी महसूस की जा रही है।

डिफेंस सेक्टर में क्रोनी इन्फ्लुएंस और भ्रष्टाचार के आरोप बार-बार उभर रहे हैं। तकदीर हर बार साथ नहीं देती और न ही जांच एजेंसियां हमेशा बचाव कर पाती हैं। भारत-फ्रांस के रिश्ते कितने भी मजबूत क्यों न हों, इस घोटाले की आंच राजनीतिक स्तर पर कभी भी भारी पड़ सकती है।

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