ऑपरेशन सिंदूर विवाद पर शशि थरूर का बड़ा बयान, कांग्रेस में बढ़ी रार
ऑपरेशन सिंदूर विवाद केरल में कांग्रेस पार्टी के भीतर आंतरिक घर्षण और खींचतान की खबरें अब खुलकर सामने आने लगी हैं, जिसे राजनीतिक हलकों में ‘कांग्रेस थरूर सिचुएशनशिप’ का नाम दिया गया है। केरल में आगामी चुनावों से पहले एक महत्वपूर्ण पार्टी बैठक को छोड़ने के बाद तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर अपने रुख पर पूरी तरह अडिग नजर आ रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर की दरारों को उजागर कर दिया है, खासकर तब जब पार्टी के कुछ सहयोगियों ने उन्हें ‘अप्रासंगिक’ तक करार दे दिया है।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इस स्थिति पर चुटकी लेते हुए सुझाव दे रही है कि थरूर को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उन्होंने पार्टी की वफादारी से ऊपर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। थरूर ने बेबाकी से स्पष्ट किया है कि वह पार्टी के आंतरिक मामलों पर सार्वजनिक मंचों के बजाय सीधे हाईकमान से बात करेंगे।
केरल लिटरेचर फेस्टिवल में थरूर का बेबाक अंदाज
कोझिकोड में आयोजित केरल लिटरेचर फेस्टिवल (KLF) के मंच से शशि थरूर ने उन तमाम अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की, जिनमें कहा जा रहा था कि उन्होंने संसद में पार्टी के रुख के खिलाफ काम किया है। शनिवार (24 जनवरी) को आयोजित इस सत्र में थरूर ने बार-बार दोहराया कि उन्होंने पार्लियामेंट में अपनी पार्टी की किसी भी बात का उल्लंघन नहीं किया है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर आप मेरे किसी भी पब्लिक स्टेटमेंट को देखें, तो मैंने पार्लियामेंट में अपनी पार्टी की किसी भी बात का उल्लंघन नहीं किया है।” थरूर ने साफ किया कि उनके पूरे संसदीय करियर में केवल एक ही ऐसा विषय रहा है जहाँ सैद्धांतिक मतभेद सार्वजनिक हुए।
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ऑपरेशन सिंदूर विवाद पर थरूर का सख्त स्टैंड
शशि थरूर ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ऑपरेशन सिंदूर विवाद ही वह एकमात्र मुद्दा था जिस पर उनकी अपनी पार्टी के साथ प्रिंसिपल तौर पर असहमति रही थी। कोझिकोड में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस विशेष मुद्दे पर उन्होंने एक “बहुत मजबूत स्टैंड” लिया था और आज भी वह उस पर पूरी तरह कायम हैं।
न्यूज़ एजेंसी PTI के अनुसार, थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्होंने संसद में पार्टी की स्थिति को चुनौती नहीं दी, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी राय रखी थी। उन्होंने गर्व के साथ कहा, “मुझे उस स्टैंड पर कोई अफ़सोस नहीं है,” जो यह दर्शाता है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर अपनी विचारधारा से समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस कॉलम और ‘हिट हार्ड, हिट स्मार्ट’ की नीति
अपने रुख को तार्किक आधार देने के लिए थरूर ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने साप्ताहिक कॉलम का जिक्र किया। 30 अप्रैल, 2025 को प्रकाशित ‘पहलगाम के बाद, भारत को सिर्फ़ कड़ा नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से जवाब देना चाहिए’ शीर्षक वाले इस लेख के माध्यम से उन्होंने अपनी कूटनीतिक सोच को साझा किया।
उन्होंने बताया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद उन्होंने एक ऑब्ज़र्वर, कमेंटेटर और लेखक के रूप में तर्क दिया था कि ऐसे कृत्यों को बिना सजा के नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने उस आर्टिकल में ‘काइनेटिक रिस्पॉन्स’ की वकालत की थी और स्पष्ट कहा था कि भारत को न केवल सख्त, बल्कि समझदारी से पलटवार करना चाहिए।
पहलगाम आतंकी हमला और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल
थरूर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर विवाद के केंद्र में दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं थीं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद उनके स्टैंड में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने दोहराया कि भारत को ऐसे हमलों का कड़ा जवाब देने का पूरा हक है।
हालांकि, एक अनुभवी राजनेता के तौर पर उन्होंने पाकिस्तान के साथ किसी लंबे समय तक चलने वाले सैन्य संघर्ष (Long-term military engagement) में फंसने के खिलाफ चेतावनी भी दी।
थरूर का मानना है कि भारत का प्राथमिक लक्ष्य विकास होना चाहिए, न कि अंतहीन युद्ध। उन्होंने टेरर कैंपों के खिलाफ ‘लिमिटेड और टारगेटेड मिलिट्री एक्शन’ की वकालत की, जिसे बाद में सरकार द्वारा भी अपनाया गया, जिससे उनका तर्क सही साबित हुआ।
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नेहरू के सिद्धांतों और देशहित की प्राथमिकता
अपने संबोधन के दौरान थरूर ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक सवाल — “अगर भारत मर गया, तो कौन जिएगा?” — को कोट किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब देश की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख दांव पर लगी हो, तो राष्ट्रीय हित को राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर रखा जाना चाहिए।
थरूर ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर विवाद उनके लिए पार्टी पॉलिटिक्स का नहीं बल्कि सीधे तौर पर नेशनल सिक्योरिटी का मामला था। उनके अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को जिम्मेदारी और देशहित की भावना से देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक चश्मे से।
पार्टी की अंदरूनी बैठकों और मीडिया अटकलों पर स्पष्टीकरण
हाल ही में दिल्ली में कांग्रेस की एक अहम बैठक में थरूर की गैर मौजूदगी को लेकर काफी विवाद हुआ था। इस पर टिप्पणी करते हुए थरूर ने कहा कि यह एक लिटरेरी फेस्टिवल है, कोई राजनीतिक घोषणाओं का प्लेटफॉर्म नहीं। उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी के अंदरूनी मामलों पर वह सार्वजनिक रूप से कोई सफाई नहीं देंगे।
उन्होंने मीडिया में चल रही अटकलों को स्वीकार करते हुए कहा कि कुछ रिपोर्ट सही हो सकती हैं और कुछ गलत, लेकिन उन्होंने नेतृत्व को अपनी अनुपस्थिति के बारे में पहले ही सूचित कर दिया था। थरूर ने एक स्पष्ट रेखा खींचते हुए कहा कि जो भी चिंताएं होंगी, वे सीधे पार्टी लीडरशिप के सामने सही फोरम पर उठाई जाएंगी।
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थरूर की अडिगता और भविष्य की राह
अंततः, शशि थरूर ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि भले ही ऑपरेशन सिंदूर विवाद पर उनकी राय पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रही हो, लेकिन उनका उद्देश्य हमेशा देश का हित रहा है। उन्होंने कांग्रेस के ऑफिशियल स्टैंड के खिलाफ कभी काम करने की बात को सिरे से खारिज कर दिया।
अब देखना यह होगा कि केरल कांग्रेस के भीतर उनके विरोधी उन्हें ‘अप्रासंगिक’ बताने की कोशिश जारी रखते हैं या पार्टी हाईकमान उनके अनुभवों और स्वतंत्र विचारों को चुनाव से पहले एकजुट करने का कोई रास्ता निकालता है। फिलहाल, थरूर अपने स्टैंड पर कायम हैं और झुकने को तैयार नहीं हैं।
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