सोशल मीडिया अभिव्यक्ति विवाद में प्रोफेसर को सुप्रीम कोर्ट से राहत
प्रोफेसर अली खान की गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया अभिव्यक्ति विवाद को शैक्षणिक स्वतंत्रता के मुद्दे से जोड़ दिया है। 21 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को ऑपरेशन सिंदूर पर सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर अंतरिम जमानत दी, लेकिन साथ ही “राष्ट्रीय संकट के समय जिम्मेदार भाषा” की चेतावनी भी दी। कोर्ट ने जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया, वहीं शब्द चयन पर आपत्ति जताई।
- सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत मंजूर की
- “डॉग व्हिसलिंग” कहकर आलोचना की
- राष्ट्रीय संकट में जिम्मेदारी की आवश्यकता पर जोर
- जांच पर रोक से इनकार, SIT गठन का निर्देश
ऑपरेशन सिंदूर पोस्ट पर गिरफ्तारी
18 मई को हरियाणा पुलिस ने महमूदाबाद को BNS की धारा 152 के तहत बिना ट्रांजिट रिमांड गिरफ्तार किया। यह धारा राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा से जुड़ी है।
- प्रेस ब्रीफिंग की आलोचना से विवाद शुरू
- दो FIR राई थाने में दर्ज
- महिला आयोग और गांव सरपंच की शिकायत
- सोशल मीडिया पोस्ट पर देश की अखंडता को खतरा बताया गया
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई : प्रमुख तर्क
- अंतरिम जमानत की शर्तें:
- कोर्ट ने प्रोफेसर को सीजेएम सोनीपत के समक्ष जमानत बॉन्ड जमा करने और पासपोर्ट जब्त करने की शर्त पर रिहाई का आदेश दिया।
- उन्हें सोशल मीडिया पर टिप्पणी न करने और “भारत द्वारा सामना किए गए आतंकी हमले या उसकी प्रतिक्रिया” पर बयान देने से रोक लगाई गई।
- कोर्ट की आपत्तियाँ:
- जस्टिस कांत ने टिप्पणी की: “राक्षस आए, देश पर हमला हुआ, और आप प्रोफेसर बनकर ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं?” उन्होंने इसे “सस्ती लोकप्रियता की कोशिश” बताया।
- हालांकि, वकील कपिल सिब्बल ने जोर देकर कहा कि पोस्ट “देशभक्तिपूर्ण” थी और जय हिंद के साथ समाप्त हुई।
SIT जांच का आदेश, रोक से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के डीजीपी को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल गठित करने का आदेश दिया है। टीम का नेतृत्व IG रैंक का अधिकारी करेगा। कोर्ट ने जांच रोकने की मांग ठुकरा दी।
- हरियाणा पुलिस को निर्देश
- IG स्तर की SIT बनाई जाएगी
- जांच पर रोक लगाने से इनकार
- कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की बात कही
विवादित पोस्ट : क्या कहा गया था?
प्रोफेसर महमूदाबाद ने इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लिखा था:
- “दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल सोफिया की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन मॉब लिंचिंग पीड़ितों के लिए आवाज नहीं उठाते… यह पाखंड है।”
- उन्होंने भारत की विविधता की प्रशंसा करते हुए “जय हिंद” लिखा, लेकिन सेना की प्रेस ब्रीफिंग को “आभासी” बताया।
आरोप :
- भाजपा युवा विंग ने शिकायत दर्ज कराई कि यह टिप्पणी “सेना की गरिमा” को ठेस पहुँचाती है।
- हरियाणा महिला आयोग ने भी एफआईआर दर्ज की, जिसमें “महिला अधिकारियों के प्रति अपमानजनक भाषा” का उल्लेख था।
कानूनी विवाद : गिरफ्तारी प्रक्रिया पर सवाल
- प्रोफेसर को बिना ट्रांजिट रिमांड यूपी ले जाया गया, जो कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन माना जा रहा है।
- दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले ही इस गिरफ्तारी को “असंतुलित” बताया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जांच रोकने से इनकार कर दिया।
अशोका यूनिवर्सिटी के छात्र-शिक्षक समर्थन में
अशोका यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों ने इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता का घोर उल्लंघन बताया। विद्यार्थियों ने महमूदाबाद के समर्थन में बयान जारी किया।
- “कवियों को निर्वासित करो” कोर्स के छात्र एकजुट
- महमूदाबाद को करुणा और स्वतंत्रता का प्रतीक बताया
- शिक्षकों ने गिरफ्तारी को निराधार बताया
- JNU शिक्षक संघ और अन्य संस्थानों का समर्थन
राजनीतिक और शैक्षणिक प्रतिक्रियाएँ
- कांग्रेस की आलोचना:
- पवन खेरा ने कहा कि भाजपा मंत्री (जगदीश देवड़ा, विजय शाह) के विवादित बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि एक शिक्षाविद को लक्षित किया गया।
- अशोका यूनिवर्सिटी का समर्थन:
- छात्रों ने “कवियों को निर्वासित करो” कोर्स के तहत विरोध प्रदर्शन किया। शिक्षक संघ ने इसे “शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमला” बताया।
- सेना की प्रतिष्ठा बनाम अभिव्यक्ति:
- सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि “अभिव्यक्ति का अधिकार है, लेकिन शब्दों का चयन सावधानी से होना चाहिए”।
UAPA और जमानत के मामले
- 14 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामले में एक आरोपी की जमानत बरकरार रखी, यह कहते हुए कि “मोबाइल में आतंकवादी तस्वीरें होना अपराध नहीं”5।
- इसके विपरीत, प्रोफेसर के मामले में कोर्ट ने SIT जांच पर जोर दिया, जो दर्शाता है कि सेना से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता अधिक है1।
लोकतंत्र में संतुलन की चुनौती
यह मामला दो मूलभूत प्रश्न उठाता है :
- क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अभिव्यक्ति पर रोक जायज है?
- क्या शैक्षणिक विमर्श और सरकारी आलोचना को “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जा सकता है?
- सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी अहम
- अभिव्यक्ति का अधिकार, लेकिन मर्यादा भी जरूरी
- जांच की निष्पक्षता की निगरानी ज़रूरी
- विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता की बहस फिर केंद्र में
सोशल मीडिया अभिव्यक्ति विवाद ने देश में सिविल स्पेस और सहिष्णुता के स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान के बीच एक नाजुक संतुलन बनाता है। अगले चरण में SIT की रिपोर्ट और विचारण न्यायालय का फैसला ही इस बहस को अंतिम रूप देगा।



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