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9 मार्च को फैसला: स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बढ़ा सस्पेंस

स्पीकर के खिलाफ अविश्वास

स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर जारी सियासी घमासान के बीच एक बड़ा अपडेट सामने आया है। विपक्षी सांसदों द्वारा लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने की मांग वाले नोटिस में लोकसभा सचिवालय ने कई गंभीर “कमियां” और प्रोसीजरल खामियां पाई हैं। सदन के अधिकारियों के अनुसार, यह नोटिस तकनीकी रूप से इतना कमजोर था कि इसे सीधे खारिज किया जा सकता था।

सूत्रों के मुताबिक, मंगलवार को लोकसभा सेक्रेटरी जनरल उत्पल कुमार सिंह को जो नोटिस सौंपा गया, उसमें वर्तमान समय के बजाय फरवरी 2025 की घटनाओं का चार बार जिक्र किया गया था।

नियमों के मुताबिक, भविष्य की या गलत तारीखों के आधार पर दिया गया नोटिस खारिज किया जा सकता है, लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने उदारता और नैतिकता का परिचय देते हुए इसे रिजेक्ट करने के बजाय सेक्रेटेरिएट को निर्देश दिया है कि इसमें सुधार किया जाए और तय प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ा जाए।

नियमों की अनदेखी और तारीखों की बड़ी चूक

लोकसभा सचिवालय के अधिकारियों ने बताया कि 118 विपक्षी सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित इस नोटिस में “2 फरवरी 2026” की वास्तविक घटनाओं के स्थान पर बार-बार “2 फरवरी 2025” लिखा गया था। यह गलती एक बार नहीं बल्कि पूरे डॉक्यूमेंट में चार बार दोहराई गई थी।

नियमावली के तहत स्पीकर के पास यह अधिकार था कि वे इस दोषपूर्ण नोटिस को तुरंत निरस्त कर देते, लेकिन बिरला ने सेक्रेटेरिएट से कहा कि वे विपक्षी सांसदों की मदद करें ताकि नोटिस को निर्धारित फॉर्मेट और मंजूरी के क्राइटेरिया के हिसाब से ठीक किया जा सके। स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का संशोधित वर्जन अब बजट सत्र के दूसरे फेज में पेश होने की उम्मीद है, जिसकी जांच सचिवालय द्वारा पूरी तेजी से की जाएगी।

नैतिकता के आधार पर ओम बिरला का बड़ा फैसला

इस पूरे विवाद के बीच लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने एक उच्च नैतिक मिसाल कायम की है। उन्होंने घोषणा की है कि जब तक उनके खिलाफ लाए गए इस मोशन का पूर्ण रूप से समाधान नहीं हो जाता, तब तक वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे और न ही स्पीकर की कुर्सी पर बैठेंगे। बिरला ने स्पष्ट किया कि जब उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं, तो वे चाहते हैं कि सदन पहले इस प्रस्ताव पर चर्चा करे और अपना फैसला सुनाए।

उन्होंने सेक्रेटेरिएट को “नियमों के हिसाब से तुरंत कार्रवाई” करने का आदेश दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे मामले में प्रक्रियात्मक देरी के पक्ष में नहीं हैं। अब उनकी अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही डिप्टी स्पीकर या चेयरपर्सन पैनल के सदस्यों द्वारा संचालित की जाएगी।

विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के गंभीर आरोप

विपक्षी पार्टियों, विशेषकर कांग्रेस के नेतृत्व में दिए गए इस नोटिस में स्पीकर पर “खुलेआम पक्षपात” करने और अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करने के आरोप लगाए गए हैं। कांग्रेस के डिप्टी लीडर गौरव गोगोई, चीफ व्हिप के. सुरेश और मोहम्मद जावेद द्वारा संविधान के आर्टिकल 94(c) के तहत यह नोटिस दिया गया है।

विपक्ष का दावा है कि सदन में उनकी आवाज दबाई जा रही है और विपक्षी नेताओं को बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है। स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में चार मुख्य घटनाओं का उल्लेख है, जिसमें सबसे प्रमुख आरोप यह है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान टोक कर बोलने से रोका गया।

सदन में बढ़ते तनाव और सस्पेंशन का मुद्दा

विपक्ष द्वारा जमा किए गए इस नोटिस में केवल राहुल गांधी का मुद्दा ही नहीं, बल्कि आठ सांसदों के सस्पेंशन और बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की उन टिप्पणियों का भी जिक्र है जिन्हें “पूर्व प्रधानमंत्रियों पर निजी हमला” बताया गया है। नोटिस में उस घटना का भी उल्लेख है जब राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित यादों का जिक्र करने की कोशिश की थी, जिसे नियमों के विरुद्ध बताते हुए रिकॉर्ड से हटा दिया गया था।

इसके अलावा, विपक्षी सांसद बिरला के उस बयान से भी नाराज हैं जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सदन में न आने की सलाह दी थी ताकि “अप्रिय घटना” से बचा जा सके, क्योंकि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद पीएम की सीट के पास जाकर हंगामा कर सकते हैं।

संवैधानिक प्रावधान और 9 मार्च की समयसीमा

भारतीय संविधान के आर्टिकल 94(c) के तहत स्पीकर को हटाने का प्रावधान है, जबकि आर्टिकल 96 उन्हें अपना बचाव करने का अधिकार देता है। नियमों के अनुसार, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को चर्चा के लिए कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। यदि प्रस्ताव चर्चा के लिए मंजूर हो जाता है, तो इस पर 9 मार्च को बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन बहस होने की संभावना है।

हालांकि संविधान स्पीकर को चर्चा के दौरान सदन में रहने और वोट देने की अनुमति देता है (टाई की स्थिति को छोड़कर), लेकिन बिरला ने अपनी मर्जी से तब तक सदन से बाहर रहने का फैसला किया है जब तक लोकसभा उन पर अपना भरोसा फिर से नहीं जता देती।

विपक्षी एकता में दरार: टीएमसी का अलग रुख

भले ही 118 सांसदों ने इस नोटिस पर साइन किए हों, लेकिन ‘INDIA’ गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया है। टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने तर्क दिया है कि अविश्वास प्रस्ताव जैसा कड़ा कदम उठाने से पहले विपक्ष को सीधे स्पीकर के पास अपनी शिकायतें लेकर जाना चाहिए था और उन्हें सुधार के लिए समय देना चाहिए था।

उन्होंने संकेत दिया कि यदि दो-तीन दिनों में शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती, तब पार्टी इस नोटिस पर विचार करेगी। इसके अलावा, एनडीए के पास 293 सीटों का स्पष्ट बहुमत है, जिससे इस प्रस्ताव का गिरना लगभग तय माना जा रहा है।

बजट सत्र के दूसरे फेज में सियासी टकराव के आसार

वर्तमान में चल रहे बजट सत्र में यह अविश्वास प्रस्ताव एक नया राजनीतिक पहलू जोड़ चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते तनाव के कारण प्रधानमंत्री का जवाब भी रद्द करना पड़ा था। अब सबकी नजरें 9 मार्च पर टिकी हैं जब सदन दोबारा बैठेगा। लोकसभा सचिवालय ने साफ किया है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का रिवाइज्ड नोटिस मिलते ही उसकी तुरंत जांच की जाएगी।

यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष तकनीकी खामियों को सुधार कर सदन में बहुमत का सामना कर पाएगा या यह कदम केवल एक प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा। बिरला का कहना है कि वे कार्यवाही की अध्यक्षता तभी करेंगे जब सदन उन पर फिर से अपना विश्वास व्यक्त करेगा।

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