बिल्डरों की ‘ढाल’ बना कानून? सुप्रीम कोर्ट बोला- RERA खत्म करना बेहतर
RERA खत्म करना बेहतर है, क्योंकि यह संस्था उन लोगों की मदद करने में नाकाम रही है जिनके लिए इसे बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के काम करने के तरीके पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए यह तीखी टिप्पणी की। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि राज्यों को RERA एक्ट लाने के पीछे के असली मकसद पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की मदद करने के अलावा, यह संस्था कुछ और नहीं कर रही है। बेंच ने बार एंड बेंच के हवाले से कहा कि जिन लोगों के लिए यह संस्था बनाई गई थी, वे आज पूरी तरह से उदास, निराश और हताश हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब घर खरीदने वालों को कोई प्रभावी राहत नहीं मिल रही, तो यह संस्था आखिर किसके लिए काम कर रही है?
बिल्डरों के लिए ‘ढाल’ बनी संस्था: चीफ जस्टिस की कड़ी चेतावनी
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि अब समय आ गया है कि सभी राज्य इस अथॉरिटी के गठन पर फिर से सोचें। उन्होंने टिप्पणी की कि “सभी राज्यों को अब उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जिनके लिए RERA संस्था बनाई गई थी। डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की मदद करने के अलावा, यह कुछ और नहीं कर रहा है। इस संस्था को खत्म कर देना ही बेहतर है।”
कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाने और खरीदारों की सुरक्षा के लिए 2016 में बने इस एक्ट का जमीनी असर उम्मीदों से बहुत कम रहा है। बेंच ने अपनी टिप्पणियों में कहा कि RERA कंज्यूमर्स से ज्यादा उन बिल्डरों को सुविधा दे रहा है जो प्रोजेक्ट में देरी करते हैं और खरीदारों से किए गए वादों को पूरा नहीं करते हैं।
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हिमाचल प्रदेश RERA ऑफिस शिफ्टिंग विवाद और सुप्रीम कोर्ट का दखल
सुप्रीम कोर्ट की यह अहम टिप्पणी तब आई जब टॉप कोर्ट हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें राज्य सरकार के एक नोटिफिकेशन पर रोक लगा दी गई थी। राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश RERA ऑफिस को शिमला से धर्मशाला शिफ्ट करने का फैसला लिया था।
हाई कोर्ट ने 13 जून, 2025 के नोटिफिकेशन पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि यह फैसला बिना किसी वैकल्पिक ऑफिस की जगह की पहचान किए लिया गया है। हाई कोर्ट ने 18 आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य और RERA के कामकाज ठप होने पर भी चिंता जताई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हाई कोर्ट के स्टे ऑर्डर को खारिज कर दिया और राज्य सरकार को ऑफिस धर्मशाला ले जाने की अनुमति दे दी।
शिमला में भीड़ कम करने के लिए प्रशासनिक फैसला: राज्य सरकार की दलील
एडवोकेट सुगंधा आनंद के जरिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में राज्य सरकार ने तर्क दिया कि RERA ऑफिस को शिमला से धर्मशाला शिफ्ट करने का फैसला पूरी तरह से प्रशासनिक वजहों से लिया गया था ताकि शिमला शहर में “भीड़ कम” की जा सके। सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने बेंच को बताया कि सरकार इस संस्था को धर्मशाला में स्थापित करना चाहती है।
वहीं, विरोध करने वाले वकीलों का तर्क था कि अथॉरिटी के 90 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स और 92 प्रतिशत पेंडिंग शिकायतें शिमला, सोलन, परवाणू और सिरमौर जिलों से हैं, जो आपस में 40 किमी के दायरे में हैं। इसके बावजूद कोर्ट ने सरकार के पॉलिसी फैसले का समर्थन किया और कहा कि शिमला “पूरी तरह से खत्म हो चुका है” और राज्य को धर्मशाला व पालमपुर जैसे नए शहरों को विकसित करने का अधिकार है।
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रिहैबिलिटेशन सेंटर बन गई हैं अथॉरिटीज: जजों का कड़ा प्रहार
बेंच ने एक और चौंकाने वाली टिप्पणी करते हुए कहा कि लगभग हर राज्य में RERA जैसी संस्थाएं रिटायर्ड IAS अधिकारियों के लिए एक “रिहैबिलिटेशन सेंटर” (पुनर्वास केंद्र) बन गई हैं। बेंच ने कहा कि इन सभी अथॉरिटीज पर इन्हीं लोगों का कब्जा है। कोर्ट की इस टिप्पणी ने कानून को लागू करने वाली मशीनरी की गंभीरता पर सवाल उठा दिए हैं।
जजों ने कहा कि गलत डेवलपर्स के खिलाफ कड़े कदम उठाने के बजाय, अक्सर उन्हें मदद पहुंचाई जाती है, जिससे घर खरीदने वाले लंबी कानूनी लड़ाई में फंस जाते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर RERA खरीदारों के हितों की रक्षा नहीं कर सकता, तो RERA खत्म करना बेहतर होगा, क्योंकि इसके वर्तमान स्वरूप से आम जनता को कोई खास राहत नहीं मिल पा रही है।
धर्मशाला शिफ्ट होगा अपीलेट ट्रिब्यूनल: खरीदारों की सुविधा का निर्देश
यह सुनिश्चित करने के लिए कि RERA के आदेशों से प्रभावित लोगों को कोई परेशानी न हो, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य अपीलेट ट्रिब्यूनल को भी धर्मशाला शिफ्ट किया जाए। बेंच ने कहा कि अपील करने का अधिकार प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, शिमला से धर्मशाला के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज को ट्रांसफर किया जा सकता है। इससे पहले 9 फरवरी को एक अलग मामले में कोर्ट ने ओबीसी कमीशन को शिफ्ट करने पर लगी रोक को भी रद्द कर दिया था।
कोर्ट ने कहा कि राज्य को अपनी पसंद की जगह पर ऑफिस चलाने की अनुमति है, लेकिन इसके कामकाज की गुणवत्ता और खरीदारों को मिलने वाली राहत सबसे ऊपर होनी चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि अगर कानून डिफॉल्टरों के लिए ढाल बनता रहा, तो RERA खत्म करना बेहतर विकल्प होगा।
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अधूरे प्रोजेक्ट्स और खरीदारों का दर्द: कानून के असली मकसद से भटकाव
रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 का मुख्य उद्देश्य सेक्टर को रेगुलेट करना, पारदर्शिता बढ़ाना और समय पर प्रोजेक्ट डिलीवरी सुनिश्चित करना था। कोर्ट ने अफसोस जताते हुए कहा कि आज खरीदार शिकायत करते हैं कि उन्हें सालों तक इंतजार करना पड़ता है और रेगुलेटर के होने के बावजूद उन्हें कोई प्रभावी उपाय नहीं मिलता।
बेंच ने कमजोर लागू करने के तरीकों और RERA के आदेशों का पालन न किए जाने पर चिंता जताई। कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि RERA खत्म करना बेहतर है अगर राज्य सरकारें इन अथॉरिटीज को मजबूत नहीं करतीं। कोर्ट ने कहा कि डेवलपर्स बिना किसी डर के डिफॉल्ट करते रहते हैं, जबकि खरीदार एक ऐसी संस्था के चक्कर काटते रहते हैं जिसे उनकी मदद के लिए बनाया गया था।
भविष्य की राह: राज्य सरकारों पर दबाव और सुधार की जरूरत
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कानून को आधिकारिक रूप से रद्द नहीं किया है, लेकिन उसकी मौखिक टिप्पणियां कानून को चलाने के तरीके पर बढ़ती न्यायिक निराशा का प्रमाण हैं। कोर्ट की इन बातों से राज्य सरकारों पर अपनी रेगुलेटरी अथॉरिटीज को मजबूत करने और कानून को सख्ती से लागू करने का भारी दबाव बढ़ेगा।
जजों ने सलाह दी कि सरकार को पर्यावरण के अनुकूल आर्किटेक्ट्स की सेवाएं लेनी चाहिए जो धर्मशाला और पालमपुर जैसे क्षेत्रों के लिए विकास की योजना बना सकें। अंत में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का वादा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगर यह संस्था आम आदमी के लिए उम्मीद की किरण नहीं बन सकती, तो ऐसी स्थिति में RERA खत्म करना बेहतर साबित हो सकता है।
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