UP में अविमुक्तेश्वरानंद पर POCS केस: क्या अब जेल जाएंगे बड़े शंकराचार्य?
अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस दर्ज करने का आदेश आज उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका से लेकर देश के धार्मिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बन गया है।
शनिवार, 21 फरवरी 2026 को प्रयागराज की एक विशेष पोक्सो कोर्ट ने ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके एक शिष्य के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का ऐतिहासिक आदेश दिया। यह मामला एक नाबालिग के कथित यौन शोषण और शोषण से संबंधित है, जिसने धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कोर्ट ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए और कानून के अनुसार उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इस आदेश के बाद पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया है और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए विशेष टीम का गठन किया जा रहा है।
नाबालिग का आरोप और शिष्य की भूमिका: प्रयागराज कोर्ट में क्या हुआ?
इस अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस की जड़ें उन आरोपों में छिपी हैं जो एक नाबालिग पीड़ित और उसके परिवार द्वारा लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि न केवल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बल्कि उनके एक करीबी शिष्य ने भी पद और प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए शोषण किया।
कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों और प्रारंभिक बयानों के आधार पर न्यायाधीश ने माना कि मामला प्रथम दृष्टया जांच के योग्य है। यह आदेश सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन पर आया है, जहाँ पीड़ित पक्ष ने पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करने की स्थिति में अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत की इस टिप्पणी ने कि ‘कानून से ऊपर कोई नहीं है’, साफ कर दिया है कि आने वाले दिन स्वामी और उनके समर्थकों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का इनकार: “यह छवि खराब करने की एक गहरी साजिश है”
जैसे ही अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस की खबर फैली, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण भी सामने आ गया। उन्होंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक ‘गहरी साजिश’ करार दिया है।
उनके समर्थकों का दावा है कि स्वामी जी ने हमेशा हिंदू धर्म और परंपराओं के लिए मुखर होकर बात की है, जिसके कारण उनके कई दुश्मन बन गए हैं।
स्वामी जी ने कहा कि वे न्यायपालिका का सम्मान करते हैं और जांच में पूरा सहयोग करेंगे, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ लोग उनकी धार्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने के लिए ऐसे घिनौने हथकंडे अपना रहे हैं। उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उच्च न्यायालय जाने का भी संकेत दिया है।
पोक्सो कानून की गंभीरता: गिरफ्तारी और सजा के कड़े प्रावधान
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस का चलना बहुत मायने रखता है क्योंकि ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO) के तहत जमानत मिलना बेहद कठिन होता है।
इस कानून में आरोपी को तब तक दोषी माना जाता है जब तक कि वह अपनी बेगुनाही साबित न कर दे। यदि आरोप साबित होते हैं, तो इसमें आजीवन कारावास और कड़ी सजा के प्रावधान हैं। पुलिस अब नाबालिग के बयान दर्ज करने और मेडिकल जांच की प्रक्रिया शुरू करेगी।
कानून के जानकार यह भी कह रहे हैं कि ऐसे मामलों में देरी से FIR दर्ज होना भी एक चुनौती होती है, लेकिन कोर्ट का रुख देखकर लगता है कि साक्ष्यों को बहुत बारीकी से परखा जाएगा।
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धर्म और कानून की जंग: सोशल मीडिया पर बंटी जेन-जी और मिलेनियल्स की राय
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस को लेकर बहस छिड़ गई है। युवाओं का एक वर्ग, जो पारदर्शिता और जवाबदेही में विश्वास रखता है, कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहा है।
उनका तर्क है कि कोई भी चोला या पद किसी को कानून से छूट नहीं दिला सकता। वहीं, दूसरी तरफ स्वामी जी के युवा अनुयायी इसे ‘हिंदू विरोधी ताकतों’ का काम बता रहे हैं। एक्स (X) और इंस्टाग्राम पर #POCSO और #JusticeForMinor जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
जेन-जी की राय इस मामले में बहुत स्पष्ट है कि धार्मिक संस्थानों के भीतर ‘सेफ स्पेस’ होना चाहिए और किसी भी प्रकार के शोषण के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जानी चाहिए।
यूपी पुलिस की कार्रवाई: प्रयागराज से लेकर आश्रमों तक गहन तलाशी की तैयारी
कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस की फाइल तैयार कर ली है। वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि संबंधित थाने को FIR दर्ज करने के आदेश भेज दिए गए हैं।
पुलिस अब उन स्थानों की रेकी करेगी जहाँ कथित तौर पर यह घटना हुई थी। साक्ष्यों को सुरक्षित करना पुलिस की पहली प्राथमिकता है ताकि कोर्ट में मामला मजबूती से रखा जा सके।
इसके साथ ही, स्वामी जी के आश्रमों में मौजूद अन्य लोगों से भी पूछताछ की जा सकती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ऐसी कोई अन्य घटना भी हुई थी। पुलिस की साइबर सेल उन डिजिटल सबूतों को भी खंगाल रही है जो पीड़ित पक्ष द्वारा पेश किए गए हैं।
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धार्मिक जगत की चुप्पी और समर्थन: अन्य संतों का क्या है कहना?
अविमुक्तेश्वरानंद पर पोक्सो केस ने अन्य अखाड़ों और संतों को भी इस पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। जहाँ कुछ संतों ने स्वामी जी का समर्थन किया है, वहीं कई प्रमुख धार्मिक नेता अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब देश के कई प्रसिद्ध गुरु पहले से ही कानूनी पचड़ों में फंसे हुए हैं। धार्मिक सभाओं में इस बात पर चर्चा हो रही है कि ऐसे आरोपों से पूरे संत समाज की छवि धूमिल होती है।
कुछ विद्वानों का कहना है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी को अपराधी मानना गलत है, लेकिन न्याय प्रक्रिया में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
सत्य की खोज और न्यायपालिका की सर्वोच्चता
अंततः, यह मामला धर्म की मर्यादा और कानून की शक्ति के बीच एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO केस केवल एक व्यक्ति के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस अटूट विश्वास के बारे में है जो करोड़ों लोग अपने गुरुओं पर रखते हैं। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए बंधी है ताकि वह केवल सत्य को देख सके, न कि आरोपी के पद या प्रतिष्ठा को।
प्रयागराज कोर्ट का यह आदेश उसी सत्य की खोज की दिशा में एक बड़ा कदम है। आशा करते हैं कि जांच पारदर्शी होगी और जो भी सच हो, वह दुनिया के सामने आएगा ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके और कानून का इकबाल बुलंद रहे।
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