ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति: WHO से अमेरिका का ऐतिहासिक विच्छेद
वॉशिंगटन/जिनेवा: विश्व स्वास्थ्य जगत में 22 जनवरी 2026 की तारीख एक बड़े भू-राजनीतिक भूकंप के रूप में दर्ज की गई है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को अमली जामा पहनाते हुए अमेरिका अब औपचारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर हो गया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन, 20 जनवरी 2025 को एक कार्यकारी आदेश (E.O. 14155) जारी कर इस प्रक्रिया की नींव रखी थी। ट्रंप प्रशासन का यह कदम COVID-19 महामारी के दौरान WHO की कथित विफलताओं, संगठन पर चीन के अत्यधिक प्रभाव और इसके बढ़ते राजनीतिकरण के कड़े विरोध पर आधारित है। 1948 में संगठन की स्थापना के बाद यह पहला मौका है जब अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश इस वैश्विक मंच से पूरी तरह अनुपस्थित रहेगा।
संप्रभुता की रक्षा या वैश्विक जिम्मेदारी से पीछे हटना?
अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा मंत्री रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर और विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस निकासी को “अमेरिकी संप्रभुता की रक्षा” के लिए एक अनिवार्य कदम बताया है। बयान में स्पष्ट किया गया कि यह फैसला “अमेरिकी जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा” सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है।
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के समर्थकों का तर्क है कि WHO अब एक “चीन-समर्थित” और “भ्रष्ट” संस्था बन चुका है, जिसने महामारी के शुरुआती दौर में चीन द्वारा दी गई भ्रामक जानकारियों को बिना किसी वैज्ञानिक चुनौती के स्वीकार कर लिया।
हालांकि, वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दलील से सहमत नहीं हैं; उनका मानना है कि यह केवल एक संगठन का त्याग नहीं, बल्कि भविष्य की महामारियों के खिलाफ साझा वैश्विक ढाल को कमजोर करना है।
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बकाया भुगतान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की पेचीदगियां
आर्थिक मोर्चे पर यह अलगाव काफी विवादित रहा है। अमेरिका ऐतिहासिक रूप से WHO का सबसे बड़ा फंडर रहा है, लेकिन इस निकासी के साथ ही वह $260 मिलियन (2024-2025 का हिस्सा) से अधिक का बकाया छोड़ गया है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, पूर्ण निकासी के लिए बकाया चुकाना अनिवार्य है, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने फंडिंग पूरी तरह रोककर इसे अंतिम घोषित कर दिया है।
यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वैश्विक मंच पर अमेरिका की छवि एक “डिफॉल्टर” के रूप में उभर सकती है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत प्रशासन का दावा है कि वे अब द्विपक्षीय समझौतों, जैसे भारत और इज़राइल के साथ स्वास्थ्य साझेदारी, के माध्यम से कहीं अधिक प्रभावी नेतृत्व प्रदान करेंगे।
वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा नेटवर्क में बड़ा छेद
अमेरिका के हटने से WHO के वार्षिक बजट में लगभग $500 मिलियन की भारी कटौती होगी, जो संगठन की पोलियो उन्मूलन, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और आपातकालीन दवा वितरण जैसी बुनियादी गतिविधियों को सीधे प्रभावित करेगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि फ्लू वैक्सीन के स्ट्रेन चुनने और रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग के वैश्विक नेटवर्क से अलग होकर अमेरिका खुद को जोखिम में डाल रहा है।
यह निकासी ‘वैक्सीन असमानता’ को और गहरा करेगी, जहाँ गरीब देश संसाधनों के अभाव में पिछड़ जाएंगे। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कैलिफोर्निया जैसे कुछ अमेरिकी राज्यों ने संघीय नीति के विपरीत जाकर स्वतंत्र रूप से WHO के रोग नेटवर्क से जुड़े रहने की कोशिश की है।
रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर की भूमिका और वैज्ञानिक संशयवाद
इस पूरी प्रक्रिया में स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर की भूमिका सबसे बड़ी विडंबना मानी जा रही है। एक प्रमुख ‘एंटी-वैक्सीन एक्टिविस्ट’ के रूप में पहचान रखने वाले कैनेडी, जिन्होंने अतीत में टीकों को “जहर” तक कहा है, अब अमेरिका की स्वास्थ्य नीति का नेतृत्व कर रहे हैं।
उनकी अगुवाई में HHS ने WHO पर अपने मूल मिशन से भटकने का आरोप लगाया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अब अमेरिका के भीतर बचपन के टीकाकरण शेड्यूल को कम करने के प्रयास हो रहे हैं। यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक राजनीतिक युद्धक्षेत्र बना रही है, जहाँ वैज्ञानिक तथ्यों के स्थान पर संदेह और राष्ट्रवाद को प्राथमिकता दी जा रही है।
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सोशल मीडिया और वैश्विक कूटनीति पर तीखी प्रतिक्रिया
इस ऐतिहासिक फैसले पर दुनिया भर से मिली-जुली और तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। जहाँ एक ओर X (पूर्व में ट्विटर) पर ट्रंप समर्थक इसे “भ्रष्ट WHO से मुक्ति” बता रहे हैं, वहीं यूरोपीय संघ और चीन ने इसे अमेरिकी नेतृत्व की हार करार दिया है।
अल-जजीरा और एनबीसी न्यूज जैसे मीडिया संस्थानों ने इसे “खतरनाक” बताया है, जबकि फॉक्स न्यूज ने इसे ट्रंप की एक और बड़ी जीत पेश किया है।
WHO के महानिदेशक ने भी गहरी चिंता जताते हुए कहा कि अमेरिका की अनुपस्थिति वैश्विक सहयोग को अपूरणीय क्षति पहुँचाएगी और इसका फायदा उठाकर चीन जैसे देश संगठन में अपनी पकड़ और मजबूत कर सकते हैं।
भविष्य की महामारियां और अलगाववाद की चुनौती
आलोचकों का तर्क है कि यदि ट्रंप प्रशासन वास्तव में सुधार चाहता था, तो वह संगठन के भीतर रहकर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए दबाव बना सकता था। संगठन को बीच रास्ते में छोड़ देना “अल्पदृष्टि” का परिचायक है।
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने अमेरिका को वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक “अकेला योद्धा” बनाने की कोशिश की है, लेकिन इतिहास गवाह है कि संक्रामक बीमारियों और स्वास्थ्य संकटों से अकेले नहीं लड़ा जा सकता।
भविष्य में जब भी कोई नया वायरस दस्तक देगा, तब अमेरिका को अपनी इन अलगाववादी दीवारों के भीतर डेटा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी का अहसास हो सकता है।
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इतिहास के पन्नों में अमेरिकी अलगाववाद की काली स्याही
यह फैसला इतिहास में अमेरिकी अलगाववाद के एक चरम उदाहरण के रूप में दर्ज होगा। संप्रभुता और राष्ट्रवाद की इस लड़ाई में कहीं न कहीं विज्ञान और साझा मानवता की बलि दी गई है।
अमेरिका का WHO से बाहर आना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक भरोसे की हार है जो दशकों की मेहनत से बनाया गया था। अब देखना यह होगा कि “विश्वसनीय भागीदारों” के साथ काम करने का ट्रंप का दावा कितना ठोस साबित होता है या फिर यह कदम केवल भविष्य की आपदाओं के लिए अमेरिका को निहत्था छोड़ देगा।
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