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विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई: वापसी पर सस्पेंस बरकरार

विजय माल्या बॉम्बे

विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई आज 18 फरवरी 2026 को उस समय नाटकीय मोड़ पर पहुँच गई जब भगोड़े कारोबारी ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि वह भारत लौटने की कोई निश्चित तारीख नहीं दे सकते। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ के सामने माल्या के वकील अमित देसाई ने एक लिखित बयान पढ़ा, जिसमें ब्रिटिश अदालतों द्वारा लगाए गए यात्रा प्रतिबंधों का हवाला दिया गया था।

माल्या ने अदालत को सूचित किया कि इंग्लैंड और वेल्स की अदालतों ने उन्हें देश छोड़ने या किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा दस्तावेज के लिए आवेदन करने से रोक रखा है।

यह बयान हाई कोर्ट के उस ‘अल्टीमेटम’ के जवाब में आया है जिसमें कहा गया था कि यदि माल्या ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम’ (FEO Act) के खिलाफ राहत चाहते हैं, तो उन्हें भारत की न्यायिक सीमा के भीतर शारीरिक रूप से उपस्थित होना होगा।

बिना पासपोर्ट और यूके का बैन: माल्या की मजबूरी या कानूनी ढाल?

इस सुनवाई के दौरान माल्या के बचाव पक्ष ने दो प्रमुख तकनीकी कारणों को अपनी ढाल बनाया है। पहला, भारत सरकार द्वारा 2016 में ही उनके पासपोर्ट का रद्दीकरण किया जाना और दूसरा, ब्रिटेन में चल रही ‘Confidential’ कानूनी प्रक्रिया। विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई में वकील ने तर्क दिया कि एक व्यक्ति जिसके पास वैध पासपोर्ट नहीं है और जिसे विदेशी अदालत ने यात्रा करने से मना किया है, वह कैसे भारत आने का वादा कर सकता है?

हालांकि, बेंच ने इस पर तीखा सवाल उठाया कि क्या माल्या ने उन विदेशी आदेशों को चुनौती दी है या भारत आने के लिए विशेष अनुमति मांगी है? कोर्ट ने साफ किया कि वह केवल विदेशी अदालतों के कागजों के आधार पर माल्या को भारतीय कानून से भागने की अनुमति नहीं दे सकती।

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भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (FEO Act) पर छिड़ी जंग: क्या माल्या को मिलेगी सुनवाई की छूट?

माल्या ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दायर कर रखी हैं, जिनमें उन्होंने 2018 के FEO अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई में उनके वकील ने दलील दी कि किसी भी नागरिक को उसकी शारीरिक अनुपस्थिति के आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रिट याचिकाओं पर सुनवाई के लिए याचिकाकर्ता का कोर्ट रूम में मौजूद होना अनिवार्य नहीं है।

लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट अपने रुख पर अडिग है कि जो व्यक्ति जानबूझकर अदालत की प्रक्रिया से बच रहा है, वह ‘इक्विटी’ या संवैधानिक राहत का हकदार नहीं हो सकता। कोर्ट का मानना है कि माल्या केवल तब ही राहत पा सकते हैं जब वे भारतीय संविधान और कानून के प्रति अपनी निष्ठा दिखाएं।

सॉलिसिटर जनरल का पलटवार: “पहले भारत आओ, फिर हक की बात करो”

भारत सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माल्या की दलीलों को ‘न्यायिक प्रक्रिया का मजाक’ करार दिया। विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई के दौरान उन्होंने जोर दिया कि माल्या प्रत्यर्पण की कार्यवाही के अंतिम चरण में पहुँच चुके हैं और अब वे बचने के लिए तकनीकी बहाने ढूंढ रहे हैं।

मेहता ने तर्क दिया कि यदि माल्या को लगता है कि उन्हें गलत तरीके से भगोड़ा घोषित किया गया है, तो उन्हें भारत आकर यह साबित करना चाहिए, न कि सात समुद्र पार बैठकर भारतीय कानून को चुनौती देनी चाहिए। केंद्र सरकार ने कोर्ट से अपील की है कि माल्या की किसी भी याचिका पर तब तक विचार न किया जाए जब तक वे भारतीय जेल या कोर्ट की हिरासत में नहीं आ जाते।

क्या ‘गुमनाम कानूनी मामला’ माल्या की राजनीतिक शरण का हिस्सा है?

ब्रिटिश होम ऑफिस ने काफी समय से माल्या के प्रत्यर्पण को एक ‘गुमनाम कानूनी मामले’ के कारण रोक रखा है, जिसे कई विशेषज्ञ ‘राजनीतिक शरण’ (Political Asylum) की अर्जी मान रहे हैं। विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई में भी इस रहस्यमयी देरी की गूंज सुनाई दी।

यूके की अदालतों ने माल्या को फिलहाल वहीं रहने का निर्देश दिया है जब तक कि इस मामले का निपटारा नहीं हो जाता। माल्या इसी आदेश को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना रहे हैं, यह दावा करते हुए कि अगर वे यूके छोड़ते हैं, तो वे वहां की अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के दोषी होंगे। यह अंतरराष्ट्रीय कानून का एक ऐसा पेंच है जिसे सुलझाना बॉम्बे हाई कोर्ट के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

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तिहाड़ या टॉवर हाउस: माल्या की जीवनशैली और युवाओं का आक्रोश

सोशल मीडिया और जेन-जी (Gen Z) के बीच इस खबर ने एक बार फिर ‘सिस्टम की नाकामी’ पर बहस छेड़ दी है। विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई की लाइव अपडेट्स के साथ ही लोग उनके लंदन स्थित आलीशान ‘टॉवर हाउस’ की तस्वीरें साझा कर रहे हैं।

युवाओं का तर्क है कि जहाँ एक आम आदमी पर छोटा सा कर्ज होने पर बैंक संपत्ति कुर्क कर लेते हैं, वहीं हजारों करोड़ का चूना लगाने वाले लोग विदेशी कानूनों की आड़ लेकर आलीशान जीवन जी रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि माल्या जेल सुधारों और स्मोकिंग रूम की मांग कर रहे हैं, जबकि वे खुद भारत की जेलों की चौखट तक पहुँचने से बचने के लिए हर संभव कानूनी तिकड़म लड़ा रहे हैं।

अगला कदम: कोर्ट ने दिया तीन हफ्ते का समय और मांगा विस्तृत हलफनामा

बॉम्बे हाई कोर्ट ने आज की सुनवाई के अंत में माल्या को कोई तत्काल राहत नहीं दी। इसके बजाय, पीठ ने वकील अमित देसाई को निर्देश दिया कि वे तीन सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करें।

इस हलफनामे में माल्या को यह स्पष्ट करना होगा कि यूके की अदालतों द्वारा लगाई गई पाबंदियों की सही प्रकृति क्या है, उन्होंने उन्हें चुनौती दी है या नहीं, और क्या वे वास्तव में भारत लौटने का इरादा रखते हैं?

विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई की अगली तारीख 11 मार्च 2026 तय की गई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी निर्देश दिया है कि वह माल्या के ताजा दावों पर एक हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करे।

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विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्टन्याय की कछुआ चाल या माल्या का शातिर खेल?

अंततः, विजय माल्या बॉम्बे हाई कोर्ट सुनवाई का यह दौर एक बार फिर साबित करता है कि सफेदपोश अपराधियों के लिए कानून के रास्ते कितने घुमावदार हो सकते हैं। 2016 से भारत से फरार माल्या अब 70 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उनकी कानूनी जंग अभी भी शुरुआती दौर जैसी ही उलझी हुई है।

यदि बॉम्बे हाई कोर्ट उनकी दलीलों को स्वीकार कर लेता है, तो यह भगोड़े अपराधियों के लिए एक नई मिसाल बन जाएगी। वहीं, यदि कोर्ट सख्त रुख अपनाता है, तो माल्या के पास यूके में छिपने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। भारत की न्याय व्यवस्था के लिए यह ‘अग्निपरीक्षा’ है कि क्या वह अपने सबसे हाई-प्रोफाइल भगोड़े को कटघरे में ला पाती है या नहीं।

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