बंगाल SIR न्यायिक आदेश: SC का असाधारण कदम, जजों को मिली कमान!
बंगाल SIR न्यायिक आदेश आज भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ बनकर उभरा है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल हैं, ने शुक्रवार को एक असाधारण फैसला सुनाया।
कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वे पश्चिम बंगाल में चल रही ‘Special Intensive Revision’ (SIR) प्रक्रिया की निगरानी के लिए मौजूदा और पूर्व न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करें। यह कदम उस समय उठाया गया है जब राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के बीच दावों और आपत्तियों के निस्तारण को लेकर भारी ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (भरोसे की कमी) देखी गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष चुनाव के लिए वोटर लिस्ट की शुद्धता सबसे ऊपर है और इसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
ममता सरकार बनाम चुनाव आयोग: क्यों पैदा हुआ भरोसे का यह बड़ा संकट?
इस बंगाल SIR न्यायिक आदेश के पीछे की असल कहानी सत्ता और संस्था के बीच की खींचतान है। तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि चुनाव आयोग जानबूझकर बंगाल को निशाना बना रहा है और लाखों वैध मतदाताओं के नाम काटने की साजिश रच रहा है।
वहीं, चुनाव आयोग ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रही है और उन्हें उचित रैंक के अधिकारी (SDM स्तर के) उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। कोर्ट ने इस ‘ब्लेम गेम’ को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया कि जब दो संवैधानिक निकाय एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगा रहे हों, तो न्यायपालिका का दखल देना अनिवार्य हो जाता है ताकि आम जनता का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बना रहे।
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अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा कि यह एक असाधारण स्थिति है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का प्रयोग किया। बंगाल SIR न्यायिक आदेश जारी करते हुए बेंच ने कहा कि यह एक ‘Extraordinary Situation’ है।
आमतौर पर चुनावी प्रक्रियाओं में ज्यूडिशियल ऑफिसर्स को इस तरह सीधे तैनात नहीं किया जाता, लेकिन बंगाल के मामले में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) के नाम पर करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं को नोटिस दिए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में दावों और आपत्तियों का निपटारा बिना किसी निष्पक्ष निगरानी के संभव नहीं था।
कोर्ट ने माना कि यदि इस समय हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो आने वाले विधानसभा चुनावों की शुचिता पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए, अब डिस्ट्रिक्ट जज और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज स्तर के अधिकारी प्रत्येक जिले में इन दावों की दोबारा जांच करेंगे।
वोटर लिस्ट से गायब हुए 58 लाख नाम: क्या यह राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है?
बंगाल SIR न्यायिक आदेश की पृष्ठभूमि में वे आंकड़े हैं जो चौंकाने वाले हैं। दिसंबर 2025 में प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में करीब 58 लाख नाम हटा दिए गए थे। इसके अलावा, 1.16 करोड़ से अधिक नामों को ‘संदिग्ध’ की श्रेणी में रखा गया है।
टीएमसी का आरोप है कि चुनाव आयोग ने ऐसे सॉफ्टवेयर टूल्स का इस्तेमाल किया जो बंगाल की भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकताओं को नहीं समझते। उदाहरण के लिए, सरनेम की स्पेलिंग में अंतर या शादी के बाद पते में बदलाव को भी ‘डिस्क्रिपेंसी’ मान लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताई और कहा कि किसी भी वैध नागरिक का नाम केवल तकनीकी आधार पर नहीं काटा जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया है कि ज्यूडिशियल ऑफिसर यह सुनिश्चित करेंगे कि हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का पूरा मौका मिले।
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28 फरवरी की डेडलाइन और सप्लीमेंट्री रोल: क्या समय पर तैयार होगी फाइनल लिस्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल SIR न्यायिक आदेश में समय सीमा को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। चुनाव आयोग चाहता था कि फाइनल वोटर लिस्ट 28 फरवरी 2026 तक प्रकाशित कर दी जाए।
हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार का कहना था कि इतनी कम अवधि में करोड़ों दावों की जांच संभव नहीं है। कोर्ट ने एक बीच का रास्ता निकाला है—चुनाव आयोग 28 फरवरी को उस लिस्ट को प्रकाशित कर सकता है जिसका काम पूरा हो चुका है, जबकि बाकी बचे हुए नामों के लिए एक ‘सप्लीमेंट्री रोल’ (पूरक सूची) बाद में जारी की जाएगी।
इससे चुनाव की तैयारियों में भी देरी नहीं होगी और किसी भी नागरिक का वोटिंग अधिकार भी नहीं छीना जाएगा। यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए बड़ी राहत है जो अपने पहचान दस्तावेजों को लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे।
अधिकारियों को सुरक्षा और रसद सहायता: डीएम और एसपी की होगी सीधी जिम्मेदारी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस बंगाल SIR न्यायिक आदेश के पालन के लिए प्रशासन को भी कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि तैनात किए जाने वाले न्यायिक अधिकारियों को पूरी सुरक्षा और लॉजिस्टिकल सपोर्ट देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी।
जिलों के कलेक्टर (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) को इस काम के लिए ‘डीम्ड डेपुटेशन’ पर माना जाएगा। इसका मतलब है कि यदि ज्यूडिशियल ऑफिसर्स के काम में कोई बाधा आती है या उन्हें सुरक्षा नहीं मिलती, तो इसके लिए सीधे जिले के शीर्ष अधिकारी जिम्मेदार होंगे।
कोर्ट ने बंगाल के डीजीपी को भी एक सप्लीमेंट्री हलफनामा दायर करने को कहा है, जिसमें चुनाव आयोग के अधिकारियों को मिली धमकियों और हिंसा की शिकायतों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा देना होगा।
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कलकत्ता हाई कोर्ट की भूमिका: शनिवार को होने वाली महा-बैठक पर सबकी नजरें
बंगाल SIR न्यायिक आदेश को अमलीजामा पहनाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक ‘नोडल पॉइंट’ बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि शनिवार तक कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सभी स्टेकहोल्डर्स, जिनमें मुख्य सचिव, डीजीपी और चुनाव आयोग के प्रतिनिधि शामिल हैं, के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग करेंगे। इस मीटिंग में तय किया जाएगा कि कितने ज्यूडिशियल ऑफिसर उपलब्ध हैं और उन्हें किन-किन संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किया जाना है।
यह पहली बार है जब किसी राज्य की पूरी वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को हाई कोर्ट के सीधे पर्यवेक्षण में रखा गया है। यह दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट बंगाल के जमीनी हालातों और वहां की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को कितनी गंभीरता से ले रहा है।
क्या यह आदेश बंगाल चुनावों में निष्पक्षता की गारंटी दे पाएगा?
अंततः, बंगाल SIR न्यायिक आदेश ने लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव—चुनाव—से पहले एक ‘सेफ्टी वाल्व’ का काम किया है। जब जनता को लगे कि उनकी नागरिकता और वोट देने के अधिकार पर संकट है, तब न्यायपालिका का यह सक्रिय रूप उम्मीद जगाता है।
हालांकि, असली चुनौती अब शुरू होगी जब ये ज्यूडिशियल ऑफिसर फाइलों और दस्तावेजों के अंबार के बीच असल वोटर की पहचान करेंगे। क्या राज्य सरकार अब पूरी तरह सहयोग करेगी? क्या चुनाव आयोग अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाएगा?
ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले कुछ हफ्तों में मिल जाएगा। लेकिन एक बात साफ है—सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि बंगाल की सड़कों पर होने वाला ‘ब्लेम गेम’ अब कोर्ट की दहलीज के भीतर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी में बदल जाएगा
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