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1970 भिवंडी दंगे: आरएसएस-जनसंघ की भूमिका पर मदन आयोग रिपोर्ट

1970 भिवंडी दंगे

महाराष्ट्र के औद्योगिक शहर भिवंडी में 7 मई, 1970 को शुरू हुए 1970 भिवंडी दंगे भारत के सांप्रदायिक इतिहास में एक भयावह अध्याय बन गए। न्यायमूर्ति डी.पी. मदन आयोग की सात खंडों वाली विस्तृत रिपोर्ट ने इन दंगों को सहज हिंसा मानने से इनकार कर दिया, बल्कि स्पष्ट रूप से इन्हें एक सुनियोजित सांप्रदायिक साजिश का हिस्सा बताया।

आयोग ने इन दंगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनसंघ (आज की भाजपा का पूर्ववर्ती संगठन) को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहराया।

मदन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि साजिश के केंद्र में जनसंघ से संबद्ध राष्ट्रीय उत्सव मंडल था। इस संगठन ने जानबूझकर शिव जयंती जुलूस को मुस्लिम-बहुल इलाकों से गुजारने का फैसला किया। इस जुलूस में लगभग 3,000-4,000 ग्रामीणों को लाठियों और हथियारों के साथ लामबंद किया गया था।

जुलूस के दौरान, “मुसलमानों को भिवंडी छोड़ना होगा” जैसे भड़काऊ नारे लगाए गए और मस्जिदों को गुलाल से अपवित्र करने जैसी घटनाएं हुईं, जिसने हिंसा भड़काने के स्पष्ट इरादे को दर्शाया। आयोग ने इसे “मुसलमानों को भयभीत करने और उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर करने” की एक सोची-समझी रणनीति करार दिया, जो सीधे तौर पर आरएसएस और जनसंघ की विचारधारा के अनुरूप थी।

यह तथ्य आज भी प्रासंगिक है, जब सांप्रदायिक तनाव को भड़काने के लिए धार्मिक जुलूसों का दुरुपयोग बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न बना हुआ है।

हिंसा की भयावहता: 80% से अधिक मुस्लिम मौतें और एकतरफा कार्रवाई

1970 भिवंडी दंगे अपनी भयावहता के कारण भारतीय इतिहास में दर्ज हैं। मदन आयोग द्वारा जारी मृतकों और घायलों की संख्या दंगों की एकतरफा प्रकृति को उजागर करती है। आयोग के अनुसार, केवल भिवंडी में 164 लोग मारे गए, जिनमें 142 मुसलमान और 20 हिंदू थे। इसके अलावा, आसपास के ठाणे और जलगांव क्षेत्रों में 78 और मौतें हुईं, जिनमें 50 मुसलमान और 17 हिंदू शामिल थे।

कुल मिलाकर, 250 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें से 80% से ज्यादा मुसलमान थे। इसके अलावा, 2,000 से अधिक लोग घायल हुए और 1,000 से ज्यादा परिवार बेघर हो गए। आयोग ने इन आंकड़ों को इस बात का सबूत माना कि सांप्रदायिक हिंसा में मुसलमानों को जानबूझकर निशाना बनाया गया।

दंगे 7 मई को तब शुरू हुए, जब शिव जयंती जुलूस के दौरान जनसंघ और शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम-बहुल नया बस्ती और खोनी इलाकों में भड़काऊ नारे लगाए और हिंसक कार्रवाइयां शुरू कीं। आयोग ने पाया कि जुलूस में शामिल कई लोग पहले से ही हथियारबंद थे, और उनके इरादे केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं थे।

यह हिंसा 8 मई तक चली, जिसमें मस्जिदों, मुस्लिम घरों और दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जिसने आरएसएस-जनसंघ की गहरी संलिप्तता की पुष्टि की।

उत्प्रेरक संगठन: राष्ट्रीय उत्सव मंडल और आरएसएस की विचारधारा

राष्ट्रिय उत्सव मंडल, जिसे जनसंघ ने 1969 में स्थापित किया था, दंगों का एक प्रमुख उत्प्रेरक था। आयोग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि इस संगठन ने स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक तनाव को भड़काने के लिए शिव जयंती को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

मंडल के नेता, जैसे बी.पी. व्यास और अन्य जनसंघ कार्यकर्ताओं ने जुलूस के रास्ते को जानबूझकर विवादास्पद बनाया, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के बीच डर और आक्रोश फैलाना था।

आयोग ने उल्लेख किया कि जुलूस में शामिल ग्रामीण कार्यकर्ताओं को आरएसएस शाखाओं के जरिए संगठित किया गया था, जहां उन्हें कथित तौर पर “मुसलमानों को सबक सिखाने” का प्रशिक्षण दिया गया था। इन कार्यकर्ताओं ने भगवा झंडे में लिपटी लाठियां और अन्य हथियार लहराए, और मस्जिदों पर गुलाल फेंकने जैसे अपमानजनक कृत्य किए।

आयोग ने इसे “सांप्रदायिक घृणा का संगठित प्रदर्शन” करार दिया, जिसमें आरएसएस की “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा से प्रेरित विचारधारा की गहरी छाप थी, जो अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक मानती है। 1970 भिवंडी दंगे सांप्रदायिक संगठनों द्वारा धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का एक क्लासिक उदाहरण हैं।

पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका और गहरा होता अन्याय

दंगों को और भयावह बनाने में पुलिस की भूमिका भी कम नहीं थी। मदन आयोग ने पुलिस पर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का गंभीर आरोप लगाया। आयोग ने दर्ज किया कि विशेष जांच दस्ते (एसआईटी) ने मुस्लिम समुदाय को चुन-चुनकर निशाना बनाया।

पुलिस ने हिंसा के दौरान मुसलमानों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें कई निर्दोष मुस्लिम मारे गए, जबकि जनसंघ और शिवसेना के कार्यकर्ताओं को संरक्षण दिया गया।

उदाहरण के लिए, 7 मई की रात को पुलिस ने नया बस्ती में गोलीबारी की, जिसमें 17 मुसलमान मारे गए, लेकिन हिंसक जुलूस के नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। आयोग ने पाया कि 112 मुस्लिम दुकानों को जलाया गया, जिनमें से 87 पूरी तरह नष्ट हो गईं, जबकि हिंदू संपत्तियों को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचा।

कुल आर्थिक नुकसान 15 करोड़ रुपये से अधिक था, जिसमें से अधिकांश मुस्लिम समुदाय का था। पुलिस की इस पक्षपातपूर्ण कार्रवाई ने न केवल हिंसा को बढ़ावा दिया, बल्कि पीड़ित समुदाय के प्रति अन्याय को और गहरा कर दिया।

आरएसएस और जनसंघ ने मदन आयोग की रिपोर्ट को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” कहकर खारिज करने की कोशिश की, लेकिन पुख्ता सबूत उनकी संलिप्तता को स्पष्ट करते हैं।

आर्थिक और सामाजिक क्षति: भिवंडी का स्थायी घाव

भिवंडी, जो 65% मुस्लिम आबादी वाला एक समृद्ध बुनकर शहर था, दंगों के बाद सांप्रदायिक तनाव का पर्याय बन गया। आयोग ने बताया कि 1,000 से अधिक परिवार बेघर हुए, और सैकड़ों छोटे-बड़े कारखाने और बुनाई इकाइयां जलकर राख हो गईं। मुस्लिम समुदाय, जो शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, को जानबूझकर कमजोर किया गया।

आयोग ने इस नुकसान को “मुसलमानों की आर्थिक रीढ़ तोड़ने” की साजिश का हिस्सा माना। इस हिंसा ने न केवल जान-माल का नुकसान किया, बल्कि भिवंडी के सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस कर दिया। 1970 भिवंडी दंगे भारत के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को तोड़ने की एक चेतावनी हैं कि सांप्रदायिक संगठनों की अनियंत्रित गतिविधियां समाज को कितना नुकसान पहुंचा सकती हैं।

न्यायमूर्ति मदन आयोग ने सिफारिश की थी कि ऐसे संगठनों पर सख्त निगरानी और कानूनी कार्रवाई हो, लेकिन सरकारों की निष्क्रियता ने इस सिफारिश को हवा में उड़ा दिया।

भिवंडी का दर्द आज भी जिंदा है। आज जब शताब्दी वर्ष मनाते आरएसएस समर्थित भाजपा (पूर्ववर्ती जनसंघ) की केंद्र में सरकार है तब धार्मिक जुलूस और सांप्रदायिक बयानबाजी फिर से चर्चा में हैं, भिवंडी 1970 हमें याद दिलाता है कि नफरत की आग को अनदेखा करने की कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ती है।

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