“जाति जनगणना स्वैच्छिक: : मूर्ति दंपति के इनकार पर मंत्री का सवाल
जाति जनगणना स्वैच्छिक कर्नाटक में चल रहे सामाजिक और शैक्षिक सर्वेक्षण (जाति सर्वेक्षण) ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इंफोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायण मूर्ति और उनकी पत्नी, राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति, ने इस सर्वेक्षण में भाग लेने से औपचारिक रूप से इनकार कर दिया है।
पिछले हफ़्ते जब जनगणना अधिकारी दंपति के जयनगर स्थित घर गए, तो सुधा मूर्ति ने स्व-घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए अपना रुख स्पष्ट किया।
उन्होंने अपने घोषणापत्र में साफ तौर पर कहा: “हम किसी भी पिछड़े वर्ग से नहीं हैं। इसलिए, इस सर्वेक्षण में भाग लेना सरकार के लिए फायदेमंद नहीं होगा। इसलिए, हम इसमें भाग लेने से इनकार करते हैं।” दंपति ने कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (केएससीबीसी) को लिखे एक पत्र में भी यही दोहराया। .
बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) के सूत्रों ने बताया कि दंपति अपने घर पर सामाजिक एवं शैक्षिक सर्वेक्षण या जाति सर्वेक्षण नहीं करवाना चाहते।
यह हाई-प्रोफ़ाइल इनकार ऐसे समय में आया है जब राज्य सरकार इस महत्वाकांक्षी सर्वेक्षण को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है, जिसे राज्य के निवासियों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थितियों पर व्यापक आँकड़े एकत्र करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
मंत्री का सवाल और उपमुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया
मूर्ति दंपति के इस फैसले पर कर्नाटक के मंत्रियों की प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस सरकार में श्रम मंत्री संतोष लाड ने राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति के सर्वेक्षण में भाग लेने से इनकार करने पर एक गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण अनिवार्य नहीं है, लेकिन फिर भी एक वरिष्ठ पत्रकार और संपादक की तरह उन्होंने ध्यान खींचने वाला सवाल दाग दिया: “क्या वह अपनी बात पर तब भी कायम रहेंगी जब भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अगले साल होने वाली जनगणना में जाति गणना कराएगी? मुझे उम्मीद है कि वह तब भी यही कहेंगी।”
संतोष लाड ने हालांकि यह भी कहा कि वह उनके फैसले का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा, “उन्होंने जो कुछ भी कहा है, वह उनकी निजी अभिव्यक्ति है। यह उनका अपना फ़ैसला है, और सरकार होने के नाते, हम किसी को भी इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।”
उनसे यह भी पूछा गया कि क्या सुधा मूर्ति और नारायण मूर्ति जैसे प्रभावशाली लोगों के इससे बाहर निकलने से कोई फ़र्क़ पड़ता है, जिस पर लाड ने जवाब दिया: “कौन प्रभावशाली है या नहीं, यह व्यक्तिपरक है। यह बहुत बहस का विषय है। मुझे नहीं लगता कि इसका समाज पर कोई प्रभाव पड़ेगा।”
उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी इस गैर-भागीदारी पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उन्होंने कहा: “हम किसी को भी सर्वेक्षण में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, यह स्वेच्छा से किया जाना चाहिए।” कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (केएससीबीसी) ने भी 26 सितंबर को एक नोटिस जारी कर स्पष्ट किया था कि सर्वेक्षण में भागीदारी स्वैच्छिक है।
नोटिस में कहा गया है कि हालांकि सर्वेक्षण का उद्देश्य पूरी आबादी को कवर करना है, लेकिन नागरिकों और परिवारों की भागीदारी स्वैच्छिक है और जानकारी का खुलासा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि जाति जनगणना स्वैच्छिक है, फिर भी सरकार व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है।
सर्वेक्षण का उद्देश्य और देरी
केएससीबीसी यह सामाजिक और शैक्षिक सर्वेक्षण कर रहा है, जो ₹420 करोड़ की लागत वाला है और इसमें 60 प्रश्न शामिल हैं। यह सर्वेक्षण 22 सितंबर को शुरू हुआ था और मूल रूप से 7 अक्टूबर को समाप्त होने वाला था। राज्य सरकार का तर्क है कि जाति सर्वेक्षण एक अधिक समतामूलक समाज को बढ़ावा देगा।
सरकार का मानना है कि यह डेटा कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने और वंचित एवं कमजोर समूहों को अधिक प्रभावी ढंग से सशक्त बनाने में मदद करेगा। यह सर्वेक्षण लगभग सात करोड़ निवासियों का डेटा एकत्र कर रहा है।
हालांकि, अपूर्ण आँकड़ों के कारण, सर्वेक्षण को पूरा करने की समय सीमा बार-बार बढ़ाई गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कई क्षेत्रों में आँकड़ा संग्रह की अपूर्ण स्थिति की पुष्टि की। शुरुआती समय-सीमा 7 अक्टूबर से बढ़ाकर 18 अक्टूबर की गई, फिर अधिकांश जिलों में 12 अक्टूबर और बेंगलुरु में 24 अक्टूबर तक बढ़ाई गई।
नवीनतम विस्तार में, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 15 अक्टूबर की प्रारंभिक समय-सीमा को बढ़ाकर 27 अक्टूबर करने का निर्णय लिया।
सुस्त गति के कारण, सर्वेक्षण भरने में बेंगलुरु अन्य जिलों से काफी पीछे है, जहां अब तक केवल अनुमानित 15.42 लाख परिवारों को ही शामिल किया गया है। सूत्रों के अनुसार, प्राप्त फॉर्मों में से, कुल प्रश्नों के केवल 25% ही भरे गए हैं।
सर्वेक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए, राज्य सरकार ने 8 से 18 अक्टूबर तक सरकारी स्कूलों में अवकाश घोषित किया था ताकि गणनाकार के रूप में तैनात शिक्षक सर्वेक्षण कार्य में पूरी तरह समर्पित हो सकें। उप-मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार सहित समाज के विभिन्न वर्गों ने सर्वेक्षण अधिकारियों का पूरा सहयोग किया और अपनी जाति, धर्म और अन्य व्यक्तिगत जानकारी प्रदान की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जाति जनगणना स्वैच्छिक होने के बावजूद कई प्रभावशाली हस्तियों ने भाग लिया है।
अक्टूबर की शुरुआत तक, कर्नाटक में कम से कम 83 प्रतिशत परिवारों का सर्वेक्षण किया जा चुका था, जिसमें कुल 1.43 करोड़ परिवारों में से लगभग 1.22 करोड़ परिवारों की गणना की गई है।
सुधा मूर्ति का राज्यसभा मनोनयन
लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 8 मार्च, 2024 को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था। उनका इनकार ऐसे समय में आया है जब वह एक उच्च संवैधानिक पद पर हैं, जिसने इस मुद्दे को और भी अधिक चर्चा का विषय बना दिया है।



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