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कांग्रेस में ‘महायुद्ध’: ‘थरूर अब हमारे नहीं!’ का ऐलान और गहरे होते घाव

थरूर अब हमारे नहीं!

‘थरूर अब हमारे नहीं!’ केरल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. मुरलीधरन के इस बयान ने कांग्रेस के भीतर के अंतर्कलह को एक नए चरम पर पहुंचा दिया है। यह सीधी घोषणा कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की सार्वजनिक प्रशंसा और राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर राजनीतिक एकता के आह्वान के बाद आई है। पार्टी के भीतर शशि थरूर के बयानों को लेकर गहरा असंतोष है, जिसने कांग्रेस की आंतरिक एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुरलीधरन ने स्पष्ट किया कि थरूर हमारे साथ नहीं हैं, इसलिए उनके बहिष्कार का सवाल ही नहीं उठता। कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व अब इस पर अंतिम फैसला करेगा कि शशि थरूर के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

  • मुरलीधरन ने कहा, थरूर तिरुवनंतपुरम में पार्टी कार्यक्रमों में अब आमंत्रित नहीं होंगे।
  • यह फैसला तब तक प्रभावी रहेगा जब तक थरूर राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपना रुख नहीं बदलते।
  • कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य थरूर को अब “हममें से एक” नहीं माना जाता।

मुख्य बिंदु :

  1. थरूर के राष्ट्रवादी रुख से कांग्रेस में गहरा असंतोष और विभाजन की स्थिति उत्पन्न हुई है।
  2. के. मुरलीधरन ने थरूर को कांग्रेस कार्यक्रमों से बहिष्कृत करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी।
  3. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और मोदी की विदेश नीति की प्रशंसा पर पार्टी नेतृत्व असहज हुआ।
  4. थरूर का सिद्धांत ‘राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में’ कांग्रेस के सिद्धांतों से टकराता दिखा।
  5. मोदी की वैश्विक भूमिका और आपातकाल पर थरूर के विचार कांग्रेस के खिलाफ गए।
  6. कांग्रेस नेतृत्व ने थरूर की बातों को उनकी ‘निजी राय’ बताकर दूरी बनाई।
  7. थरूर पर कार्रवाई को लेकर CWC की बैठक में निर्णायक रुख तय होने की संभावना है।

‘राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में’: थरूर का सिद्धांत और कांग्रेस का असमंजस

19 जुलाई को शशि थरूर की टिप्पणी ने कांग्रेस के भीतर आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने कहा था कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा पार्टी के प्रति निष्ठा से पहले आनी चाहिए। थरूर ने जोर देकर कहा, “पार्टियाँ तो बस देश को बेहतर बनाने का एक ज़रिया हैं। अगर देश ही नहीं बचेगा, तो पार्टियों का क्या फ़ायदा?”

  • थरूर ने सभी दलों को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एकजुट होने का पुरजोर आह्वान किया।
  • उनका मानना है कि राष्ट्रहित के लिए दूसरी पार्टियों के साथ काम करना विश्वासघात नहीं है।
  • उन्होंने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर सरकार और भारतीय सेना का समर्थन किया था।
  • यह ऑपरेशन 6-7 मई, 2025 की रात को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा किया गया।

भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में नौ आतंकी ठिकानों पर किया गया एक सैन्य हवाई अभियान था, जो पहलगाम आतंकी हमले का जवाब था। थरूर की इन टिप्पणियों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष फैल गया।

मोदी की वैश्विक पहचान और आपातकाल पर थरूर के विचार

शशि थरूर ने पहले भी कांग्रेस की आधिकारिक स्थिति के विपरीत विचार व्यक्त किए हैं। 23 जून को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख में, उन्होंने मोदी की वैश्विक ऊर्जा और गतिशीलता को “भारत के लिए एक संपत्ति” बताया था।

  • 10 जुलाई को ‘दीपिका’ में प्रकाशित एक मलयालम लेख में, थरूर ने आपातकाल को ‘एक काला अध्याय’ कहा।
  • उन्होंने संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान की भी आलोचना की थी।
  • थरूर ने सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी, जो कांग्रेस के इतिहास से जुड़ा है।

मॉस्को में, उन्होंने दोहराया कि भाजपा या कांग्रेस की विदेश नीति जैसी कोई चीज़ नहीं है – “केवल भारतीय विदेश नीति और राष्ट्रीय हित” होते हैं। ऐसे समय में जब कांग्रेस मोदी सरकार की विदेश नीति पर आक्रामक रूप से हमला कर रही है — यह दावा करते हुए कि भारत कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ रहा है, खासकर पहलगाम आतंकी हमले और भारत के लिए अमेरिकी यात्रा सलाह जैसी घटनाओं के बाद — थरूर की यह प्रशंसा पार्टी के भीतर भ्रम और विभाजन का कारण बन गई।

कांग्रेस का कड़ा रुख: ‘मोदी पहले, देश पहले’ की बहस

थरूर के बयानों पर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने थरूर के विचारों से पार्टी को अलग कर लिया और उन्हें उनकी “निजी राय” बताया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी एक जनसभा में थरूर पर निशाना साधते हुए कहा, “कुछ लोगों के लिए मोदी पहले हैं। हमारे लिए देश पहले है।”

  • मुरलीधरन ने थरूर पर एक सर्वेक्षण साझा करने पर भी निशाना साधा था।
  • इस सर्वेक्षण में थरूर को यूडीएफ द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए पसंदीदा विकल्प बताया गया था।
  • मुरलीधरन ने कहा था, “उन्हें पहले यह तय करना चाहिए कि वह किस पार्टी से हैं।”

शशि थरूर की हालिया टिप्पणियों, खासकर पहलगाम आतंकी हमले के बाद, ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और उनके बीच बढ़ती दरार को दर्शाया। कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि उनकी टिप्पणियों ने पार्टी को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।

थरूर का दृढ़ संकल्प और कांग्रेस का ‘धर्मसंकट’

शशि थरूर ने शनिवार को कोच्चि में एक बिज़नेस स्कूल के उद्घाटन समारोह में एक हाई स्कूल के छात्र द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए अपने रुख का बचाव किया। उन्होंने कहा, “मैं अपनी बात पर अड़ा रहूँगा क्योंकि मेरा मानना है कि यही देश के लिए सही है।”

  • उन्होंने कहा, जब उनके जैसे लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में अन्य दलों से सहयोग का आह्वान करते हैं।
  • उनकी अपनी पार्टियाँ अक्सर इसे विश्वासघात मानती हैं, और यही एक बड़ी समस्या बन जाती है।
  • थरूर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध कथन का भी हवाला दिया: “अगर भारत मर गया तो कौन बचेगा?”
  • उन्होंने कहा कि “भारत को पहले आना चाहिए। तभी हम सब जी सकते हैं।”

मुरलीधरन ने स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर थरूर कांग्रेस के भीतर खुद को विवश महसूस करते हैं, तो उन्हें “एक स्पष्ट राजनीतिक रास्ता चुनना चाहिए।” यह झगड़ा अब एक पूर्ण आंतरिक संकट बन गया है, जिससे पार्टी में ‘थरूर अब हमारे नहीं!’ वाले इस बयान के बाद उनके भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं।

पार्टी की एकता या राजनीतिक बिखराव?

जैसे-जैसे आंतरिक असंतोष बढ़ता जा रहा है, अब सभी की निगाहें कांग्रेस कार्य समिति (CWC) और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर टिकी हैं कि वे पार्टी के भीतर थरूर की स्थिति पर कोई औपचारिक कार्रवाई या स्पष्टीकरण दें। यह विवाद 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले केरल में कांग्रेस की एकता के प्रयासों को भी जटिल कर सकता है।

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