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किसानों के साथ विश्वासघात: भारत-अमेरिका व्यापार डील का सच

किसानों के साथ विश्वासघात

किसानों के साथ विश्वासघात भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की हालिया घोषणा ने एक बार फिर मोदी सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें “किसान सर्वोच्च प्राथमिकता” की बात कही जाती थी। 2 फरवरी 2026 को डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक चौंकाने वाला ऐलान किया।

ट्रंप के मुताबिक, भारत ने रूसी तेल की खरीद बंद करने और 500 बिलियन डॉलर से अधिक के अमेरिकी सामान खरीदने का वादा किया है, जिसमें बड़े पैमाने पर कृषि उत्पाद शामिल हैं।

अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रूक रोलिंस ने इसे “अमेरिकी किसानों की बड़ी जीत” करार देते हुए साफ कहा कि इससे अमेरिकी फार्म उत्पाद भारत के विशाल बाजार में पहुंचेंगे, जिससे वहां कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अमेरिका में नकदी का प्रवाह होगा। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सीमा के उस पार जश्न का माहौल है, जबकि भारतीय किसान अनिश्चितता के भंवर में हैं।

सरकारी चुप्पी और विरोधाभासी बयानों के बीच उलझती सच्चाई

हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी डील के बावजूद भारत सरकार की तरफ से कोई संयुक्त बयान या विस्तृत टेक्स्ट जारी नहीं किया गया। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने केवल इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं।

” हालांकि, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रीर ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि भारत ने ट्री नट्स, फल, सब्जियां, वाइन और स्पिरिट्स पर टैरिफ को जीरो (शून्य) कर दिया है।

हालांकि भारत ने “की सेक्टर” में कुछ सुरक्षा बरकरार रखने की बात कही है, लेकिन ट्रंप के दावे और अमेरिकी खेमे की खुशी बताती है कि कृषि क्षेत्र में बड़ी बाजार पहुंच दी गई है। यह दरबारी प्रचार के अलावा और कुछ नहीं दिखता, जहाँ घरेलू जनता को अंधेरे में रखकर विदेशी हितों को तरजीह दी जा रही है।

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अमेरिकी सब्सिडी का मायाजाल और भारतीय किसानों की “नकारात्मक सब्सिडी”

दशकों से भारत की नीति रही है कि कृषि को बड़े व्यापार समझौतों से बाहर रखा जाए, क्योंकि अमेरिका जैसे विकसित देश अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं। USDA (अमेरिकी कृषि विभाग) की रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सोयाबीन, मक्का और डेयरी उत्पादों पर प्रति एकड़ हजारों डॉलर की सब्सिडी मिलती है।

इसके विपरीत, भारत का किसान अपनी उपज को उत्पादन लागत से भी कम दाम पर बेचने को मजबूर है, जिसे अर्थशास्त्री “नकारात्मक सब्सिडी” कहते हैं।

किसानों के साथ विश्वासघात का यह सिलसिला तब और गहरा जाता है जब इस असमान धरातल पर अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजारों में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। अब सस्ते अमेरिकी मक्का, सोयाबीन, सोयाबीन ऑयल और डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGS) के भारतीय बाजार में घुसने का रास्ता साफ हो गया है।

सोयाबीन और मक्का उत्पादकों पर मंडराते संकट के बादल

हाल के वर्षों में भारत ने सोयाबीन ऑयल पर इंपोर्ट ड्यूटी 27.5% से घटाकर 16.5% कर दी थी, जिससे अमेरिकी निर्यात में पहले ही उछाल देखा गया था। अब इस नए समझौते से स्थिति और भयावह हो सकती है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इसे “अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे समर्पण” करार दिया है।

संगठन ने चेतावनी दी है कि सोयाबीन, मक्का, कपास और डेयरी क्षेत्र पर पड़ने वाले असर से करोड़ों छोटे और मध्यम किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।

भारतीय मंडियां जल्द ही अमेरिकी अधिशेष (surplus) का डंपिंग ग्राउंड बन सकती हैं, जहाँ स्थानीय उत्पादक वैश्विक कीमतों के नीचे दबकर और अधिक गरीबी की ओर धकेले जाएंगे। गोयल के “सुरक्षित क्षेत्र” के दावों के उलट अमेरिकी भाषा संकेत दे रही है कि एनिमल फीड और एथनॉल से जुड़े उत्पादों के लिए बाजार के दरवाजे खोल दिए गए हैं।

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भू-राजनीतिक दबाव और ऊर्जा सुरक्षा के साथ होता खिलवाड़

ट्रंप का 500 बिलियन डॉलर के सामान खरीदने और रूसी तेल बंद करने का दावा यह साबित करता है कि यह डील व्यापारिक कम और भू-राजनीतिक दबाव का नतीजा ज्यादा है। भारत अब तक रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को संभाल रहा था, लेकिन अब उसे महंगे अमेरिकी और वेनेजुएला के तेल की ओर धकेला जा रहा है।

इस दबाव की कीमत भारतीय कृषि क्षेत्र को बाजार पहुंच देकर चुकानी पड़ रही है। एथनॉल नीति में सस्ते अमेरिकी मक्का के प्रवेश से सीधे तौर पर गन्ना किसानों पर प्रहार होगा, क्योंकि मक्का आधारित एथनॉल बढ़ने से गन्ने की मांग घटेगी। यह भारतीय कृषि की रीढ़ तोड़ने वाली व्यवस्था है, जहाँ भारी सब्सिडी वाला अमेरिकी माल भारतीय किसान को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देगा।

बजट 2026-27: कृषि अनुसंधान और सब्सिडी में कटौती की मार

एक तरफ विदेशी आयात का संकट है, तो दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर भी निराशा हाथ लगी है। बजट 2026-27 में कृषि क्षेत्र को सिर्फ नाममात्र की बढ़ोतरी मिली है। कुल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए ₹1.30 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले साल के ₹1.27 लाख करोड़ से महज 2.6% ज्यादा है।

इससे भी चिंताजनक यह है कि कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) का बजट 4.8% घटाकर ₹9,967 करोड़ कर दिया गया है।

किसानों के साथ विश्वासघात का एक और प्रमाण यह है कि फर्टिलाइजर सब्सिडी ₹1.70 लाख करोड़ तो रखी गई है, लेकिन उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि हो रही है और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। बजट में बादाम और अखरोट जैसी उच्च-मूल्य वाली फसलों पर तो ध्यान है, लेकिन मुख्य अनाज और डेयरी को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी और तबाही का अंदेशा

यह समझौता ग्रामीण भारत के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। USDA डेटा गवाह है कि अमेरिका भारत को सोयाबीन ऑयल और मक्का का निर्यात लगातार बढ़ा रहा है। जब घरेलू मंडियों में सस्ता आयातित माल भर जाएगा, तो स्थानीय उत्पादन की मांग गिरेगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।

इससे न केवल किसानों की आय कम होगी, बल्कि कृषि पर निर्भर मजदूरों के बीच बेरोजगारी भी बढ़ेगी। विपक्ष और किसान संगठनों ने इसे स्पष्ट रूप से “विश्वासघात” की संज्ञा दी है।

सरकार “आत्मनिर्भर भारत” का नारा तो बुलंद करती है, लेकिन हकीकत में वह अमेरिकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के आगे नतमस्तक होती नजर आ रही है। समझौते के पूर्ण टेक्स्ट को सार्वजनिक न करना सरकार की मंशा और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करता है।

प्रतिरोध की मशाल: अस्तित्व की लड़ाई के लिए एकजुट होता किसान

अब सवाल यह है कि इस संकट का सामना कैसे किया जाए? संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने 4 से 11 फरवरी तक देशव्यापी अभियान छेड़ने और मोदी-ट्रंप की प्रतिमाएं जलाने का निर्णय लिया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय 2020-21 जैसे बड़े और एकजुट आंदोलन का है।

किसानों के साथ विश्वासघात के खिलाफ संसद से लेकर सड़कों तक और राज्य स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे WTO) तक आवाज उठानी होगी।

किसानों को MSP की कानूनी गारंटी, सब्सिडी और बाजार पहुंच की सुरक्षा के लिए फिर से संगठित होना होगा। यह महज एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भारतीय किसानों के अस्तित्व की लड़ाई है। यदि अभी प्रतिकार नहीं हुआ, तो भारतीय कृषि अमेरिकी डंपिंग का शिकार होकर रह जाएगी और ग्रामीण भारत गरीबी के गहरे गर्त में समा जाएगा।

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