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जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से दिया इस्तीफा

जगदीप धनखड़

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा और राजनीतिक पृष्ठभूमि

21 जुलाई 2025 को जगदीप धनखड़ ने भारत के उपराष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफा दे दिया। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए यह फैसला लिया। इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र के माध्यम से दिया गया। पत्र में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 67(क) का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देना जरूरी है। यह निर्णय संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लिया गया।

उपराष्ट्रपति रहते हुए जगदीप धनखड़ का विवादों भरा कार्यकाल

जगदीप धनखड़ का कार्यकाल हमेशा चर्चा में रहा। बतौर राज्य सभा सभापति, उनका विपक्ष से अक्सर टकराव हुआ। विपक्ष ने दिसंबर 2024 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। प्रस्ताव में आरोप था कि वे पक्षपात करते हैं और विपक्षी सांसदों की आवाज दबाते हैं। हालांकि उपसभापति हरिवंश ने इस प्रस्ताव को “प्रक्रियात्मक रूप से गलत” कहकर खारिज कर दिया था।

उनके कार्यकाल में निम्नलिखित प्रमुख विवाद सामने आए:

  • संसद में विपक्षी सांसदों को बोलने का अवसर न देना
  • न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणियाँ
  • अनुच्छेद 142 को “लोकतंत्र विरोधी” कहकर विवाद खड़ा करना
  • न्यायाधीशों को “सुपर संसद” कहना
  • न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ जाँच प्रस्ताव को पेश करना

उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए जगदीप धनखड़ की चुनौतियाँ

जगदीप धनखड़ ने अगस्त 2022 में उपराष्ट्रपति पद संभाला था। उन्होंने विपक्षी उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को हराया था। शुरुआती महीनों में वे सभापति के रूप में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की । लेकिन उनके अड़ियल रवैये के कारण जल्द ही विपक्ष के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण हो गए।

उन्होंने बार-बार कहा कि “संसद को बाधित करना लोकतंत्र के खिलाफ है।” लेकिन विपक्ष उन्हें निष्पक्ष नहीं मानता था। कई बार सदन में उनके फैसलों पर सवाल उठे। विपक्ष का आरोप था कि वे सत्तापक्ष के दबाव में काम करते हैं।

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न्यायपालिका से बढ़ती तकरार

धनखड़ का न्यायपालिका के साथ संबंध भी विवादों से भरा रहा। उन्होंने कहा था कि न्यायाधीशों पर किसी भी कानून का प्रभाव नहीं होता, जिससे जवाबदेही नहीं बनती। अप्रैल 2025 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “भारत की न्यायपालिका संसद से ऊपर नहीं हो सकती।”

उनकी टिप्पणी थी कि “अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ढांचे के लिए परमाणु मिसाइल की तरह है।” इस पर कड़ा विरोध हुआ। यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया।

संसद में आखिरी दिन की कार्यवाही और इस्तीफा

21 जुलाई को संसद सत्र की शुरुआत में जगदीप धनखड़ ने कोई संकेत नहीं दिया कि वे इस्तीफा देने वाले हैं। उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सराहना की। इसके बाद वे न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ आए प्रस्ताव पर चर्चा करते रहे।

सत्र खत्म होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर इस्तीफा दे दिया। यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। विपक्ष, मीडिया और सांसदों के लिए यह फैसला चौंकाने वाला था।

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पूर्ववर्ती अनुभव और राजनीतिक सफर

जगदीप धनखड़ पेशे से वकील हैं। वे 1990-91 में चंद्रशेखर सरकार में संसदीय कार्य राज्यमंत्री रह चुके हैं। 1989 में लोकसभा के सदस्य बने और बाद में राजस्थान विधानसभा के विधायक भी रहे। उनका राजनीतिक जीवन कांग्रेस, जनता दल और फिर भाजपा से जुड़ा रहा है।

2019 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। वहाँ ममता बनर्जी सरकार के साथ उनका टकराव लगातार चलता रहा। टीएमसी ने उन्हें “राज्यपाल नहीं, विपक्ष का नेता” तक कहा था।

विवादित राज्यपाल कार्यकाल और जनता की प्रतिक्रिया

राज्यपाल रहते हुए जगदीप धनखड़ ने बार-बार राज्य सरकार पर सवाल उठाए:

  • टीएमसी पर हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए
  • विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति पर विवाद किया
  • हर फैसले में राज्य सरकार की आलोचना की

इस वजह से उन्हें केंद्र सरकार का एजेंट भी कहा गया।

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इस्तीफे के पीछे संभावित कारण और राजनीतिक संकेत

हालांकि उन्होंने चिकित्सा कारणों का हवाला दिया, पर राजनीतिक हलकों में कई अटकलें हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • उनके कार्यकाल को लेकर राष्ट्रपति भवन से नाराज़गी थी
  • विपक्ष की बढ़ती आलोचना से वे दबाव में थे
  • न्यायपालिका से लगातार टकराव ने उनकी स्थिति कमजोर की

उनके इस्तीफे से यह भी संकेत मिलता है कि भाजपा शायद उपराष्ट्रपति पद के लिए नया चेहरा तलाश रही है, जो 2026 के लोकसभा चुनावों में बेहतर सामंजस्य ला सके।

निष्कर्ष: जगदीप धनखड़ की विरासत और आगे की राह

जगदीप धनखड़ का कार्यकाल संविधान, न्यायपालिका और लोकतंत्र की सीमाओं की नई परिभाषा देने वाला रहा। उन्होंने खुलकर संसद की गरिमा की बात की, पर व्यवहार में वे विपक्ष के निशाने पर रहे। उनके इस्तीफे से खाली हुई इस संवैधानिक कुर्सी के लिए अब नए नामों की चर्चा तेज हो गई है।

उनका यह अप्रत्याशित फैसला एक ऐसे दौर में आया है, जब देश राजनीतिक रूप से अत्यधिक ध्रुवीकृत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगला उपराष्ट्रपति किस दिशा में देश को नेतृत्व देगा।

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