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भारत-चीन संबंधों में अहम मोड़, जयशंकर वांग यी बैठक ने तय की आगे की राह

जयशंकर वांग यी बैठक

नई दिल्ली: जयशंकर वांग यी बैठक ने भारत-चीन संबंधों को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के दो दिवसीय भारत दौरे को दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और विश्वास बहाली के एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इस दौरे में उन्होंने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ गहन और व्यापक वार्ता की, जिसमें सीमा विवाद से लेकर वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों तक पर चर्चा हुई। इन मुलाकातों से यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों पक्ष अपने कठिन दौर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।

सीमा पर शांति और ‘तीन आपसी’ सिद्धांतों पर जोर

सोमवार को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुई जयशंकर वांग यी बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन के समक्ष भारत की स्थिति को पूरी स्पष्टता के साथ रखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों में किसी भी तरह की सकारात्मक प्रगति का आधार सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने की क्षमता पर टिका हुआ है। जयशंकर ने यह भी दोहराया कि भारत-चीन संबंध ‘तीन आपसी’ सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए: आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित।

उन्होंने साफ संदेश दिया कि मतभेद को कभी भी विवाद या संघर्ष में नहीं बनने देना चाहिए। इस दौरान जयशंकर ने भारत की आतंकवाद से लड़ने की प्राथमिकता को भी सामने रखा और पाकिस्तान जैसे देशों द्वारा प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाया। यह बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन यात्रा से ठीक पहले हुई, जो इसका महत्व और बढ़ा देती है।

डोभाल और वांग यी के बीच 24वें दौर की वार्ता

विदेश मंत्री से मुलाकात के बाद, मंगलवार को वांग यी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी मुलाकात की। यह मुलाकात भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों (SR) की 24वें दौर की वार्ता का हिस्सा थी। यह बैठक खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 2020 में गलवान घाटी में हुई घातक झड़पों के बाद गंभीर तनाव में आए दोनों देशों द्वारा संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के चल रहे प्रयासों का हिस्सा है। दिसंबर 2024 में अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा ने SR वार्ता के इस प्रारूप को फिर से सक्रिय किया था। इस वार्ता का उद्देश्य सीमा पर बनी हुई स्थिति को सामान्य करना और विश्वास बहाली के लिए स्थायी समाधान खोजना था, जहाँ अभी भी लगभग 50,000 से 60,000 सैनिक तैनात हैं।

अमेरिका और पाकिस्तान पर भी हुई बात

केवल सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि जयशंकर वांग यी बैठक में वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य भी चर्चा का विषय रहा। वांग यी ने अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ को लेकर डॉ. जयशंकर से कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और एकतरफा धौंस-धमकी का सामना कर रही है। वांग यी ने भारत की कुछ महत्वपूर्ण जरूरतों, जैसे फर्टिलाइजर्स, रेयर अर्थ मिनरल्स और टनल बोरिंग मशीनों, को पूरा करने का आश्वासन भी दिया, जो अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अलावा, यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि वांग यी भारत के बाद पाकिस्तान जाएंगे। इस बात पर भी बारीकी से ध्यान रखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का चीन पर बढ़ती आर्थिक निर्भरता और उसका सेना-राजनीतिक गठजोड़ भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है, और इसलिए भारत को चीन के साथ रिश्तों में सावधानी बरतनी होगी। पाकिस्तान के साथ चीन का पुराना और मजबूत रिश्ता है, और इस दौरे से यह साफ हो गया है कि चीन इस रिश्ते को कमजोर नहीं होने देना चाहता है। वांग यी ने जोर देकर कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं बल्कि साझेदार के रूप में देखना चाहिए।

भविष्य की राह और कूटनीति का नया अध्याय

वांग यी की यह यात्रा भारत-चीन संबंधों में एक नया अध्याय शुरू करने का संकेत देती है। कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई अनौपचारिक मुलाकात के बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला बढ़ा है। यह दौरा उसी सकारात्मक माहौल की देन है। जयशंकर वांग यी बैठक और डोभाल से हुई मुलाकात से भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा, लेकिन साथ ही वह बातचीत के रास्ते को भी खुला रखना चाहता है। यह कूटनीति दोनों देशों के बीच एक स्थिर, सहयोगी और प्रगतिशील संबंध बनाने में मदद कर सकती है, जिससे दोनों एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभा सकें।

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