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“मोहन भागवत के 75वें जन्मदिन पर पीएम मोदी की तारीफ”

मोहन भागवत 75वें जन्मदिन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के 75वें जन्मदिन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई प्रशंसा ने एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री ने भागवत को सामाजिक परिवर्तन में ‘आजीवन योगदानकर्ता’ बताते हुए उनकी सराहना की, जिस पर कांग्रेस पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई। कांग्रेस ने इस प्रशंसा को राजनीतिक बताया और आरोप लगाया कि यह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है।

कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि यह सबसे बड़ी विडंबना है। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था और संविधान को अपनाने से इनकार कर दिया था, और अब प्रधानमंत्री मोदी उसका महिमामंडन कर रहे हैं। भगत ने भागवत की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह केवल ‘चापलूसी’ है। वहीं, कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने आरएसएस की भूमिका को ‘विवादास्पद’ और ‘अंग्रेजों के साथ मिलीभगत’ वाला बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी गलत हैं, लेकिन वे असहाय भी हैं क्योंकि वे स्वयं आरएसएस से आते हैं। कांग्रेस सांसद मनोज कुमार ने आरएसएस की ‘चुनिंदा सक्रियता’ पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री की माँ का कथित तौर पर अपमान हुआ तो कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए, लेकिन दलित महिलाओं पर हमले के समय वे कहाँ थे। उन्होंने आरोप लगाया कि आरएसएस ही सरकार को नियंत्रित कर रहा है।

भागवत और मोदी के बीच गहरा संबंध: एक अनकहा भाईचारा

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मोहन भागवत को उनके 75वें जन्मदिन की बधाई देते हुए एक विस्तृत ब्लॉग पोस्ट भी लिखा। इस पोस्ट में उन्होंने भागवत के पिता मधुकरराव भागवत के साथ अपने व्यक्तिगत जुड़ाव को याद किया। उन्होंने कहा कि मधुकरराव के मार्गदर्शन में उनका और मोहन भागवत का पालन-पोषण लगभग भाइयों की तरह हुआ। आरएसएस के स्वयंसेवक अक्सर इस जोड़ी को ‘जय-वीरू’ कहते हैं। मोदी ने भागवत को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का प्रबल समर्थक बताया और उनके नेतृत्व शैली में ‘निरंतरता और अनुकूलन’ के दो प्रमुख गुणों पर जोर दिया। उन्होंने भागवत के कार्यकाल को आरएसएस की 100 साल की यात्रा में ‘सबसे परिवर्तनकारी’ बताया, जिसमें गणवेश में बदलाव से लेकर प्रशिक्षण शिविरों तक कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए।

मोदी ने भागवत को एक ऐसे नेता के रूप में वर्णित किया जो सार्वभौमिक भाईचारे का प्रतीक हैं और उन्हें निरंतरता, विकास और अनुकूलन के माध्यम से संघ को आगे बढ़ाने का श्रेय दिया। मोदी की यह भावुक श्रद्धांजलि पिछले एक साल से आरएसएस और भाजपा के बीच तनाव की अटकलों को कमजोर करती है और यह दर्शाती है कि नागपुर और दिल्ली के बीच तालमेल पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है।

’75 साल का नियम’ फिर चर्चा में: कांग्रेस का नया निशाना

मोहन भागवत के 75वें जन्मदिन के बाद कांग्रेस ने बीजेपी के ’75 साल की सेवानिवृत्ति’ के नियम को लेकर मोदी और भागवत पर निशाना साधा। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह नियम कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि एक ‘साधन’ है। उन्होंने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं पर यह नियम लागू किया गया, जबकि मोहन भागवत के लिए इसे ‘मोड़ा’ गया और प्रधानमंत्री मोदी के लिए इसे ‘नजरअंदाज’ किया गया। टैगोर ने मोदी द्वारा भागवत की प्रशंसा को एक ‘बीमा पॉलिसी’ बताया, ताकि 2025 में उन पर यह नियम लागू न हो।

इससे पहले, मोहन भागवत ने खुद उन अटकलों को खारिज कर दिया था कि वे 75 साल की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाएंगे। एक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि न तो उन्होंने ऐसा कुछ कहा है और न ही आरएसएस में किसी को 75 साल की उम्र में पद छोड़ना पड़ता है। उन्होंने कहा कि संगठन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता ही शीर्ष पद पर आ सकता है।

आरएसएस का शताब्दी समारोह अयोध्या से होगा शुरू

आरएसएस इस साल अपनी स्थापना का 100वां वर्ष मना रहा है। विजयादशमी (2 अक्टूबर) पर साल भर चलने वाले शताब्दी समारोह की शुरुआत पारंपरिक नागपुर के बजाय अयोध्या से होगी। इस अवसर पर हजारों स्वयंसेवक रामपथ पर पथ-संचालन में भाग लेंगे और आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले मुख्य भाषण देंगे। अयोध्या में यह समारोह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के साथ मेल खाता है। इसके अलावा, 25 नवंबर को श्री राम मंदिर में होने वाले धार्मिक ध्वजारोहण समारोह में भी भागवत शामिल होंगे। इस भव्य समारोह की तैयारियां ज़ोरों पर हैं।

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