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नेपाल की राजनीति में सुशीला कार्की प्रधानमंत्री: क्या जेन-जेड की क्रांति पर लगा प्रश्नचिन्ह?

सुशीला कार्की प्रधानमंत्री

सुशीला कार्की प्रधानमंत्री नेपाल में जेन-जेड युवाओं का विद्रोह, जो भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ था, ने न केवल प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया, बल्कि देश की राजनीतिक संरचना को भी हिलाकर रख दिया। लेकिन इस क्रांति का दावा करने वाले आंदोलन में एक कड़वी सच्चाई सामने आई है—वह है लोकप्रिय

मधेशी बौद्ध धर्म अनुयायी बालेन शाह को दरकिनार कर पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की प्रधानमंत्री के रूप में। यह फैसला न केवल युवाओं की आकांक्षाओं का अपमान है, बल्कि साबित करता है कि सत्ता के गलियारों में बदलाव का दावा झूठा है, यह तो बस पुरानी व्यवस्था का नया चेहरा है।

बालेन शाह: जन नेता जिन्हें दरकिनार किया गया

बालेन शाह, जिन्हें युवा ‘बालेन दाई’ कहकर पीएम बनाने की मांग कर रहे थे, काठमांडू के मेयर हैं। वे एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में 2022 में चुने गए थे और उनकी एंटी-करप्शन छवि ने लाखों युवाओं को आकर्षित किया। बालेन, जो मैथिल-मधेशी मूल के हैं और न्यूअर बौद्ध परिवार से ताल्लुक रखते हैं, ने अपनी रैपर से मेयर बनने की यात्रा में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक खुली जंग लड़ी।

जेन-जेड ने उन्हें इसलिए पीएम के रूप में चुना क्योंकि वे सत्ता की नेपोटिज्म से ऊपर उठकर जनता के मुद्दों, जैसे सड़क सुधार, शिक्षा और कर वसूली पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन सुशीला कार्की, जो पहाड़ी ब्राह्मण हैं, का नाम एलान होते ही यह साफ हो गया कि नेपाल की राजनीति अभी भी जातिगत वर्चस्व की गिरफ्त में है।

सुशीला कार्की का विवादित अतीत और चयन पर सवाल

सुशीला कार्की का चयन, जो 2017 में तत्कालीन सरकार द्वारा पक्षपाती फैसले देने के आरोप में महाभियोग का शिकार हुई थीं, एक साजिश जैसा लगता है। उस समय नेपाली कांग्रेस और सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पूर्वाग्रह का दोषी ठहराया था, जो पुलिस चीफ की नियुक्ति को उलटने से जुड़ा था।

अब, जब जेन-जेड ने बालेन को चुना था, तब कार्की को आगे लाकर साबित हो गया कि सच्चा लोकतंत्र अभी भी जातिगत पूर्वाग्रहों की बलि चढ़ रहा है। यह चयन न केवल बालेन की लोकप्रियता को कुचलता है, बल्कि युवाओं को धोखा देता है—क्योंकि कार्की का अतीत सत्ता के साथ समझौते का प्रतीक है, न कि क्रांतिकारी बदलाव का।

नेपाल के पहाड़ी ब्राह्मण राजनीति पर अपना वर्चस्व छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और सुशीला कार्की प्रधानमंत्री का चयन इसका जीता-जागता प्रमाण है। नेपाल की राजनीति सदियों से खास ब्राह्मण और क्षत्रिय (चेतरी) जातियों के कब्जे में रही है। 1990 के बाद 13 प्रधानमंत्रियों में से 10 ब्राह्मण और 3 क्षत्रिय थे।

मधेशी, जनजातीय, दलित और महिलाओं को सत्ता के शीर्ष पर कभी जगह नहीं मिली। बालेन शाह जैसे मधेशी नेता, जो बौद्ध प्रभाव वाले हैं, को दरकिनार करना दर्शाता है कि सिस्टम अभी भी बहुसंख्यक जनजातियों को बाहर रखने पर तुला है।

जातिगत भेदभाव का कड़वा सच और युवाओं का भविष्य

कार्की, जो 73 वर्ष की हैं और पूर्व चीफ जस्टिस के रूप में एक भ्रष्टाचार विरोधी छवि रखती हैं, वास्तव में सत्ता की पुरानी संरचना का हिस्सा हैं। यह चयन जेन-जेड के विद्रोह को कमजोर करता है, क्योंकि यह दिखाता है कि सड़कों पर खून बहाने के बावजूद, सत्ता की गद्दी पर वही पुराने चेहरे लौट आए हैं। नेपाल की राजनीति में जातिगत भेदभाव न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि देश की एकता को खंडित करता है। यह वर्चस्व टूटे बिना कोई सच्चा बदलाव संभव नहीं है।

यह घटना नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था की पोल खोलती है, जहां जेन-जेड का जोश सत्ता के जातिगत गठजोड़ के सामने बौना साबित हो रहा है। बालेन शाह को दरकिनार कर कार्की को चुनना न केवल युवाओं की मांगों का अपमान है, बल्कि साबित करता है कि सिस्टम में घुसपैठिए—जो विदेशी प्रभावों से प्रेरित हो सकते हैं—सच्चे क्रांतिकारियों को कुचल देते हैं।

कार्की का 2017 का महाभियोग, जो पक्षपात के आरोपों पर आधारित था, आज भी सवाल खड़ा करता है कि क्या वे वाकई निष्पक्ष हैं या सत्ता के इशारों पर नाचती हैं? नेपाल के पहाड़ी ब्राह्मण और क्षत्रिय समुदाय ने आज तक किसी जनजातीय या मधेशी नेता को पीएम पद पर नहीं बैठने दिया है, और सुशीला कार्की प्रधानमंत्री का चयन उसी सिलसिले को मजबूत करता है।

जेन-जेड को चाहिए कि वे इस धोखे से सबक लें, विद्रोह केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि सत्ता की जड़ों को काटने में है। अगर बालेन जैसे नेताओं को मौका न मिला, तो यह क्रांति अधर में लटक जाएगी, और नेपाल की जनता फिर से वही पुरानी गुलामी में फंस जाएगी।

अंत में, सुशीला कार्की प्रधानमंत्री बनना नेपाल के लिए एक झूठा सुकून है, यह न तो जेन-जेड की जीत है, न ही सच्चा लोकतांत्रिक बदलाव। बालेन शाह जैसे युवा, मधेशी और बौद्ध प्रभाव वाले नेता को दरकिनार करना साबित करता है कि सत्ता अभी भी ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व की रक्षा कर रही है, जो अन्य जातियों को हमेशा बाहर रखती है।

51 मौतों और 1,300 घायलों के बाद भी, अगर सिस्टम वही पुराना खेल खेल रहा है, तो युवाओं को फिर से सड़कों पर उतरना पड़ेगा। नेपाल की राजनीति को सच्ची आजादी तभी मिलेगी जब जातिगत भेदभाव टूटेगा और बालेन जैसे प्रतिनिधि सत्ता में आएंगे।

अन्यथा, यह ‘क्रांति’ महज एक और धोखा साबित होगी, जहां सत्ता के मालिक बदलते हैं लेकिन गुलाम बने रहते हैं। जेन-जेड, जागो—तुम्हारी लड़ाई अभी बाकी है!

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