दिल्ली प्रदूषण संकट: AQI 370 पार, सरकारी लापरवाही उजागर
दिल्ली प्रदूषण संकट आज 17 अक्टूबर 2025 को एक बार फिर गहरा गया है, जहां राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई इलाकों में 300 से ऊपर पहुंच गया। यह केवल सांस लेने लायक हवा का अभाव नहीं है, बल्कि यह केंद्र और दिल्ली सरकार की घोर उदासीनता और आपराधिक लापरवाही का प्रमाण है।
आनंद विहार में 370, वजीरपुर में 328, और जहांगीरपुरी में 324 तक दर्ज किए गए AQI के आंकड़े ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आते हैं।
केंद्र सरकार की नीतियां साल दर साल दोहराई जाती हैं, बिना किसी ठोस बदलाव के। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही ही ‘फॉर्मूलाबाजी’ करार दिया है, जहां हर सर्दी में एक ही पुरानी स्क्रिप्ट चलाई जाती है—चेतावनियां, अस्थायी प्रतिबंध, और फिर भूल जाना।
यह प्रशासनिक कुटिलता नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य के प्रति घोर उदासीनता है, जो दिल्ली को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में हमेशा शीर्ष पर रखती है। 2025 में दिल्ली का औसत वार्षिक AQI 135 रहा, जो 2024 के 169 से थोड़ा बेहतर है, लेकिन अभी भी WHO के सुरक्षित स्तर से कहीं अधिक है, जहां PM2.5 का स्तर 95 µg/m³ से ऊपर बना हुआ है।
यह गिरावट मौसमी कारकों जैसे कम हवा की गति (4-6 mph) और निम्न वेंटिलेशन इंडेक्स (2800-3100 m²/s) से तेज हुई, जो प्रदूषकों को फैलने नहीं देती। केंद्र की ‘एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम’ ने 16 अक्टूबर तक ‘बहुत खराब’ की भविष्यवाणी की, लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया फिर से देरी वाली रही, जहां GRAP-1 को 14 अक्टूबर को ही लागू किया गया जब AQI 211 पार कर गया।
यह पैटर्न 2020 से चला आ रहा है, जब AQI ने 700 को पार किया था, यही कारण है कि हर साल इसी समय दिल्ली में 2 लाख से अधिक लोग श्वसन रोगों के इलाज के लिए अस्पताल भर्ती होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार: प्रदूषण बोर्डों में 55% पद खाली, ‘प्रदूषण का लाइसेंस’ जारी
न्यायपालिका की मजबूरी दर्शाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को खरी-खोटी सुनाई है। कोर्ट ने खुलासा किया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में 55% पद खाली हैं, जो विभाग को लगभग निष्क्रिय बना देता है। अप्रैल 2025 में कोर्ट ने थर्मल पावर प्लांटों पर प्रदूषण नियंत्रण में देरी और वाहनों के उत्सर्जन मानकों की ढीली पकड़ पर कड़ी फटकार लगाई, इसे ‘प्रदूषण का लाइसेंस’ करार दिया।
लेकिन यह आलोचना मात्र शब्द हैं; कार्यान्वयन की कमी से यह एक व्यंग्य बन जाती है। कोर्ट ने सितंबर 2025 तक 204 रिक्त पद भरने का आदेश दिया था, अन्यथा ‘गंभीर अवमानना’ की चेतावनी दी, फिर भी सरकारें बहाने बनाती रहीं।
मई 2025 के आदेश में कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 30 सितंबर तक सभी 204 रिक्तियां भरने का निर्देश दिया था, लेकिन अक्टूबर तक केवल 20% ही भरी गईं, जिससे DPCC लगभग पैरालाइज्ड हो गई।
अप्रैल 2025 में थर्मल प्लांट्स के लिए सख्त उत्सर्जन मानकों की मांग की गई, लेकिन NTPC और HPGCL जैसे प्लांट्स में स्पूरियस पेलेट्स (खतरनाक सामग्री से बने) का उपयोग जारी है, जो PM2.5 को 30% बढ़ा रहा है। जस्टिस ओका ने कहा, “दिल्ली सबसे अधिक प्रभावित है, ऐसी ढील बर्दाश्त नहीं की जा सकती,” लेकिन CAQM की तिमाही रिपोर्ट्स में प्रवर्तन की कमी साफ दिखती है, जहां केवल 40% शिकायतों पर कार्रवाई हुई।
यह न केवल वैकेंसी का मुद्दा है, बल्कि फंड्स के दुरुपयोग का भी है—2024-25 में 500 करोड़ आवंटित, लेकिन केवल 60% खर्च हुआ। कोर्ट की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को है, जहां चीफ सेक्रेटरी को पेश होना पड़ेगा।
राजनीति की नौटंकी: पराली का बहाना और स्थानीय प्रदूषण की अनदेखी
केंद्र सरकार ने फिर से अपनी लचर नीतियों का बोझ राज्यों पर डाल दिया है, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को पराली जलाने का दोषी ठहराते हुए। लेकिन यह एक कुटिल चाल है; वाहनों से 41% प्रदूषण आता है, जो केंद्र की विफल इलेक्ट्रिक वाहन नीति और सार्वजनिक परिवहन की कमी का परिणाम है।
दिल्ली सरकार क्लाउड सीडिंग के लिए केंद्र से मंजूरी मांग रही है, लेकिन देरी से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। यह राजनीतिक नौटंकी है, जहां मोदी सरकार अपनी ‘डबल इंजन’ की विफलता छिपाने के लिए राज्यों को बलि का बकरा बनाती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कोई समन्वित योजना ही नहीं है।
जनता का विश्वास खोना स्वाभाविक है। 2025 में पराली जलाने की घटनाएं 77% घटीं—पंजाब में 392 से 105, हरियाणा में 387 से 70—फ्लड्स के कारण, लेकिन दिल्ली का AQI फिर भी 200 पार कर गया। यह स्थानीय स्रोतों जैसे वाहनों (36% NOx) और उद्योगों (90% SO2) की भूमिका दर्शाता है।
केंद्र ने MSP पर मक्का-ज्वार खरीद की घोषणा की, लेकिन सब्सिडी वाले डीजल (सबसे बड़ा प्रदूषक) पर कोई कदम नहीं। हरियाणा ने किसानों को 1200 रुपये/एकड़ इनाम दिया, लेकिन प्रवर्तन कमजोर रहा, जहां 50% फाइन ही वसूले गए। केंद्र की ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ के तहत 2025 में 1000 करोड़ आवंटित, लेकिन दिल्ली-NCR में केवल 20% उपयोग हुआ, जो दोषारोपण की राजनीति को उजागर करता है।
स्वास्थ्य का आपातकाल: फेफड़े बन रहे हैं सिगरेट के धुएं का शिकार
दिल्ली प्रदूषण संकट अब महामारी का रूप ले चुका है। 2022-2024 में 2 लाख से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हुए, ज्यादातर श्वसन रोगों से। बच्चे, बुजुर्ग और मरीज रोजाना जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, जहां PM2.5 का स्तर 95 µg/m³ से ऊपर है, जो फेफड़ों को सिगरेट की तरह जला रहा है। कैंसर और रूमेटॉइड आर्थराइटिस के मामले बढ़ रहे हैं, प्रदूषित हवा में नवजात शिशु जन्म ले रहे हैं।
सरकार की चेतावनियां व्यर्थ हैं; मास्क पहनना और घर में रहना कोई समाधान नहीं है। यह स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता है, जहां अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी पहले से ही संकट पैदा कर रही है। 2025 में श्वसन रोग 15-20% बढ़े, खासकर बच्चों में अस्थमा और COPD के मामले, जहां 2.2 मिलियन बच्चों के फेफड़े अपरिवर्तनीय क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
बुजुर्गों में हृदय रोग 25% ऊपर, और अस्पतालों में OPD 15% बढ़ी। WHO के अनुसार, दिल्ली की हवा रोज 10 सिगरेट पीने के बराबर है, जो कैंसर और न्यूरोडिजेनरेटिव रोगों को बढ़ावा देती है। 75% परिवारों में कम से कम एक सदस्य प्रभावित है, जहां आंखों की समस्याएं जैसे ड्राई आई सिंड्रोम 20% बढ़ीं हैं।
आर्थिक नुकसान 10,000 करोड़ सालाना हो रहा है, जिसमें खोई उत्पादकता शामिल है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने N95 मास्क और एंटीऑक्सीडेंट डाइट की सलाह दी है, लेकिन अस्पतालों में 30% बेड श्वसन रोगों से भरे हैं, जो सरकारी लापरवाही का प्रमाण है।
बहुआयामी संकट: वाहनों का उत्सर्जन और प्रवर्तन की कमी
पराली जलाने वाले बड़े दोषी हैं, लेकिन केंद्र की नीतियां इसे रोकने में नाकाम साबित हो रहीं हैं। 2009 की ग्राउंडवाटर कंजर्वेशन पॉलिसी ने कटाई और बुआई के बीच समय कम कर दिया, जिससे पराली जलाने की घटनाएं बढ़ीं। वाहनों, उद्योगों और भवनों और इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण से उत्सर्जन अनियंत्रित है; GRAP-1 के तहत अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन प्रवर्तन नाममात्र का है।
सुप्रीम कोर्ट ने फायरक्रैकर्स पर साल भर प्रतिबंध की मांग की, लेकिन ‘ग्रीन क्रैकर्स’ की अनुमति से प्रदूषण बढ़ेगा ही। यह बहुआयामी संकट केंद्र की समग्र विफलता को उजागर करता है, जहां जड़ें, जैसे सब्सिडी वाले डीजल और पुराने वाहनों पर कोई रोक नहीं है।
2025 में पराली का योगदान केवल 13-14% रहा, लेकिन वाहन 41%, स्थानीय बायोमास बर्निंग 23%, और उद्योग 18% हैं। GRAP-1 में एंटी-स्मॉग गन्स, वाटर स्प्रिंकलिंग (605 KL इस्तेमाल) और 12,000 चालान जारी हुए, लेकिन 6414 किमी सड़कों पर मैकेनाइज्ड स्वीपिंग केवल 58% प्रभावी रहा।
हरियाणा-पंजाब में 77% कमी के बावजूद AQI ऊंचा, जो स्थानीय स्रोतों को इंगित करता है। केंद्र की ‘एयर पॉल्यूशन मिटिगेशन प्लान 2025’ में BS-VI वाहनों पर जोर है, लेकिन EoL वाहनों पर ईंधन बंद करने की योजना अप्रैल 2025 से लटकी हुई है।
निर्माण साइट्स पर 500 वर्ग मीटर से ऊपर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, लेकिन 40% मामलों में उल्लंघन जारी। यह विफलता न केवल पर्यावरणीय है, बल्कि आर्थिक भी है, पर्यटन में 1200 करोड़ नुकसान हो रहा है।
वैश्विक बदनामी और ‘विकसित भारत’ के सपने पर धुंध
दिल्ली प्रदूषण संकट भारत की वैश्विक छवि को धूमिल कर रहा है; IQAir के अनुसार, यह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है, जहां AQI 500 पार कर जाता है। यही कारण है कि यहां पर्यटन प्रभावित हो रहा है, आर्थिक नुकसान अरबों में है, और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में यह शर्मिंदगी का विषय बनता है।
मोदी सरकार ‘क्लाइमेट चैंपियन’ बनने का दावा करती है, लेकिन घर में ही सांस घुट रही है। यह न केवल स्वास्थ्य संकट है, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का भी सवाल है, क्या ‘विकसित भारत’ का सपना जहरीली हवा में सांस लेगा?
सरकार की कुटिलता से देश की साख दांव पर लगी हुई है। 2025 में दिल्ली 287 दिनों में 0% WHO सुरक्षित स्तर पर रही, जो वैश्विक रिपोर्ट्स में भारत को ‘फेल’ करार देती है। COP30 से पहले यह छवि हानिकारक है, जहां पर्यटन 1200 करोड़ खो चुका है।
X पर ट्रेंडिंग पोस्ट्स में यूजर्स दिल्ली छोड़ने की बात कर रहे हैं, जैसे लंदन शिफ्ट होने पर चर्चा की जा रहीं है। आर्थिक प्रभाव: स्वास्थ्य पर 10,000 करोड़, कृषि उत्पादन में गिरावट। केंद्र की ‘नेट जीरो 2070’ योजना व्यंग्य लगती है, जब दिल्ली का AQI 999 तक पहुंचा। वैश्विक मीडिया जैसे BBC ने ‘स्मॉग कैपिटल’ कहा, जो भारत की ‘ग्रीन एनर्जी’ दावों को झुठलाता है।
आगे का रास्ता: निष्क्रियता का अंत या जनता का आक्रोश?
प्रदूषण के इस गहराते संकट को रोकने के लिए केंद्र को तत्काल कदम उठाने चाहिए: प्रदूषण बोर्डों में पद भरें, इलेक्ट्रिक बसों की संख्या दोगुनी करें, पराली के लिए वैकल्पिक तकनीक पर सब्सिडी दें, और GRAP को साल भर सक्रिय रखें। क्लाउड सीडिंग और सैटेलाइट मॉनिटरिंग की व्यवस्था को तुरंत लागू करें।
लेकिन यह अंतिम चेतावनी है, यदि केंद्र अपनी निष्क्रियता जारी रखेगा, तो जनता का गुस्सा सड़कों पर उतरेगा। यह सरकारी लापरवाही का अंत होना चाहिए; अन्यथा, दिल्ली का धुंध भारत के भविष्य का आईना बनेगा, जहां सांस लेना भी अपराध हो जाएगा।
‘एयर पॉल्यूशन मिटिगेशन प्लान 2025’ में क्लाउड सीडिंग पायलट, EoL वाहनों पर प्रतिबंध, और AI पोर्टल शामिल हैं, लेकिन कार्यान्वयन 2025 के अंत तक होगा यह मज़ाक नहीं तो और क्या है। हरियाणा-पंजाब में MNREGA से स्टबल कलेक्शन लिंक, और दिल्ली में 6 नए मॉनिटरिंग स्टेशन।
फंडिंग: 1000 करोड़ अतिरिक्त, लेकिन पारदर्शिता जरूरी। जन जागरण: N95 मास्क वितरण, स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेस। यदि 2026 तक 50% कमी न आई, तो PIL केस बढ़ेंगी। सरकार नहीं सुन रहीं है तो केवल क्रांति ही रास्ता ही जनता के पास बचता है। क्या सरकार प्रदूषण पर कार्रवाई करने के लिए जनता के सड़क पर उतरने का इंतजार कर रही है?
दिल्ली प्रदूषण संकट के कई कारण हैं, जिनमें औद्योगिक धुआँ, वाहन उत्सर्जन, पराली जलाना और निर्माण कार्य शामिल हैं। उत्तर भारत की ठंडी हवाएँ प्रदूषकों को नीचे रोक देती हैं, जिससे हवा स्थिर हो जाती है।
पराली जलाने से धुआँ सीधे दिल्ली पहुँचता है।डीज़ल वाहन प्रदूषण का बड़ा स्रोत हैं।धूल और निर्माण सामग्री का खुला परिवहन हवा को और खराब करता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली प्रदूषण संकट का समाधान केवल प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीति सुधार से संभव है।
सरकार और न्यायालय की पहल
दिल्ली प्रदूषण संकट को देखते हुए दिल्ली सरकार ने ‘ग्रेडेड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान’ (GRAP) लागू किया है। इसके तहत प्रदूषण स्तर बढ़ने पर चरणबद्ध कदम उठाए जाते हैं।
निर्माण कार्यों पर अस्थायी रोक लगाई जाती है।निजी वाहनों की संख्या सीमित की जाती है।स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम की सलाह दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और पड़ोसी राज्यों को पराली जलाने पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं, लेकिन स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है। दिल्ली प्रदूषण संकट अब केवल दिल्ली की समस्या नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की चुनौती बन गया है।
दिल्ली प्रदूषण संकट से निपटने के उपाय
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली प्रदूषण संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है। सरकार, उद्योग, किसान और जनता—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी।
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना चाहिए।सार्वजनिक परिवहन को और सुलभ बनाना होगा।पराली के निपटान के लिए वैकल्पिक तकनीक विकसित करनी होगी।
पर्यावरण कार्यकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि अगर दिल्ली प्रदूषण संकट पर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हालात और बदतर हो सकते हैं।



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