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दिल्ली पटाखे प्रतिबंध: दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सुरक्षित

दिल्ली पटाखे प्रतिबंध

दिल्ली पटाखे प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध में ढील देने के संबंध में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र, पर्यावरण विशेषज्ञों और कानूनी प्रतिनिधियों सहित विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शुक्रवार को यह फैसला लिया।

कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह दिवाली के पाँच दिनों के दौरान परीक्षण के तौर पर “फिलहाल” प्रतिबंध हटाने पर विचार करेगी, लेकिन साथ ही जोर देकर कहा है कि उत्सव “कुछ समय सीमा तक ही सीमित” रहेंगे।

पटाखों के इस्तेमाल के लिए सरकार का संतुलित प्रस्ताव

वायु गुणवत्ता संबंधी चिंताओं और त्योहारों के उत्साह के बीच संतुलन बनाने के लिए, केंद्र सरकार ने पटाखों के उपयोग के लिए विशिष्ट समय-सीमा का प्रस्ताव किया है। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया कि वह संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रतिबंध हटाने पर विचार करे। उनके प्रस्ताव के अनुसार:

दिवाली और प्रमुख त्यौहार: रात 8 बजे से 10 बजे तक हरित पटाखे फोड़ने की अनुमति दी जाए।

नए साल की पूर्व संध्या और क्रिसमस: रात 11:45 बजे से 12:30 बजे के बीच हरित पटाखे फोड़ने की अनुमति मिले।

गुरुपर्व: सुबह और शाम एक-एक घंटे का समय निर्धारित किया जाए।

शादियाँ और निजी अवसर: सीमित उपयोग की अनुमति हो।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 26 सितंबर को ही दिल्ली में हरित पटाखों के निर्माण की अनुमति दी थी, हालांकि यह शर्त लगाई गई थी कि इन्हें एनसीआर में नहीं बेचा जाएगा। इस फैसले के बाद, अब दिल्ली पटाखे प्रतिबंध में छूट मिलनी तय मानी जा रही है।

‘नकली’ हरित पटाखों की समस्या और वायु गुणवत्ता की चिंताएं

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध में ढील देने का संकेत दिया है, लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं अभी भी केंद्र में बनी हुई हैं। अदालत ने 2018 और 2024 के बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में किसी सुधार के बारे में भी पूछा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट का ध्यान प्रतीकात्मक कदमों के बजाय मापनीय पर्यावरणीय परिणामों पर है।

हरित पटाखे: समाधान या छलावा?

इस मामले में अदालत की सहायता कर रही न्यायमित्र, वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने नकली हरित पटाखों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि झूठे लेबल के तहत बेचे जा रहे इन पटाखों में अभी भी प्रदूषणकारी रसायनों का उपयोग हो रहा है, भले ही उन्हें पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में विज्ञापित किया गया हो।

क्या हैं हरित पटाखे: इन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI) द्वारा 2018 में विकसित किया गया था। ये पारंपरिक आतिशबाजी का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जिन्हें हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को 30-40% तक कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये बेरियम नाइट्रेट, आर्सेनिक और सीसे जैसे जहरीले रसायनों से मुक्त होते हैं।

तीन मुख्य प्रकार: CSIR-NEERI ने तीन प्रकार के हरित पटाखे बनाए हैं: SWAS (सेफ वाटर रिलीज़र – जलवाष्प उत्सर्जित करता है), STAR (सेफ थर्माइट क्रैकर – कम ध्वनि और धुआँ), और SAFAL (सेफ मिनिमल एल्युमीनियम – धातु-आधारित उत्सर्जन कम)।

स्वास्थ्य जोखिम: दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (DTU) द्वारा 2022 में किए गए शोध के अनुसार, ये पटाखे अभी भी PM2.5 से भी छोटे अति सूक्ष्म कण छोड़ते हैं, जो फेफड़ों और रक्तप्रवाह में गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं और गंभीर श्वसन तथा हृदय संबंधी जोखिम पैदा कर सकते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ये सिर्फ कम प्रदूषण फैलाते हैं, पूरी तरह से हानिरहित नहीं हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 2018 और 2020 के बीच, जब इसी तरह की नीति लागू थी, तब वायु प्रदूषण के स्तर में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई थी। जमीनी स्तर पर हरित और पारंपरिक पटाखों में अंतर करना लगभग असंभव है।

वायु गुणवत्ता का बिगड़ता चक्र और राजनेताओं की प्रतिक्रिया

दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता दिवाली के दौरान कई कारणों से तेजी से बिगड़ती है, जिसमें पड़ोसी राज्यों, खासकर पंजाब में पराली जलाना, प्रतिकूल मौसम, और पटाखों के उत्सर्जन से होने वाली अस्थायी लेकिन गंभीर प्रदूषण वृद्धि शामिल है। पटाखों का यह अस्थायी उपयोग पहले से खराब AQI को खतरनाक स्तर पर धकेल सकता है।

दिल्ली पटाखे प्रतिबंध और सौरभ भारद्वाज का बयान

दिवाली की तैयारियों के बीच, दिल्ली AAP अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने रविवार को कहा कि पटाखों पर प्रतिबंध लागू करना या हटाना, यह विषय सीधे सर्वोच्च न्यायालय की प्रत्यक्ष निगरानी में आता है। उन्होंने याद दिलाया कि न्यायमूर्ति बीआर गवई ने एक महीने पहले ही अपनी राय रखी थी कि अगर पटाखों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, तो इसे केवल एनसीआर में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

1961 की पुनरावृत्ति: एक पुरानी बहस

दिल्ली पटाखे प्रतिबंध पर हालिया बहस नई नहीं है; इसकी जड़ें 1961 तक जाती हैं, जैसा कि अदालत में भी उल्लेख किया गया।

1961 का मुद्दा: 1961 में, डिप्टी गंज समिति ने दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त को पत्र लिखकर बड़े पैमाने पर पटाखों के इस्तेमाल से होने वाले “ध्वनि प्रदूषण” की शिकायत की थी। समिति ने तेज़ आवाज़ वाले पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध और रात 10 बजे के बाद आतिशबाजी पर रोक लगाने का सुझाव दिया था।

उन्होंने कहा था कि “आतिशबाज़ी के दौरान, ऐसा लगता है जैसे बाहर पूरी तरह से युद्ध चल रहा हो।”सरकार की प्रतिक्रिया: निर्माण, आवास और आपूर्ति मंत्रालय में भारत सरकार के सचिव ने उस समय प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि पूर्ण प्रतिबंध अनावश्यक है।

सरकार ने तर्क दिया था कि पटाखों का निर्माण पहले से ही भारतीय विस्फोटक अधिनियम के तहत विनियमित है, और 1958 में “उनके फोड़ने से उत्पन्न होने वाले शोर को कम करने के उद्देश्य से” पटाखों के आकार को कम कर दिया गया था। सरकार ने पुलिस की सतर्कता और कुछ घंटों के लिए उपयोग सीमित करके समस्या को नियंत्रित करने का सुझाव दिया।

उस समय, दिल्ली की आबादी लगभग 26 लाख थी, जो वर्तमान में 2 करोड़ से अधिक है। 1966 में दिल्ली महानगर परिषद की स्थापना तक, मुख्य आयुक्त भारत के राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष अधिकार के तहत दिल्ली का प्रशासन चलाते थे।

अतीत का प्रतिबंध: 2014 से शुरुआत

सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ते प्रदूषण के कारण 2014-15 में पहली बार दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध लगाया था। पिछले साल, प्रतिबंध के बावजूद, शहर धुएँ से भर गया था क्योंकि शाम 6 बजे से आधी रात के बाद तक पटाखों की आवाज़ें सुनाई देती रहीं।

अब, सुप्रीम कोर्ट का आगामी आदेश यह निर्धारित करेगा कि क्या वर्षों के प्रतिबंधों के बाद इस दिवाली पर पटाखों की धूम वापस लौटेगी, या स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं एक बार फिर पारंपरिक उत्सवों पर हावी होंगी।

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