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सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता: करदाताओं पर ₹1.2 लाख करोड़ का बोझ

सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता

भारत सरकार की सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता (Sovereign Gold Bond- SGB) योजना, जिसे 2015 में सोने के आयात को कम करने और घरेलू बचत को औपचारिक चैनलों में मोड़ने के ‘स्मार्ट आइडिया’ के रूप में प्रचारित किया गया था, आज एक वित्तीय आपदा का रूप ले चुकी है।

यह योजना सरकार के कंधों पर लगभग ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक का बोझ लाद चुकी है। संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, मार्च 2025 तक 130 टन सोने के बराबर बकाया बॉन्ड्स का मूल्य ₹67,322 करोड़ था, जो वर्तमान सोने की कीमतों (₹9,284 प्रति ग्राम) पर ₹1.2 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।

यह न केवल नीतिगत अक्षमता का प्रमाण है, बल्कि उन नेताओं और नौकरशाहों की लापरवाही का भी, जिन्होंने जोखिमों का आकलन किए बिना इसे बढ़ावा दिया।

नरेंद्र मोदी बताएं क्या यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ का मजाक नहीं है, जब करदाताओं का पैसा विदेशी सोने के उतार-चढ़ाव की भेंट चढ़ रहा हो?

विश्व गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में घरेलू सोने की मांग 23,000 से 25,000 टन है, लेकिन SGB ने केवल 147 टन ही जुटाए, जो कुल मांग का महज 0.6% है। इससे साफ है कि योजना का मूल उद्देश्य सोने के आयात में कमी, पूरी तरह विफल रहा, जबकि बोझ बढ़ता ही गया।

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सस्ते उधार का दावा, महंगा जुआ

जब योजना शुरू हुई, तो तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे सस्ते उधार की कुंजी बताया था। 2.5% ब्याज दर पर बॉन्ड्स जारी कर सरकार को राजकोषीय घाटा भरने का आसान रास्ता दिखाया गया था। लेकिन सोने की कीमतें 2015 के ₹2,500 प्रति ग्राम से 2025 में ₹9,000 से ऊपर चढ़ने पर यह ‘सस्ता’ कर्ज एक महंगा जुआ बन गया।

कुल 67 ट्रांच में 147 टन सोने के बराबर बॉन्ड्स जारी हुए, जिनसे ₹72,274 करोड़ जुटाए गए। लेकिन अब रिडेम्पशन पर भुगतान वर्तमान बाजार मूल्य पर होना है, जिससे सरकार को मूलधन के अलावा 252% तक का प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है।

आयात घटाने के बजाय 30% की छलांग

इस योजना की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसने आयात कम करने के बजाय बढ़ा दिया है। 2023-24 में $49 अरब का सोना आयात हुआ, जो 30% की छलांग थी। 2024-25 में आयात और बढ़कर $58 अरब तक पहुंच गया है जो पिछले साल के $45.54 अरब से 27% अधिक है, मुख्यतः भारतीय त्योहारों पर मांग और आयात शुल्क में कटौती के कारण है।

क्या यह विडंबना नहीं कि ‘मेक इन इंडिया’ के दौर में हम विदेशी सोने पर ही निर्भर बने रहे? विपक्षी नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया ‘X’ पर इसे ‘पूर्ण फियास्को’ कहा, ‘डेमोक्रेटाइजेशन’ और ‘मेक इन इंडिया’ की तरह। सोशल मीडिया पर चर्चा से साफ है कि जनता इसे एक बड़ी सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता और नीतिगत चूक मान रही है।

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930% बढ़ा ब्याज और देनदारी का बोझ

ब्याज का बोझ तो जैसे ‘चेर्री ऑन टॉप’ है। 2.5% सालाना ब्याज दर बॉन्ड के मूल्य पर चुकाया जाता है, लेकिन सोने की कीमतें बढ़ने से कुल देनदारी 930% तक फूल गई है। 2025-26 के बजट में SGB देनदारी के लिए ₹55,056 करोड़ का अनुमान है, जो पिछले साल के ₹60,566 करोड़ से कम है, लेकिन यह केवल आइसबर्ग का सिरा है, छुपे हुए हिस्से का आकलन बाकी है।

हर छह महीने में ब्याज भुगतान और 2032 तक फैले रिडेम्प्शन से सरकार का खजाना खाली होता जा रहा है। नुकसान की भरपाई के लिए यह पैसा “सीधे जीएसटी और आयकर से आ रहा है, यानी आम आदमी की जेब कट रही है।

विपक्ष ने सही कहा, यह ‘पूर्ण फियास्को’ है, डेमोक्रेटाइजेशन और मेक इन इंडिया की तरह। X पर यूजर्स जैसे @manoj_216 ने इसे ‘930% बोझ’ बताया, जहां निवेशकों को 338% रिटर्न मिला, लेकिन इस बोझ को करदाता भुगत रहे हैं।

हेजिंग के प्रयास और अपर्याप्तता

सरकार ने इसे छिपाने की कोशिश की, लेकिन आंकड़े झूठ नहीं बोलते। आरबीआई ने FY24 में 321 टन सोना जमा किया, जो SGB दायित्व के खिलाफ हेज है, लेकिन कुल 879 टन रिजर्व में भी यह अपर्याप्त साबित हो रहा है। सोने की कीमतों का चढ़ाव इस योजना की कमजोरी को उजागर करता है।

2015 से 2025 तक सोना 252% महंगा हो गया, जबकि योजना में कोई हेजिंग या मूल्य स्थिरीकरण का प्रावधान नहीं था। अगस्त 2024 में 2016 सीरीज के निवेशकों को नुकसान हुआ जब कीमतें गिरीं, लेकिन सरकार को कुल मिलाकर ₹1.12 लाख करोड़ का चूना लगा।

यह मोदी सरकार की नीतिगत भूल का जीता-जागता प्रमाण है, बिना जोखिम आकलन के ‘चतुर’ निर्णय लेना। 2024-25 में आयात 802.8 टन तक पहुंचा, जो पिछले साल से 5% अधिक है, मुख्यतः निवेश मांग और आरबीआई की खरीदारी के कारण। सोशल मीडिया X पर @PEN_Offl जैसे हैंडल्स ने इसे ‘आर्थिक वास्तविकता’ का प्रतीक बताया, जहां लायबिलिटी 930% बढ़ी।

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आयात शुल्क में छेड़छाड़ और तस्करी का बढ़ना

आयात शुल्क पर बार-बार छेड़छाड़—2019 में 12.5% से बढ़ाकर 2022 में 15%, फिर 2024 में घटाकर 6% ने कीमतों को और अस्थिर किया, सोने की तस्करी बढ़ाई और SGB की अपील घटाई।

परिणामस्वरूप योजना का उद्देश्य सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता के साथ विफल हो गया, और देनदारी बेतहाशा बढ़ी। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे अस्थिर नीतिगत निर्णय योजना के मूल उद्देश्य को पटरी से उतार सकते हैं।

योजना का अंतिम संस्कार: नए इश्यू बंद

फरवरी 2024 के बाद नई ट्रांच बंद हो चुकी हैं, क्योंकि यह ‘महंगा उधार’ साबित हो गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2025 बजट में पुष्टि की कि नए बॉन्ड इश्यू नहीं होंगे। लेकिन पुराने बॉन्ड्स का बोझ 2032 तक रहेगा, जब 132 टन सोने का भुगतान करना होगा।

बजट 2025-26 में ₹18,500 करोड़ का आवंटन था, लेकिन कोई नई इश्यू नहीं, जो योजना की विफलता को रेखांकित करता है। यह योजना गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम की तरह औंधे मुँह गिरी है, जहां केवल 21 टन सोना जमा हुआ। दरअसल, नरेंद्र मोदी के इस ‘स्मार्ट’ योजना का अंतिम संस्कार हो चुका है। यह ‘भारत की अर्थव्यवस्था के नीतिगत विफलता का बोझ’ है।

जवाबदेही और आगे की राह

इस सोवरेन गोल्ड बॉन्ड विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनकी सरकार ने इसे धूमधाम से लॉन्च किया, वित्त मंत्री सीतारमण, और आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ, इस सरकारजनित आर्थिक आपदा के लिए सबको जवाबदेह ठहराना चाहिए।

उन्होंने सोने के प्रति भारतीयों की भावनात्मक लगाव को नजरअंदाज किया, जबकि विश्व गोल्ड काउंसिल ने 23,000 से 25,000 टन घरेलू सोने की खपत का अनुमान लगाया था।

विपक्ष की मांग सही है: पारदर्शिता लाओ, अन्यथा यह लोकतंत्र पर सवाल उठाएगा। नेताओं को ‘विकसित भारत’ का सपना दिखाने से पहले अपनी गलतियों का हिसाब दो। X पर @INCKerala ने इसे ‘मोदी सरकार का दूसरा सबसे बड़ा बोझ’ कहा, पहला मोदी खुद।

यह योजना गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम से भी बदतर साबित हुई, जहां केवल 21 टन जुटे। अंत में, निवेशकों को 100-300% रिटर्न मिले, जैसे 2017-18 सीरीज-III में 338% यह तो ठीक है, लेकिन इसका खामियाजा करदाता क्यों भुगते? 2025-26 में प्रीमैच्योर रिडेम्प्शन के लिए RBI ने शेड्यूल जारी किया, लेकिन कुल बोझ ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। दरअसल, देश के करदाताओं के पीठ पर वार से कम नहीं है यह मोदी सरकार का ‘सबसे महंगा उधार’।

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