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कर्नाटक HC में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर X बनाम भारत सरकार

X बनाम भारत सरकार

भारत में X बनाम भारत सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी अब सत्ताधारियों की मर्जी पर निर्भर करती दिख रही है। केंद्र सरकार का ‘सहयोग’ पोर्टल, जिसे स्वावलंबन के नाम पर लॉन्च किया गया है, वास्तव में सेंसरशिप का एक काला जाल बिछा रहा है। अक्टूबर 2024 में लॉन्च हुए इस पोर्टल ने केंद्र, राज्य एजेंसियों और जिला स्तर के 20 लाख अधिकारियों को एक क्लिक पर किसी भी सोशल मीडिया से कोई भी कंटेंट हटाने की बेतहाशा ताकत थमा दी है, और वह भी किसी न्यायिक समीक्षा या प्रक्रिया के बिना।

यह कदम सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 79(3)(b) का सरासर दुरुपयोग है, जो सोशल मीडिया कंपनियों को मिली सुरक्षा को तोड़कर उन्हें अपराधी बनाने का एक हथियार बन गया है। मोदी सरकार का यह कदम न केवल संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का घोर उल्लंघन है, बल्कि यह लोकतंत्र को एक भयानक डिजिटल तानाशाही की ओर धकेलने की एक सोची-समझी साजिश है, जहाँ किसी भी असहमति या आलोचना को तुरंत ‘अवैध’ करार देकर दबाया जा रहा है।

रीढ़विहीन जायंट्स और साहसी X

गूगल, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसी विदेशी टेक कंपनियाँ भारत को सिर्फ एक विशाल बाज़ार मानती हैं। यही कारण है कि इन रीढ़ विहीन कंपनियों ने पहले ही घुटने टेक दिए हैं और सहयोग पोर्टल पर कूदकर अपने ‘जमीर’ को बेच दिया है। ये विदेशी जायंट्स, रिलायंस जैसे स्थानीय कॉर्पोरेट दानवों से टकराव से बचने के लिए, आसानी से मोदी की सेंसरशिप को स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन इस डिजिटल गुलामी के माहौल में, एलन मस्क की सोशल मीडिया X ने साहस दिखाने का फैसला किया। मार्च 2025 में, X ने कर्नाटक हाईकोर्ट में इस ‘सेंसरशिप पोर्टल’ को कानूनी चुनौती देते हुए मुकदमा दायर किया। X बनाम भारत सरकार इस मुकदमे का आधार यह था कि यह पोर्टल आईटी एक्ट की धारा 69A के सुरक्षा घेरे को चकमा देता है, जहाँ बिना सुनवाई के कंटेंट मिटाना सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक श्रेया सिंघल फैसले (2015) का स्पष्ट उल्लंघन है। जहाँ बाकी कंपनियाँ खामोश हैं, वहीं X की यह लड़ाई असल में भारत की डिजिटल आजादी की ढाल बनकर सामने आई है।

कर्नाटक हाईकोर्ट का शर्मनाक फैसला: संविधान की आत्मा पर प्रहार

न्यायिक इतिहास का एक शर्मनाक धोखा 24 सितंबर 2025 को सामने आया, जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने संविधान की आत्मा को कुचलते हुए X की याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने अपने फैसले में हास्यास्पद तर्क दिया कि सोशल मीडिया को ‘अराजक स्वतंत्रता’ में नहीं छोड़ा जा सकता, और सहयोग पोर्टल सार्वजनिक भलाई का उपकरण’ है।

यह तर्क सेंसरशिप को ‘सहयोग’ कहकर वैध ठहराने जैसा है! कर्नाटक हाईकोर्ट ने श्रेया सिंघल के ऐतिहासिक फैसले को यह कहकर नकार दिया कि वह अब ‘पुराना’ हो चुका है। इसके साथ ही, अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में निहित मौलिक आजादी को अनदेखा कर दिया, जो भारत के नागरिकों का हक है। यह निर्णय बॉम्बे हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले से सीधे टकराता है, जिसने इसी तरह के एक तंत्र को असंवैधानिक ठहराया था।

कोर्ट ने X बनाम भारत सरकार के मामले में X के पक्ष को यह कहकर कमजोर करने की कोशिश की कि वह एक ‘विदेशी’ कंपनी है, लेकिन वह यह भूल गई कि X भारत के करोड़ों यूजर्स की आवाज़ का माध्यम है।

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद की आखिरी किरण

29 सितंबर 2025 को X ने घोषणा की कि यह फैसला ‘अवैध’ है, धारा 69A को बायपास करता है, और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलता है। X ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया है, जो इस पूरे मामले में एक उम्मीद की किरण है।

सुप्रीम कोर्ट की अपील में, X केवल अपनी नहीं, बल्कि करोड़ों यूजर्स के अधिकारों की रक्षा की मांग करेगी, क्योंकि यह पोर्टल पुलिस और सरकारी अधिकारियों को मनमानी ताकत देता है—बिना सबूत, बिना कोर्ट की सुनवाई के, किसी की भी पोस्ट हटाने की ताकत।

यह लड़ाई केवल एक प्लेटफॉर्म की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की है। अगर सुप्रीम कोर्ट भी झुक गया, तो भारत का डिजिटल स्पेस एक निगरानी का बियाबान बनेगा, जहाँ असहमति को ‘साइबरक्राइम’ का ठप्पा लगा दिया जाएगा। X बनाम भारत सरकार की यह जंग साबित करती है कि सच्ची आजादी के लिए एक विदेशी रीढ़ भी घरेलू तानाशाही से टकरा सकती है।

विडंबना यह है कि भारत की जनता मूकदर्शक बनी हुई है, जो इस डिजिटल गुलामी की शुरुआत को चुपचाप सहने को तैयार है, जबकि विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज भी सो रहा है। यह समय है जागने का। अगर आज सोशल मीडिया X यह कानूनी लड़ाई हार गई, तो कल आपकी पोस्ट भी एक क्लिक पर गायब कर दी जाएगी।

अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान का आधार स्तम्भ है, न कि सत्ताधारियों का खिलौना। जनता को सड़कों पर उतरना चाहिए, कोर्ट के बाहर आवाज लगानी चाहिए, क्योंकि X बनाम भारत सरकार की इस जंग में X की जीत, भारतीय जनता की जीत होगी। अन्यथा, भारत का ‘स्वावलंबन’ पोर्टल हमेशा के लिए सेंसरशिप का पर्याय बन जाएगा, और हम सब चुप्पी की गुलामी की चेन में जकड़े जाएंगे।

जागो भारत! वरना धीरे-धीरे वह सब अधिकार खो दोगे जो गांधी, अम्बेडकर, नेहरू और सरदार पटेल के प्रयासों से भारत के संविधान द्वारा भारतीयों को दिया गया था!

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