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ईसाई हिंसा पर मोदी सरकार का मौन: लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा

मोदी सरकार का मौन

मोदी सरकार का मौन भारत में ईसाइयों के विरुद्ध बढ़ती दक्षिणपंथी हिंसा को लेकर अत्यंत चिंताजनक है। 2014 से 2024 तक ईसाइयों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में भयावह वृद्धि एक गंभीर राष्ट्रीय संकट का संकेत है। यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम (यूसीएफ) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में दर्ज मात्र 127 घटनाएं 2024 में बढ़कर पूरे वर्ष में 834 हो गईं।

यह 556% से अधिक की वृद्धि है, जो नवंबर तक 745 और दिसंबर में अतिरिक्त मामलों से पूरी हुई। यह वृद्धि कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पैटर्न है जो धार्मिक असहिष्णुता की जड़ों से पनप रहा है, जिसमें कट्टर हिंदुत्ववादी संगठनों की भूमिका स्पष्ट है।

दशक भर में कुल 4,959 से अधिक घटनाएं हुईं, जिसमें पादरियों पर हमले, प्रार्थना सभाओं का विघटन, पादरियों की पिटाई, सामाजिक बहिष्कार और यहां तक कि हत्याएं शामिल हैं।

इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (ईएफआई) ने 2024 में 640 सत्यापित मामले दर्ज किए, जबकि ओपन डोर्स की वर्ल्ड वॉच लिस्ट 2025 में भारत 11वें स्थान पर है, जहां 380 मिलियन से अधिक ईसाई उच्च स्तर की उत्पीड़न का शिकार हैं।

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अनरिपोर्टेड मामले और पुलिस की भूमिका

ये आंकड़े केवल यूसीएफ की टोल-फ्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों पर आधारित हैं। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की रिपोर्ट बताती है कि पुलिस अक्सर हमलावरों का पक्ष लेती है, इसलिए अनरिपोर्टेड मामले इससे दोगुने हो सकते हैं। यह हिंसा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि यह संस्थागत है।

पुलिस अक्सर हमलावरों का पक्ष लेती है या पीड़ितों को समझौता करने को मजबूर करती है। एफआईआर दर्ज करने में असफलता और अदालती देरी उत्पीड़न के विरुद्ध न्याय को कमजोर करती है।

कट्टर हिंदुत्व: ‘विदेशी धर्म’ का आरोप और धर्मांतरण का बहाना

इस हिंसा की वृद्धि का प्रमुख कारण कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा का उदय है, जो ईसाइयों को ‘विदेशी धर्म’ का अनुयायी मानकर उन्हें राष्ट्र-विरोधी ठहराती है।

कट्टरपंथी संगठन जैसे बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आरोप लगाते हैं कि ईसाई भारत में ‘जबरन धर्मांतरण’ कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता में ये शांतिपूर्ण प्रार्थनाएं, सामाजिक सेवा या गरीबों को सहायता हैं। हमलावर खुलेआम सोशल मीडिया पर लाइवस्ट्रीम करते हैं, जिससे नकल बढ़ती है।

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एंटी-कन्वर्जन कानूनों का दुरुपयोग बना उत्पीड़न का हथियार

12 राज्यों—उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और राजस्थान—में लागू एंटी-कन्वर्जन कानूनों का दुरुपयोग ने पुलिस को उत्पीड़न का हथियार पकड़ा दिया है। भाजपा शासित राज्यों, उत्तर प्रदेश (209 घटनाएं), छत्तीसगढ़ (165) और राजस्थान (40) में सबसे अधिक हिंसा दर्ज हुई।

उत्तर प्रदेश में 2024 संशोधन ने किसी को भी शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी, जिससे आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है; परिणामस्वरूप 1629 ईसाई बिना ट्रायल हिरासत में रखा गया है और 547 को सजा हुई। ये कानून ‘जबरन धर्मांतरण’ की व्याख्या को इतना अस्पष्ट रखते हैं कि ईसाइयों के लिए प्रार्थना सभा भी अपराध बन गयी है।

आदिवासी और दलित ईसाई सबसे अधिक प्रभावित

उत्पीड़न के शिकार पीड़ितों में आदिवासी और दलित ईसाई सबसे अधिक प्रभावित हैं, जो कुल घटनाओं के 70% से अधिक हैं। दिसंबर 2024 में ओडिशा में दो आदिवासी महिलाओं को पेड़ से बांधकर पीटा गया, उनके कपड़े फाड़े गए और उनसे ‘घर वापसी’ की मांग की गई। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मई 2024 में जिमे कावासी के पति को मार डाला गया क्योंकि वे ईसाई थे।

अक्टूबर में 12 महिलाओं और 24 आदिवासी ईसाइयों पर विशेष हमले हुए। यूसीएफ के अनुसार, 2024 में 392 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई, पर केवल 47 में कार्रवाई की गयी। अधिकांश में न्याय नहीं मिला क्योंकि पुलिस समझौता थोपती है या पीड़ितों पर ही मुकदमा चलाती है।

मणिपुर: ईसाई विरोधी पैटर्न का दर्दनाक हिस्सा

मणिपुर में 2023 से जारी जातीय हिंसा ने इस ईसाई-विरोधी पैटर्न को और गहरा किया। इस हिंसा में 250 से अधिक मौतें, 70,000 विस्थापन और 700 से अधिक चर्च जलाए गए। हालांकि यूसीएफ ने इसे अपने आंकड़ों में अलग रखा, पर यह स्पष्ट रूप से ईसाई-विरोधी भावना का हिस्सा है।

मेईतेई ईसाइयों को बुरी तरह निशाना बनाया गया, जहां दोनों पक्षों से हमले हुए। ये घटनाएं महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाती हैं, जहां लैंगिक हिंसा का भी समावेश होता है। आदिवासी क्षेत्रों में आरएसएस की ‘घर वापसी’ मुहिम ने हजारों ईसाइयों को जबरन हिंदू बनाया। अब तो देश में रविवार को 4-5 चर्च हमले आम हैं।

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केंद्र सरकार की दोहरी नीति और न्याय से इनकार

इस मामले में केंद्र की बीजेपी सरकार की प्रतिक्रिया दोहरे चरित्र की है। प्रधानमंत्री मोदी विदेशों में ईसाई उत्पीड़न पर दुःख व्यक्त करते हैं और क्रिसमस समारोहों में भाग लेते हैं, पर घरेलू हिंसा पर मौन रहते हैं। गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में यूसीएफ के आंकड़ों को ‘अतिरंजित’ बताया, दावा किया कि 495 में से 363 घटनाएं पुलिस को रिपोर्ट ही नहीं हुईं।

यूएससीआईआरएफ ने 2025 रिपोर्ट में भारत को ‘विशेष चिंता वाला देश’ घोषित किया, जिसकी छह वर्षों से सीपीसी के रूप में सिफारिश की गई, पर अमेरिका ने नहीं माना। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में ईसाई प्रतिनिधित्व वर्षों से शून्य है। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में उत्तर प्रदेश संशोधन पर स्टे दिया, पर केंद्र सरकार ने उत्पीड़न को नकारते हुए याचिकाओं को ‘झूठा नैरेटिव’ कहा।

मणिपुर में केंद्र और राज्य सरकार की निष्क्रियता पर कोर्ट ने फटकार लगाई, लेकिन फिर भी पुनर्वास बेहद धीमा है। दुखद बात यह है कि हमलावर सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, और इसी कारण मोदी सरकार का मौन इस अन्याय को संस्थागत समर्थन देता प्रतीत होता है।

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बहुलतावादी आत्मा खतरे में: आगे की राह

यह संकट भारत के लोकतंत्र की नींव को हिला रहा है। संविधान की धारा 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देती है, पर कानूनों का दुरुपयोग और मोदी सरकार का मौन इसे व्यर्थ कर रही है। दक्षिणपंथी सरकार के नेतृत्व में तमाम संवैधानिक निर्देश खूंटी पर टांग दिए गए हैं जिनमें संविधान का अनुच्छेद 25 भी शामिल है।

ईसाई, जो मात्र 2.3% आबादी हैं, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में विशेष योगदान देते हैं (मिशनरी स्कूलों में 60% गैर-ईसाई बच्चे पढ़ते हैं), उनके परिवार अब डर के साए में जीते हैं। मोदी सरकार का मौन इस बात का द्योतक है कि यह लड़ाई सिर्फ 2.3% की नहीं, बल्कि यह लड़ाई संविधान को मानने वाले प्रत्येक भारतीय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने एंटी-कन्वर्जन कानूनों पर स्टे दिए हैं, पर पूर्ण निरस्ती जरूरी है। सरकार को तटस्थ जांच, कानूनों में सुधार, कट्टरपंथियों पर कार्रवाई और अल्पसंख्यक आयोगों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा, नहीं तो भारत की बहुलतावादी आत्मा खतरे में पड़ जाएगी।

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