Loading Now

स्वतंत्रता का संतुलन: नियम के दायरे में आज़ादी क्यों है ज़रूरी?

स्वतंत्रता का संतुलन

स्वतंत्रता का संतुलन “Freedom with rules” यानि नियम के दायरे में स्वतंत्रता का गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता और नियम दोनों समाज, कानून तथा मानव व्यवहार के मूलभूत स्तंभ हैं।

स्वतंत्रता का अर्थ सामान्यतः अपनी इच्छानुसार कार्य करने की शक्ति है, किन्तु यदि इसकी कोई सीमाएँ नहीं हों तो समाज अराजकता और असमानता से भर सकता है इसीलिए, हर लोकतांत्रिक एवं सभ्य समाज में स्वतंत्रता के साथ-साथ उसके कुछ तार्किक और उचित प्रतिबंध भी आवश्यक हैं, ताकि अन्य लोगों के अधिकार और सामाजिक व्यवस्था सुरक्षित रह सके।

इसे भी पढ़े :-बी सुदर्शन रेड्डी: मानवाधिकार और न्यायिक स्वतंत्रता के प्रतीक!

स्वतंत्रता और कानून का अटूट संबंध

स्वतंत्रता और कानून के आपसी संबंध की बात करें तो ‘rule of law’ यानी कानून का शासन वह व्यवस्था है, जिसमें सभी नागरिक, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, एकसमान रूप से कानून के अधीन होते हैं।

ऐसे कानून वह स्पष्ट ढांचा बनाते हैं जिसके भीतर प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद के अनुरूप कार्य कर सकता है। औपचारिक और व्यवहारिक रूप से लागू हुए नियम स्वतंत्रता को नियंत्रित करते हैं, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता अनुशासन और समानता के दायरे में बनी रहती है। यहाँ स्वतंत्रता का संतुलन बनाए रखने में कानून की भूमिका निर्णायक होती है।

दर्शनशास्त्र में स्वतंत्रता के स्वरूप

दर्शनशास्त्र में स्वतंत्रता के दो मुख्य स्वरूप माने गए हैं– नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty) और सकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty)। नकारात्मक स्वतंत्रता अभिप्रेत व्यवहार करने में बाधाओं की अनुपस्थिति है, जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्तिगत और सामाजिक विकास की संभावनाओं तक पहुँचने का अवसर देती है।

दोनों ही स्वरूपों में तर्कसंगत और संतुलित नियम आवश्यक हैं, जो किसी की स्वतंत्रता का हनन किए बिना सामूहिक हित को आगे बढ़ाते हैं।

नियमों की आवश्यकता: अराजकता से बचाव का मार्ग

स्वतंत्रता के साथ नियम आवश्यक क्यों हैं, इसे उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि व्यक्तियों को पूरी छूट हो, बिना किसी सामाजिक या कानूनी सीमा के, तो उनके विचार, आचरण व कार्य दूसरों को गम्भीर हानि पहुँचा सकते हैं।

मान लीजिए, यदि सड़क पर ट्रैफिक के कोई नियम न हों तो सड़क पर गाड़ियाँ टकरा जाएँगी और दुर्घटनाएँ आम हो जाएँगी। ऐसे में नियमों की जरूरत इसीलिए होती है कि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता, दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन न करे। यही वह बिंदु है जहाँ स्वतंत्रता का संतुलन स्थापित करना अपरिहार्य हो जाता है।

इसे भी पढ़े :-स्वतंत्रता के बाद सरकारों ने मूर्खतापूर्ण समाजवाद के जरिए भारत की विरासत को गंवाया: नानी पालखीवाला

प्रतिबंधों की कसौटी: तर्कसंगत और न्यायसंगत नियम

फिर भी, यह आवश्यक है कि लगाए गए सभी नियम तर्कसंगत, न्यायसंगत, ‘उचित प्रतिबंध’ (Reasonable Restrictions) की कसौटी पर खरे उतरते हों। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये प्रतिबंध कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा तय होते हैं, ताकि वे किसी व्यक्ति विशेष या समूह की अभिव्यक्ति, कार्य, या विचार पर अनावश्यक दमन न करें।

भारत के संविधान में व्यक्तिगत अधिकार, विशेषतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर भी ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘शिष्टाचार’, ‘राज्य की संप्रभुता’ आदि के आधार पर सीमाएँ तय की गई हैं। यह संवैधानिक ढाँचा सुनिश्चित करता है कि स्वतंत्रता का संतुलन बना रहे।

सामाजिक स्थिरता और सह-अस्तित्व को बढ़ावा

व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो स्वतंत्रता के साथ नियम, समाज में स्थिरता, सुरक्षा और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देते हैं। यह हर व्यक्ति को अपनी पहचान और अभिव्यक्ति की छूट देता है, परंतु साथ ही तकनीकी, वैज्ञानिक, और सामाजिक सीमाओं का पालन अनिवार्य बना कर समाज की ‘सामूहिक स्वतंत्रता’ को संरक्षित भी करता है।

व्यक्तिगत और सामाजिक जिम्मेदारी इन्हीं नियमों के दायरे में आकर विकसित होती है।

इसे भी पढ़े :-स्वतंत्रता दिवस 2025 संदेश: देशभक्ति उद्धरण और लाल किला समारोह

नियम विहीन स्वतंत्रता: एक आदर्श कल्पना

अंत में, बिना नियमों के स्वतंत्रता मात्र एक आदर्श कल्पना बनकर रह जाती है, जो समाज में समानता और न्याय को खतरे में डाल सकती है।

टिकाऊ और संवेदनशील समाज की नींव यही है कि प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों और राष्ट्रहित को भी समझे और उनके अनुरूप अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखे।

इसे भी पढ़े :-केबीसी 17 स्वतंत्रता दिवस: अधिकारियों की उपस्थिति से विवाद।

उन्नत समाज की प्रमुख शर्त: जिम्मेदारी और नियंत्रण

“स्वतंत्रता के साथ नियम” मानव समाज के संतुलित, सकारात्मक और सामूहिक विकास की प्रमुख शर्त है, जिससे मानवाधिकारों की गरिमा बनी रहती है, जोकि एक विकसित, सभ्य और उन्नत समाज के लिए बेहद आवश्यक है।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed