बिहार: मोदी शाह का महाभारत, लोकतंत्र का ‘चीर हरण’ और वोट चोरी
मोदी शाह का महाभारत 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में एक नए ‘कुरुक्षेत्र’ की कहानी लिख गया। इस चुनावी युद्ध में, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार अप्रत्यक्ष रूप से ‘शकुनि’ की भूमिका में उतर आए। जिस तरह महाभारत में शकुनि ने पासे की बाजीगरी से पांडवों का राज्य हड़प लिया था, उसी तरह बिहार में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के नाम पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगा।
ड्राफ्ट रोल से 65 लाख नाम काट दिए गए, और अंतिम रोल में 3.66 लाख नाम और हटाए गए। हालांकि, 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए, जिसके बाद कुल 7.42 करोड़ मतदाताओं के साथ चुनाव का एलान हुआ। विपक्ष ने इस प्रक्रिया को सीधे-सीधे “चुनावी साजिश” करार दिया।
विशेष रूप से मुस्लिम बहुल और विपक्षी समर्थक क्षेत्रों में यह कटौती दर 10-15% तक पहुंच गई थी। कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसे “वोट चोरी” बताया, जबकि राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मतदाता सूची जारी करने की मांग की, जिस पर कोर्ट ने 56 घंटों में जिला वेबसाइटों पर सूची अपलोड करने का आदेश दिया था।
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ज्ञानेश कुमार पर निष्पक्षता बनाम सत्ता की कठपुतली बनने का आरोप
निर्वाचन आयोग की इस कार्रवाई के पीछे की मंशा पर गहरे सवाल खड़े हुए। परिणाम चौंकाने वाले थे: एनडीए ने 202 सीटें कब्जा लीं (बीजेपी 88, जेडीयू 84)। विपक्ष ने इस परिणाम को शकुनि द्वारा कराए गए द्रौपदी के चीर हरण के समान बताया—बिहार के जनमत का चीर हरण।
इसे केवल संयोग नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित धोखा कहा गया, जहां ईसीआई पर बीजेपी का साथ देकर लोकतंत्र को अधमरा करने का आरोप लगा। सबसे बड़ा सवाल तब उठा जब असम को SIR से छूट मिली, जबकि बिहार में यही रिवीजन तेजी से लागू किया गया।
यह बताता है कि क्या निर्वाचन आयोग निष्पक्षता की बजाय सत्ता की कठपुतली बन गया है? हालांकि, अदालतों ने साक्ष्य मांगकर विपक्षी आवाजों को शांत करा दिया, लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर #VoteChori ट्रेंड लाखों लोगों की आवाज बन कर उभरा, जिसने इसे महज राज्य का नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र का संकट बताया।
दुर्योधन का अहंकार और ‘महिला-युवा’ का नया फॉर्मूला
सिंहासन की लालसा में अंधे नरेंद्र मोदी को इस चुनावी कथा में ‘दुर्योधन’ की तरह पेश किया गया। जिस तरह दुर्योधन अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था, वैसे ही मोदी ने बिहार में एक नया चुनावी समीकरण “महिला-युवा” (MY) फॉर्मूला गढ़ा। उन्होंने जंगलराज का भय दिखाया और कल्याण योजनाओं का लॉलीपॉप थमाकर वोट माँगा।
लेकिन सच्चाई यह थी कि बिहार की बेरोजगारी दर (15-29 वर्ष के युवाओं में) 9.9% (2023-24) थी, जो 2018-19 के 30.9% से भले ही घटी हो, लेकिन राष्ट्रीय औसत से दोगुनी थी।
50 लाख से ज्यादा बिहारियों को दिल्ली-मुंबई की सड़कों पर धकेलने वाला प्रवासन का दर्द दबा दिया गया। मोदी ने अपनी 14 रैलियों और 7 दौरों में, मुजफ्फरपुर से चंपारण तक, “कोई प्रवासन नहीं” का वादा किया। हालांकि, 9 लाख करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का दावा खोखला साबित हुआ, क्योंकि ग्रामीण बिहार में सड़कें टूटी रहीं।
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अमित शाह का ‘दुशासन तंत्र’ और मल्लाह वोटों की लूट
गृह मंत्री अमित शाह इस राजनीतिक मोदी शाह का महाभारत में ‘दुशासन’ की भूमिका में दिखाई दिए, जो बिना सोचे-समझे हिंसा का सहारा लेते हैं – चाहे वह जंगलराज का डर फैलाना हो या सीट शेयरिंग में छोटे दलों को कुचलना। शाह ने 2020 में चिराग पासवान को तोड़कर जेडीयू को बचाया था, और 2025 में मुकेश साहनी जैसे सहयोगियों को हेलीकॉप्टर और डिप्टी सीएम का लालच देकर मल्लाह वोटरों के वोट को लूटा।
शाह का चाणक्य प्लान स्पष्ट था: 40 क्लस्टर्स में आक्रामक कैंपेन, 100+ विद्रोही उम्मीदवारों से मुलाकात कर उन्हें मनाना, और एलजेपी-जेडीयू वर्कर्स के बीच समन्वय बैठकें कर वोट ट्रांसफर सुनिश्चित करना।
नीतीश कुमार को “टाइगर जिंदा है” का झुनझुना थमा दिया गया, जबकि असल सूत्रधार शाह ही थे। उन्होंने बिहार में रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर का वादा कर “गोला-बारूद“ फैक्ट्री का सपना बेचा।
आरजेडी का पतन और राजनीतिक बलात्कार
शाह की रणनीति का परिणाम यह हुआ कि आरजेडी 75 से गिरकर 25 सीटों पर सिमट गई, जिसे विपक्ष ने दुशासन द्वारा द्रौपदी के वस्त्र खींचे जाने जैसा ‘राजनीतिक बलात्कार’ बताया, जहां अल्पसंख्यकों और पिछड़ों का “चीर हरण” या वोट चोरी किया गया।
X पर #AmitShahBihar ने उनकी माइक्रो-मैनेजमेंट की तारीफ की, लेकिन विपक्ष ने इसे “मसल पावर” का नाम दिया। चिराग पासवान की एलजेपी(आरवी) को 19 सीटें देकर दक्षिणी बिहार में दलित वोट लूटा गया।
शाह की रणनीति ने एनडीए को 48% वोट शेयर दिलाया, लेकिन यह एकजुटता नहीं, बल्कि विपक्ष की फूट का फायदा था, खासकर कांग्रेस-आरजेडी की 12 सीटों पर सीधी टक्कर ने महागठबंधन को नेस्तनाबूद कर दिया। एनडीए की 47% वोट शेयर से 202+ सीटें पासे की बाजीगरी ही थी।
कौरवों का त्रिमूर्ति गठजोड़ और विपक्ष का वनवास
शकुनि (ज्ञानेश कुमार), दुर्योधन (नरेंद्र मोदी), और दुशासन (अमित शाह) का यह त्रिमूर्ति गठजोड़ बिहार को लूटने में सफल रहा, जिसने देश को कुरुक्षेत्र की ओर धकेल दिया। मोदी शाह का महाभारत में कौरवों ने मिलकर पांडवों को वनवास भेजा, वैसे ही मोदी-शाह-कुमार ने SIR और EVM की आड़ में विपक्ष को 5 वर्ष के लिए वनवास भेज दिया।
कांग्रेस की स्ट्राइक रेट 9.8% पर सिमट गई, जबकि जेडीयू-बीजेपी ने 90%+ हिट रेट से सफाया कर दिया। विपक्ष के आरोप—पैसे की बरसात (मॉडल कोड के बावजूद 10,000/-रूपये नकदी का वितरण), बूथ कैप्चरिंग, वोटर लिस्ट मैनिपुलेशन—सब सत्य थे, लेकिन अदालतों में साक्ष्य मांगकर चुप करा दिया गया।
सासाराम में स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर ट्रक घुसना और CCTV बंद होना, EVM की फोटो पोस्ट करने पर FIR, ये सब सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जहां #EVMRigging ने लाखों व्यूज बटोरे।
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कल्याणकारी योजनाएँ बनाम असली विकास की हकीकत
यह “वोट चोरी” का महाभियोग था, जहां लोकतंत्र का चीर हरण हो चुका। एनडीए की जीत “सुशासन” नहीं, बल्कि अधिनायकवाद की शुरुआत है। बिहार में 67% वोटर टर्नआउट का रिकॉर्ड दर्ज हुआ, जिसमें 71.6% महिला टर्नआउट (पुरुषों के 62.8% से 9 पॉइंट ज्यादा) ने महिला वोट की ताकत दिखाई।
यह एनडीए की कल्याण योजनाओं (लाड़ली बेटी, 1 करोड़ लखपति दीदी) का नतीजा था, जो विपक्ष के “3 करोड़ नौकरियां” वादे से ज्यादा विश्वसनीय लगा।
हालांकि, बिहार का प्रति व्यक्ति आय 32,227 रुपये था, जो राष्ट्रीय औसत का तीसरा हिस्सा है – यह मोदी-नीतीश के “विकसित भारत” की हकीकत है। 50 लाख युवाओं को सताने वाला प्रवासन का दर्द आज भी कायम है।
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पांडवों का सबक और 2029 का कुरुक्षेत्र
महागठबंधन ‘पांडवों’ की तरह कमजोर पड़ा, लेकिन इस हार में सबक निहित है। तेजस्वी यादव ने रोजगार और प्रवासन पर जोर दिया, रघोपुर विधानसभा सीट से 14,532 वोटों से जीतकर परिवार का गढ़ बचाया, लेकिन आरजेडी 25 पर सिमट गई। कांग्रेस की कमजोरी, राहुल की अनुपस्थिति (केवल 2 रैलियां), और 7.9% वोट शेयर ने गठबंधन को बर्बाद किया।
जन सुराज जैसी नई ताकतें उभरीं, लेकिन प्रशांत किशोर का सपना चूर हुआ, 200+ सीटों पर लड़कर 0 सीटें और 3.5% वोट शेयर मिला। एआईएमआईएम की 5 सीटें मुस्लिम वोट स्प्लिट का सबूत थीं।
विपक्ष को अब महाभारत के पांडवों की तरह एकजुट होना होगा, चुनाव सुधार, EVM जांच, और अदालती लड़ाई के लिए। अगर यही चलन रहा, तो 2029 का लोकसभा कुरुक्षेत्र होगा।
जनता ने रिकॉर्ड 67% टर्नआउट से ताकत तो दिखाई, लेकिन अब समय है कि देश की जनता कौरवों के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को आजाद कराए। जय हिंद!
भारतीय राजनीति में मोदी शाह का महाभारत लगातार नए रणनीतिक मोड़ दिखा रहा है, जहां चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक पकड़ निर्णायक बनती जा रही है।



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