शिक्षा संघ का दखल: VBSA बिल और सैनिक स्कूलों का विवाद
शिक्षा में संघ का दखल अब नीतिगत स्तर पर दिखने लगा है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) बिल 2025 उच्च शिक्षा के नियमन को केंद्रीकृत करने का एक और प्रयास है, जो एनईपी 2020 के दिखावटी वादों से पूरी तरह विपरीत है। एनईपी में फंडिंग और नियमन को अलग रखने की बात कही गई थी, लेकिन यह बिल मौजूदा नियामक संस्थाओं को खत्म कर एक नया केंद्रीय अधिष्ठान बनाने का प्रस्ताव करता है।
यह कदम मोदी सरकार की शिक्षा को अपने नियंत्रण में लेने की रणनीति को उजागर करता है। इससे संस्थानों की स्वायत्तता खत्म हो रही है और कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट बढ़ रहा है, क्योंकि केंद्रीय सरकार को शिक्षा पर सीधा दखल देने की शक्ति मिल जाएगी।
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सार्वजनिक शिक्षा को कमजोर करने की रणनीति
मोदी सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियां स्पष्ट हैं, जहां सार्वजनिक शिक्षा को कमजोर किया जा रहा है। पिछले दशक में लाखों सरकारी स्कूल बंद किए गए और शिक्षा बजट को जीडीपी के 6% तक पहुंचाने का वादा झूठा साबित हुआ। शिक्षा में संघ का दखल केवल विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि अब उच्च शिक्षा में भी निजीकरण और केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इस बिल से राज्य सरकारों के अधिकार छीने जा रहे हैं, जो संघीय ढांचे का खुला उल्लंघन है। आलोचक सही कहते हैं कि यह शिक्षा को कॉर्पोरेट और राजनीतिक हितों के हवाले करने की साजिश है।
सैनिक स्कूलों का ‘भगवाकरण’ और निजी भागीदारी
इस सरकार का एक और बड़ा घोटाला सैनिक स्कूलों का है। मोदी सरकार ने 2021 में 100 नए सैनिक स्कूलों की योजना शुरू की, लेकिन इनमें से अधिकतर को आरएसएस से जुड़े संगठनों और भाजपा नेताओं को सौंप दिया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2022-2023 में हस्ताक्षरित 40 समझौतों में से 62% से अधिक आरएसएस की शिक्षा शाखा ‘विद्या भारती’, संघ से संबद्ध एनजीओ और भाजपा नेताओं से जुड़े संस्थानों को दिए गए।
यह स्पष्ट रूप से शिक्षा में संघ का दखल दर्शाता है, जहां सेना की तैयारी करने वाले संस्थानों को हिंदुत्व विचारधारा से लैस किया जा रहा है।
सांप्रदायिक नीतियों और पक्षपात का आरोप
सैनिक स्कूलों को आरएसएस के हवाले करना मोदी सरकार की शिक्षा विरोधी और साम्प्रदायिक नीतियों का जीता जागता सबूत है। जहां पहले 33 सैनिक स्कूल सरकारी थे, अब निजी भागीदारी के नाम पर संघ परिवार को लाभ पहुंचाया जा रहा है। विद्या भारती के सात स्कूलों को सैनिक स्कूल का दर्जा मिला है।
किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान को यह मौका नहीं दिया गया, जो पक्षपात को साफ दिखाता है। इससे आने वाले सैन्य अधिकारियों में धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि संघ की विचारधारा ‘हिंदुत्व और अतिराष्ट्रवाद’ के नाम पर नफरत फैलाती है।
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NEP 2020 और बाजारू शिक्षा का संकट
एनईपी 2020 को जल्दबाजी में लागू कर मोदी सरकार ने शिक्षा को बाजारू बना दिया है, जहां फंडिंग की कमी से गरीब छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। शिक्षा में संघ का दखल इस पैटर्न को और मजबूत करता है, जहां केंद्रीकरण के बहाने राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ाया जा रहा है।
सैनिक स्कूलों की तरह ही उच्च शिक्षा में भी एक विशिष्ट विचारधारा थोपने का खतरा मंडरा रहा है। सरकार का दावा सुधार का है, लेकिन हकीकत में यह शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता को भारी नुकसान पहुंचा रही है।
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सेना के राजनीतिकरण की खतरनाक कोशिश
शिक्षा विरोधी नीतियों के उदाहरणों में सैनिक स्कूलों का भगवाकरण सबसे खतरनाक है। आरएसएस से जुड़े संगठनों को सैनिक स्कूल चलाने का ठेका देकर मोदी सरकार सेना का भी राजनीतिकरण करने पर तुली है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे ‘सेना का साम्प्रदायीकरण’ बताया है, जो सही प्रतीत होता है।
फंडिंग कटौती, स्कूल बंदी और अब यह केंद्रीकरण, सब मिलकर सार्वजनिक शिक्षा को खत्म करने की एक बड़ी साजिश लगते हैं, जिसका उद्देश्य केवल एक खास एजेंडे को आगे बढ़ाना है।
संस्थानों की स्वायत्तता पर अंतिम प्रहार
VBSA बिल 2025 के माध्यम से केंद्र सरकार ने अपनी नियंत्रणकारी मंशा साफ कर दी है। संस्थानों की स्वायत्तता को दरकिनार कर सभी शक्तियों को एक ही केंद्र में समाहित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। शिक्षा में संघ का दखल बढ़ने से अब स्वतंत्र शोध और अकादमिक स्वतंत्रता की गुंजाइश खत्म होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय उसे सरकारी विभाग में तब्दील कर देगा।
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राष्ट्र की एकता पर हमला
अंत में, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल (VBSA) 2025 और सैनिक स्कूलों का आरएसएस को सौंपना मोदी सरकार की शिक्षा को हथियार बनाने की नीति को बेनकाब करता है। एनईपी के नाम पर स्वायत्तता छीनी जा रही है, जबकि संघ की विचारधारा थोपी जा रही है।
यह नीति न केवल शिक्षा विरोधी है, बल्कि राष्ट्र की एकता और सेना की धर्मनिरपेक्षता पर हमला है। ऐसी नीतियों को तुरंत रोका जाना चाहिए, वरना शिक्षा सशक्तिकरण का माध्यम नहीं, विभाजन का औजार बन जाएगी।



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