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 “यूपी मतदाता सूची महासफाई”2.89 करोड़ नाम कटने से मचा भारी सियासी

यूपी मतदाता सूची महासफाई

यूपी मतदाता सूची महासफाई उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त एक नया और बेहद संवेदनशील मोर्चा खुल गया है। राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया 26 दिसंबर 2025 को आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई है, लेकिन इसके जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

प्रदेश के कुल 15.44 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 18.7 प्रतिशत यानी 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए जाने की कतार में हैं।

चुनाव आयोग इसे पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी प्रशासनिक “साफ-सफाई” करार दे रहा है, जिसका उद्देश्य फर्जी, मृत और दोहरे नामों से चुनावी प्रक्रिया को मुक्त करना है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या ने लोकतांत्रिक शुचिता और राजनीतिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आंकड़ों का गणित: आखिर क्यों बाहर हो रहे हैं करोड़ों वोटर?

इस महाभियान के तहत जो 2.89 करोड़ नाम चिन्हित किए गए हैं, उनका वर्गीकरण बेहद चौंकाने वाला है। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस सूची में 1.26 करोड़ लोग ऐसे हैं जो स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर जा चुके हैं यानी ‘माइग्रेटेड’ श्रेणी में हैं। इसके अलावा 46 लाख मृतक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि 23.70 लाख नाम ऐसे पाए गए जो ‘डुप्लीकेट’ या दोहराव की श्रेणी में आते हैं।

एक बड़ा हिस्सा 83.73 लाख उन मतदाताओं का है जो जांच के दौरान अपने दिए गए पते पर नहीं मिले यानी ‘अनुपस्थित’ पाए गए। वहीं, 9.57 लाख लोग ऐसे हैं जिन्होंने समय पर आवश्यक फॉर्म जमा नहीं किए। आयोग का दावा है कि फर्जीवाड़े को रोकने के लिए यह कदम अनिवार्य है।

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शहरी पलायन और बीएलओ की भूमिका पर उठते सवाल

यूपी मतदाता सूची महासफाई का असर ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में अधिक व्यापक और डरावना नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का उदाहरण लें तो यहां अकेले 12 लाख नाम काटने की तैयारी है, जो कुल 40 लाख मतदाताओं का लगभग 30 प्रतिशत है।

यह आंकड़ा बताता है कि शहरी माइग्रेशन और बीएलओ (Booth Level Officer) की ग्राउंड रिपोर्टिंग में कहीं न कहीं बड़ी खाई है।

जानकारों का मानना है कि बीएलओ की भारी कमी और जनता में जागरूकता के अभाव के कारण बड़ी संख्या में योग्य मतदाता भी इस सफाई की चपेट में आ गए हैं। लखनऊ जैसे बड़े शहर में हर तीसरे व्यक्ति का नाम कटना प्रशासनिक दक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

अखिलेश यादव का पलटवार: ‘चुनावी हार का गणित’ या ‘साजिश’?

समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पूरी प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने ट्वीट कर दावा किया कि सरकार जिसे प्रशासनिक सुधार बता रही है, वह असल में “चुनावी हार का गणित” है। अखिलेश का तर्क है कि हटाए जाने वाले नामों में 85-90 प्रतिशत बीजेपी के अपने पारंपरिक वोटर हैं, जिससे योगी सरकार में स्वयं हड़कंप की स्थिति है।

उनके अनुसार, प्रति विधानसभा सीट पर औसतन 61,000 वोट कम हो जाएंगे। विपक्ष इसे एक सोची-समझी “चुनावी इंजीनियरिंग” के रूप में देख रहा है, जिसमें ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यक समूहों को ‘माइग्रेशन’ के नाम पर निशाना बनाकर उन्हें चुनावी प्रक्रिया से हाशिए पर धकेला जा रहा है।

समय की कमी और सत्यापन की असंभव चुनौती

इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू समय सीमा है। विपक्ष के पास इस विशाल आंकड़े को चुनौती देने के लिए बहुत ही कम समय बचा है। 31 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट लिस्ट सार्वजनिक की जाएगी, जिसके बाद 31 जनवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकेंगी। 28 फरवरी 2026 को अंतिम सूची का प्रकाशन होना है।

2.89 करोड़ नामों का क्रॉस-वेरिफिकेशन और ग्राउंड चेकिंग करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए लगभग असंभव कार्य है। यदि विपक्षी दल इतने कम समय में संसाधनों की कमी के कारण इसे क्रॉस-एग्जामिन नहीं कर पाते, तो चुनाव आयोग का हर दावा अनचैलेंज्ड सही मान लिया जाएगा, जो लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक मिसाल हो सकती है।

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देशव्यापी परिदृश्य: यूपी का विवाद सबसे बड़ा

यह गौर करने वाली बात है कि यूपी मतदाता सूची महासफाई कोई इकलौती घटना नहीं है। देश के अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं। अब तक देश भर में 3.68 करोड़ से अधिक नाम सूची से बाहर हो चुके हैं, जिसमें तमिलनाडु से 97 लाख, मध्य प्रदेश से 42 लाख और केरल से 24 लाख नाम शामिल हैं।

लेकिन उत्तर प्रदेश का पैमाना और यहां की राजनीतिक संवेदनशीलता इसे सबसे विवादास्पद बनाती है। आयोग का तर्क है कि यह रैपिड अर्बनाइजेशन और अनरिपोर्टेड डेथ्स के कारण बढ़ा हुआ आंकड़ा है, लेकिन पारदर्शिता की कमी और राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोपों ने इस सफाई अभियान को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।

तकनीक और प्रशासन की भूमिका

भाजपा जहां इसे “स्वच्छ मतदाता सूची” का नाम दे रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सच इन दोनों दावों के बीच कहीं छिपा है। समस्या यह है कि सत्यापन के लिए पर्याप्त समय नहीं है। ऐसे में विपक्षी दलों के पास एकमात्र रास्ता यह है कि वे तुरंत अपने बीएलए (Booth Level Agents) को सक्रिय करें, ग्राउंड वेरिफिकेशन शुरू करें और बड़े पैमाने पर दावे दर्ज कराएं।

यदि प्रशासनिक स्तर पर सुधार नहीं होता है, तो राजनीतिक दलों को शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है। अन्यथा, अंतिम मतदाता सूची को ही सत्य मानना होगा, भले ही इसमें लाखों योग्य मतदाता वोट देने के अधिकार से वंचित रह जाएं।

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लोकतंत्र की विश्वसनीयता का लिटमस टेस्ट

अंततः, यूपी मतदाता सूची महासफाई केवल एक प्रशासनिक सुधार मात्र नहीं है, बल्कि यह “लोकतंत्र की विश्वसनीयता” का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट है। यदि करोड़ों नाम कटने के बाद वास्तव में केवल फर्जी मतदाता ही बाहर होते हैं, तो यह व्यवस्था की जीत होगी।

लेकिन, यदि 2027 के विधानसभा चुनाव और 2026 के पंचायत चुनाव से पहले इसमें कोई राजनीतिक पूर्वाग्रह या योग्य मतदाताओं को हटाने की साजिश सिद्ध होती है, तो चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता पर गहरे सवालिया निशान लग जाएंगे।

समय तेजी से बीत रहा है; यदि विपक्ष अभी नहीं जागा, तो इस ‘साफ-सुथरी’ सूची के परिणाम स्वरूप हार पहले ही सुनिश्चित हो सकती है।

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