विकसित भारत और मध्यवर्ग का बढ़ता आक्रोश: आर्थिक हकीकत
मोदी सरकार के शासनकाल में ‘विकसित भारत’ का नारा भले ही जोर-शोर से लगाया जा रहा हो, लेकिन मध्यवर्ग का बढ़ता आक्रोश और गुस्सा अब किसी से छिप नहीं रहा है। साल 2025-26 के दौर में आर्थिक असमानता अपने चरम पर पहुंच गई है, जहां देश की शीर्ष 1% आबादी की संपत्ति में तो भारी उछाल आया है, लेकिन इसके विपरीत मध्य और निम्न वर्ग की क्रय शक्ति लगातार घटती जा रही है।
हालांकि सरकारी आंकड़े 8% से ज्यादा की जीडीपी ग्रोथ का प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन हकीकत के धरातल पर युवा बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई और कर्ज का असहनीय बोझ मध्यवर्ग को कुचल रहा है।
सोशल मीडिया पर वायरल होती पोस्ट्स में लोग अब खुलकर यह दर्द साझा कर रहे हैं कि ‘अच्छे दिन’ सिर्फ कॉरपोरेट्स और चुनिंदा अमीरों के लिए आए हैं, जबकि आम आदमी ईएमआई (EMI) और महंगाई के जाल में बुरी तरह फंस चुका है।
यह गुस्सा अब सिर्फ ऑनलाइन विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरने की गंभीर आशंका पैदा कर रहा है, क्योंकि जनता अब समझ चुकी है कि ‘विकसित भारत’ का सपना असल में आर्थिक तबाही का ही दूसरा नाम बन गया है।
युवा बेरोजगारी और डिग्रीधारकों की कड़वी विडंबना
भारत के युवाओं के लिए बेरोजगारी आज सबसे बड़ी विडंबना बन चुकी है। PLFS और CMIE जैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, 2025 के अंत तक युवा (15-29 वर्ष) बेरोजगारी दर 13% से 15% के बीच झूल रही है, जबकि सरकारी दावे इसे 10.2% तक गिराने का झूठा श्रेय लेने में व्यस्त हैं। आज आलम यह है कि महज 100 सरकारी नौकरियों के लिए 20 लाख से ज्यादा शिक्षित और डिग्रीधारक युवा आवेदन करने को मजबूर हैं।
वहीं दूसरी ओर, प्राइवेट सेक्टर में लेऑफ (छंटनी) और कम सैलरी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में कोचिंग सेंटर्स का कारोबार तो फल-फूल रहा है, जहां मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं, लेकिन सफलता की कोई गारंटी नहीं है। ‘स्किल इंडिया’ जैसे भारी-भरकम कार्यक्रम कागजी आंकड़ों में तो चमकते हैं, पर जमीन पर युवाओं का भविष्य अंधकारमय है।
सोशल मीडिया पर मध्यवर्ग का बढ़ता आक्रोश स्पष्ट दिख रहा है, जहां युवा कह रहे हैं कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’ अब सिर्फ एक मजाक बनकर रह गया है, क्योंकि हाथ में नौकरियां नहीं, बल्कि सिर्फ निराशा और विदेश पलायन के अधूरे सपने बचे हैं।
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ईएमआई कल्चर और घरेलू कर्ज का जानलेवा दलदल
ईएमआई कल्चर ने देश के मध्यवर्ग को कर्ज के एक ऐसे दलदल में धकेल दिया है जिससे निकलना नामुमकिन लग रहा है। 2025 के अंत तक घरेलू कर्ज जीडीपी का 48-50% तक पहुंच गया है और प्रति व्यक्ति कर्ज का आंकड़ा ₹4.8 लाख के पार जा चुका है। एक्सपर्ट पैनल के 2025 के सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि 85% लोग अपनी सैलरी का 40% हिस्सा सिर्फ ईएमआई भरने में खर्च कर देते हैं।
लगभग 45% परिवारों में कर्ज की सर्विसिंग उनकी आय का 40% से अधिक हिस्सा निगल रही है। क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन, BNPL (Buy Now Pay Later) और इंस्टेंट लोन ऐप्स ने खर्च को आसान तो बनाया, लेकिन साथ ही डिफॉल्ट और मानसिक तनाव के बोझ को भी कई गुना बढ़ा दिया है। स्थिर सैलरी, लगातार बढ़ते खर्च और जीएसटी (GST) जैसे टैक्स के भारी बोझ के बीच लोगों की बचत पूरी तरह खत्म हो रही है।
सोशल मीडिया पर लोग अपनी व्यथा लिख रहे हैं कि पूरी सैलरी ईएमआई में खत्म हो जाती है और बुनियादी जरूरतों के लिए भी फिर से कर्ज लेना पड़ रहा है। मोदी सरकार की नीतियां कॉरपोरेट्स को टैक्स ब्रेक्स दे रही हैं, लेकिन मध्यवर्ग के लिए कोई राहत नहीं है, जिससे यह एक ‘साइलेंट डेट क्राइसिस’ बन चुका है।
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रुपए की ऐतिहासिक गिरावट और थाली से गायब होता राशन
मुद्रास्फीति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की गिरती कीमत मध्यवर्ग की कमर तोड़ रही है। दिसंबर 2025 में सीपीआई (CPI) इन्फ्लेशन भले ही 1.33% रहा हो, लेकिन फूड इन्फ्लेशन के नेगेटिव जोन में होने के दावों के बावजूद बाजार में सब्जियां, मांस, मसाले और दालें लगातार महंगी हो रही हैं। डब्ल्यूपीआई (WPI) 0.83% पर पहुंचने के बावजूद रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें कम नहीं हो रही हैं, जिससे आम आदमी की क्रय शक्ति घट गई है।
जनवरी 2026 में रुपया 90.7 के स्तर पर है और भविष्यवाणियां इसके 91-92 तक पहुंचने की ओर इशारा कर रही हैं, जो आयातित सामान को और अधिक महंगा बना देगा। मोदी सरकार के महंगाई पर नियंत्रण के तमाम दावे पूरी तरह कागजी हैं, क्योंकि कोर इन्फ्लेशन सीधे तौर पर मध्यवर्ग को चोट पहुंचा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में मध्यवर्ग की थाली छोटी और जेब खाली हो रही है, जबकि सरकार ‘गोल्डिलॉक्स पीरियड’ का जश्न मना रही है। सरकार का यह दोहरा चेहरा जनता के भीतर मध्यवर्ग का बढ़ता आक्रोश और अधिक भड़का रहा है।
जीडीपी के सुनहरे आंकड़े और बढ़ती आर्थिक असमानता का सच
जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े आज मोदी सरकार के लिए सबसे बड़े प्रचार हथियार बन चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (Q2) में 8.2% की ग्रोथ दिखाई गई है और पूरे साल के लिए 7.3-7.4% का अनुमान है। लेकिन इन चमकते आंकड़ों के पीछे की हकीकत बेहद डरावनी है। देश में आर्थिक असमानता अपने चरम पर है, जहां शीर्ष 1% अमीरों के पास देश की 40% से ज्यादा संपत्ति केंद्रित हो गई है, जबकि मध्यवर्ग और गरीबों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है।
अनौपचारिक सेक्टर (Informal Sector) में नौकरियां तेजी से खत्म हो रही हैं और देश की ग्रोथ मुख्यतः कॉरपोरेट मुनाफे और सरकारी खर्च पर टिकी है। निजी निवेश (Private Investment) पूरी तरह ठप पड़ा है क्योंकि सरकारी नीतियां ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ को बढ़ावा दे रही हैं।
देश के बड़े आर्थिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि ये आंकड़े एक बड़ा भ्रम हैं, क्योंकि आम आदमी की थाली तक विकास की एक बूंद भी नहीं पहुंची है। यह ‘विकसित भारत’ का एक खोखला नारा है, जो सिर्फ तबाही को छिपाने का प्रयास है।
कोचिंग का बोझ और अग्निवीर जैसी योजनाओं से उपजा असंतोष
कोचिंग सेंटर्स का बढ़ता बूम और नौकरियों के लिए गलाकाट प्रतियोगिता मध्यवर्ग के लिए एक अंतहीन मानसिक और आर्थिक संघर्ष बन चुका है। एक अदद सरकारी नौकरी के लिए लाखों रुपये लुटाने के बाद भी युवाओं के हाथ खाली हैं। 20 लाख आवेदनों वाली वैकेंसीज इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि प्राइवेट सेक्टर अब अवसर देने में नाकाम रहा है। वहीं ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाओं ने सेना में जाने का सपना देखने वाले युवाओं का मनोबल बुरी तरह तोड़ दिया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लोग आज भी डिमॉनेटाइजेशन (नोटबंदी), जीएसटी और लॉकडाउन के दौरान हुई तबाही को याद कर रहे हैं, जिसने छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) को पूरी तरह बर्बाद कर दिया।
वर्तमान सिस्टम अब युवाओं को सपने नहीं, बल्कि सिर्फ गहरी निराशा दे रहा है। यही कारण है कि जनता के बीच सरकार के खिलाफ नाराजगी अब एक सुलगती हुई आग की तरह फैल रही है।
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राजनीतिक तूफान की आहट और सड़क पर उतरता मध्यवर्ग
निष्कर्ष के तौर पर, मध्यवर्ग का बढ़ता आक्रोश मोदी सरकार के लिए किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है। ‘विकसित भारत’ के सुनहरे पर्दे के पीछे जो नीतियां थोपी गई हैं, उन्होंने अब जनता की आंखें खोल दी हैं। बढ़ती आर्थिक असमानता, कर्ज का जाल, बेरोजगारी की मार और असहनीय महंगाई लोगों को किसी भी क्षण सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर सकती है।
यदि सरकार ने समय रहते जनता की चीख नहीं सुनी, तो यह सामूहिक गुस्सा एक बड़े राजनीतिक तूफान में बदल सकता है। मध्यवर्ग के इस तपते हुए गुस्से को देखकर यह साफ नजर आ रहा है कि मोदी सरकार के पास अब सुधार के लिए बहुत कम समय बचा है। भारत का मध्यवर्ग अब और खामोश नहीं रहेगा; वह व्यवस्था में बदलाव चाहता है और अपनी गरिमा की लड़ाई के लिए कभी भी सड़क पर उतरकर मोर्चा खोल सकता है।
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