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पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि ‘जमानत नियम – जेल अपवाद’ होना चाहिए

जमानत नियम - जेल अपवाद

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक बार फिर दोहराया है कि जमानत नियम – जेल अपवाद होना चाहिए, जो हमारे कानूनी ढांचे का मूल आधार है। चल रहे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 2020 के दिल्ली दंगों की साज़िश मामले में एक्टिविस्ट उमर खालिद को ज़मानत देने से सुप्रीम कोर्ट के हालिया इनकार से जुड़े एक तीखे सवाल के जवाब में उन्होंने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने रविवार को कहा कि दोषी ठहराए जाने से पहले ज़मानत एक अधिकार होना चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा शामिल है, वहाँ ऐसी राहत देने से पहले मामले की गहराई से जांच करना अदालत का अनिवार्य कर्तव्य है। खालिद और साथी एक्टिविस्ट शरजील इमाम सितंबर 2020 से जेल में हैं और 5 जनवरी को उनकी ज़मानत याचिकाएँ खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की “योजना, लामबंदी और रणनीतिक दिशा” में शामिल थे।

दोषी ठहराए जाने से पहले ज़मानत: अधिकार और निर्दोषता की धारणा

‘न्याय के विचार’ (Ideas of Justice) शीर्षक वाले सत्र के दौरान पत्रकार वीर सांघवी के साथ बातचीत में चंद्रचूड़ ने स्पष्ट कहा कि दोषी ठहराए जाने से पहले ज़मानत एक अधिकार होना चाहिए क्योंकि हमारा कानून एक अनुमान पर आधारित है कि जब तक दोषी साबित न हो जाए, हर कोई निर्दोष है। उन्होंने बिना दोषी ठहराए लंबे समय तक जेल में रखने की मानवीय कीमत की ओर इशारा करते हुए एक गंभीर सवाल पूछा, “क्योंकि, अगर कोई पाँच या सात साल तक विचाराधीन कैदी रहता है और आखिरकार निर्दोष साबित होता है, तो आप उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे करेंगे?” उन्होंने ज़ोर दिया कि ट्रायल से पहले की हिरासत सज़ा का एक रूप नहीं हो सकती। संवैधानिक मूल्यों के अनुसार जमानत नियम – जेल अपवाद का पालन होना चाहिए, ताकि निर्दोषता की धारणा बनी रहे।

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राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अदालत का कर्तव्य और चुनौतियां

विभिन्न मामलों के उदाहरण देते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर आरोपी के समाज में वापस आकर फिर से अपराध करने, सबूतों से छेड़छाड़ करने, या ज़मानत का फायदा उठाकर कानून की गिरफ्त से बचने की संभावना है, तो ज़मानत से इनकार किया जा सकता है। उन्होंने एक सीरियल रेपिस्ट-हत्यारे का उदाहरण दिया जो समाज में अपराध दोहरा सकता है, जिसे ज़मानत न देना एक क्लासिक मामला है। हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर ये तीनों आधार मौजूद नहीं हैं, तो ज़मानत दी जानी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानूनों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज समस्या यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून निर्दोषता की धारणा को लगभग अपराध की धारणा से बदलकर कानून को ही उल्टा कर देते हैं। अदालतों को बहुत सावधानी से जांच करनी चाहिए कि क्या हिरासत आनुपातिक है, वरना लोग सालों तक जेलों में सड़ते रहते हैं।

निचली अदालतों में डर का माहौल और सुप्रीम कोर्ट पर बढ़ता बोझ

जस्टिस चंद्रचूड़ ने सत्र और ज़िला अदालतों द्वारा ज़मानत से इनकार करने की प्रवृत्ति को बेहद चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश अक्सर इस डर से हिचकिचाते हैं कि ज़मानत देने पर उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाया जा सकता है या उनके मकसद पर शक किया जा सकता है। खास तौर पर फाइनेंशियल फ्रॉड के मामलों में जजों को डर लगता है कि ऊपरी अदालतें या जांच एजेंसियां उन पर सवाल उठाएंगी, इसलिए वे मामलों को हाई कोर्ट भेज देते हैं। इसी डर और हिचकिचाहट के कारण ज़मानत के मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट अब हर साल 70,000 मामले देखता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई डिस्ट्रिक्ट जज गलत बेल देता है तो उसे पलट दें, लेकिन जजों पर नैतिक दबाव न डालें क्योंकि हाई कोर्ट का एक छोटा सा ऑब्ज़र्वेशन उनका करियर और प्रमोशन प्रभावित कर सकता है।

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त्वरित सुनवाई का अधिकार: अनुच्छेद 21 और संविधान की सर्वोच्चता

क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में मामलों के निपटारे में होने वाली भारी देरी पर ज़ोर देते हुए पूर्व CJI ने कहा कि संविधान सबसे ऊपर है और इसमें किसी ठोस अपवाद की इजाज़त नहीं है। उन्होंने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और त्वरित ट्रायल के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष उचित समय सीमा के भीतर ट्रायल पूरा करने में असमर्थ है, तो आरोपी ज़मानत का हकदार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जमानत नियम – जेल अपवाद का सिद्धांत तब और भी मजबूत हो जाता है जब तेज़ी से सुनवाई संभव न हो। उन्होंने कहा, “मैं अपनी अदालत की आलोचना नहीं कर रहा हूं, लेकिन आपको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें जल्द सुनवाई का अधिकार है, और अगर मौजूदा हालात में जल्द सुनवाई मुमकिन नहीं है, तो ज़मानत नियम होना चाहिए।”

न्यायिक नियुक्तियों में कॉलेजियम और पारदर्शिता की आवश्यकता

जजों की नियुक्ति के मुद्दे पर बोलते हुए चंद्रचूड़ ने कॉलेजियम सिस्टम को और अधिक पारदर्शी बनाने की वकालत की। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉलेजियम सिस्टम में सिविल सोसाइटी के जाने-माने सदस्यों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि जनता का भरोसा बढ़े। उन्होंने कॉलेजियम की आलोचनाओं को गलत बताते हुए प्रक्रिया की जटिलता समझाई, जिसमें हाई कोर्ट, राज्य सरकार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और केंद्र सरकार के इनपुट्स शामिल होते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जजों के चयन के लिए सार्वजनिक मापदंड का प्रस्ताव दिया और कहा कि फिलहाल इसका सबसे बेहतर जवाब ‘ज़्यादा पारदर्शिता’ है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को “लोगों का कोर्ट” बनाने की अपनी कोशिशों के तहत लाइव टेलीकास्ट और क्षेत्रीय भाषाओं में फैसलों के अनुवाद की सराहना की।

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व्यक्तिगत दृष्टिकोण: जेनरेशन Z से जुड़ाव और भविष्य के सुधार

एक नागरिक के तौर पर बात करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में भी साझा किया। उन्होंने बताया कि हालांकि वह ‘बेबी बूमर’ पीढ़ी के हैं, लेकिन उनकी दो विशेष ज़रूरतों वाली बेटियां ‘जेनरेशन Z’ की हैं। उनकी ज़िंदगी से जुड़े रहने के लिए उन्हें Gen Z के सोचने और काम करने के तरीके को समझना पड़ता है। अपनी किताब (भाषणों का संकलन) का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें जॉन स्टुअर्ट मिल और कांट जैसे दार्शनिकों के विचार शामिल हैं। उन्होंने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले फैसले के दौरान लियोनार्ड कोहेन की पंक्तियों से मिली प्रेरणा को भी याद किया। रिटायरमेंट के बाद वे एक आम नागरिक के तौर पर खुश हैं, हालांकि उन्होंने वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को अपराध न माने जाने जैसे अनसुलझे मुद्दों पर कानूनी सुधार की वकालत जारी रखी।

निष्कर्ष: न्याय प्रणाली में सुधार और मानवाधिकारों का संतुलन

अंत में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियां भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अदालतों को अपनी भूमिका को केवल कानून के रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के संरक्षक के रूप में भी देखना चाहिए। उमर खालिद जैसे मामलों के संदर्भ में उनका यह कहना कि “जल्द सुनवाई मुमकिन नहीं है, तो जमानत नियम – जेल अपवाद होना चाहिए”, न्यायिक परिदृश्य में एक नई बहस को जन्म देता है। संस्थानों को मज़बूत करना और हर गलत फैसले को भ्रष्टाचार से न जोड़कर एक कुशल जवाबदेही प्रणाली बनाना ही न्याय का असली रास्ता है। जस्टिस मदन लोकुर जैसी हस्तियों द्वारा की गई आलोचनाओं के बीच चंद्रचूड़ का यह संबोधन न्यायिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की एक गंभीर पुकार है।

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