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कुकी समुदाय की अलग प्रशासन की मांग: रेप पीड़िता की मौत से आक्रोश

मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष के बीच एक बेहद हृदयविदारक खबर सामने आई है, जिसने पूरे राज्य में तनाव और अलग प्रशासन की मांग को एक बार फिर से चरम पर पहुंचा दिया है। मई 2023 में जातीय हिंसा के शुरुआती दौर में इंफाल में अगवा की गई और गैंगरेप का शिकार हुई 20 साल की एक कुकी महिला की लंबी बीमारी और गहरे सदमे के बाद मौत हो गई है। कुकी संगठनों का आरोप है कि महिला की मौत उन चोटों और मनोवैज्ञानिक आघात के कारण हुई है, जो उसे हिंसा के दौरान दिए गए थे।

पीड़िता, जो उस समय केवल 18 साल की थी, इंफाल के एक ब्यूटी सैलून में काम करती थी और अपना खुद का पार्लर खोलने का सपना देखती थी। लेकिन 15 मई 2023 को न्यू चेकॉन इलाके में एक एटीएम से पैसे निकालने के दौरान चार लोगों ने उसे बंधक बना लिया, जिसके बाद उसकी दुनिया उजड़ गई। इस घटना ने कुकी-ज़ो समुदाय को झकझोर कर रख दिया है और अब वे स्पष्ट कह रहे हैं कि मैतेई समुदाय के साथ सह-अस्तित्व संभव नहीं है।

इंफाल से गुवाहाटी तक न्याय की जंग और अधूरी रही जीवन की सांसें

पीड़िता के परिजनों और एफआईआर (FIR) के विवरण के अनुसार, अपहरण के बाद उसे अलग-अलग जगहों जैसे वांगखेई अयांगपाली और लैंगोल ले जाया गया, जहाँ उसके साथ यौन और गंभीर शारीरिक हमला किया गया। चार में से तीन लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया और उसे एक पहाड़ी से नाले में फेंक दिया। एक ऑटो-रिक्शा चालक ने उसे बचाया और अस्पताल पहुँचाया। वह किसी तरह कांगपोकपी पहुँचने में सफल रही, लेकिन उसके जख्म इतने गहरे थे कि उसे नागालैंड, असम और मणिपुर के विभिन्न अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े।

उसकी माँ ने बताया कि वह लगातार डिप्रेशन और पोस्ट-ट्रॉमा स्ट्रेस से जूझ रही थी। अंततः, 10 जनवरी को पुराने ज़ख्मों के कारण मौत हो गई। उसकी मौत के बाद अलग प्रशासन की मांग अब केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि कुकी समुदाय के अस्तित्व की पुकार बन गई है।

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कुकी संगठनों की चेतावनी: न्याय से इनकार अब बर्दाश्त नहीं

इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (ITLF) और कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (KSO) ने इस मौत पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। ITLF ने कहा कि महिला की मौत कुकी-ज़ो लोगों पर हुई बेरहमी की एक दर्दनाक गवाही है। शनिवार को चुराचांदपुर और कांगपोकपी में पीड़िता की याद में विशाल कैंडललाइट मार्च निकाला गया। छात्र संगठनों ने केंद्र सरकार से अपील की है कि आदिवासी समुदायों के लिए अलग प्रशासन की मांग को तुरंत स्वीकार किया जाए क्योंकि मौजूदा व्यवस्था में उनकी सुरक्षा और गरिमा खतरे में है। KSO दिल्ली और NCR ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस मौत को आधिकारिक तौर पर 2023 की हिंसा का परिणाम माना जाना चाहिए, अन्यथा यह न्याय से इनकार और जिम्मेदारी से बचने जैसा होगा। उन्होंने केंद्र से इस प्रक्रिया में तेज़ी लाने का आग्रह किया है।

डिप्रेशन और शारीरिक जटिलताओं ने ली 21 वर्षीय युवती की जान

पीड़िता की माँ ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उनकी बेटी बहुत ज़िंदादिल और मिलनसार थी, लेकिन घटना के बाद उसकी मुस्कान पूरी तरह खो गई थी। वह इतने सदमे में थी कि उसने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और किसी से बात करना बंद कर दिया। पिछले दो सालों से वह लगातार डर के साये में जी रही थी और अक्सर कहती थी कि वह अब और जीना नहीं चाहती। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उसे यूटेराइन फाइब्रोसिस और अन्य गंभीर शारीरिक समस्याएं हो गई थीं। हालांकि सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसी बीच, मलप्पुरम से भी एक दुखद खबर आई जहाँ एक 16 साल की लड़की का शव मिला, जिसके साथ यौन उत्पीड़न और हत्या की गई थी। इन घटनाओं ने देश में महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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मणिपुर में राष्ट्रपति शासन और जातीय हिंसा का अंतहीन सिलसिला

मणिपुर पिछले साल फरवरी से राष्ट्रपति शासन के अधीन है, लेकिन हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। मई 2023 से अब तक कम से कम 260 लोग मारे गए हैं और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। सुरक्षा कारणों से आज भी कोई भी समुदाय दूसरे के इलाके में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। कुकी-ज़ो महिला फोरम ने पीड़िता के साहस को सलाम करते हुए कहा कि उसने लगभग तीन सालों तक वह दर्द सहा जो किसी इंसान को नहीं सहना चाहिए। संगठनों का तर्क है कि जब तक अलग प्रशासन की मांग पूरी नहीं होती, तब तक आदिवासी आबादी को सुरक्षा महसूस नहीं होगी। इंफाल में पीड़िता का घर भी संघर्ष के दौरान नष्ट हो गया था, और अब उसका परिवार कम से कम एक सुरक्षित घर और न्याय की गुहार लगा रहा है।

अग्निवीर और कोचिंग सेंटर्स के बीच युवाओं का टूटता मनोबल

एक तरफ मणिपुर जल रहा है, तो दूसरी तरफ देश का युवा बेरोजगारी और असुरक्षित भविष्य से जूझ रहा है। कोचिंग सेंटर्स का बूम युवाओं के लिए अंतहीन संघर्ष बन गया है, जहाँ लाखों खर्च करने के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। अग्निवीर जैसी योजनाओं ने सेना में जाने के इच्छुक युवाओं का मनोबल तोड़ा है। सोशल मीडिया पर लोग नोटबंदी और जीएसटी की तबाही को याद कर रहे हैं, जिसने छोटे व्यवसायों को बर्बाद कर दिया। सिस्टम अब सपने नहीं बल्कि निराशा दे रहा है, और यही कारण है कि मणिपुर से लेकर दिल्ली तक अलग प्रशासन की मांग और आर्थिक न्याय की आवाजें बुलंद हो रही हैं।

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ईएमआई कल्चर और मध्यम वर्ग का साइलेंट डेट क्राइसिस

आर्थिक मोर्चे पर भी देश एक बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। ईएमआई कल्चर ने मध्यम वर्ग को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है, जहाँ घरेलू कर्ज जीडीपी का 48-50% तक पहुँच गया है। लोग अपनी सैलरी का 40% हिस्सा किस्तों में दे रहे हैं। स्थिर सैलरी और बढ़ती महंगाई के बीच बचत खत्म हो रही है। सरकारी नीतियां कॉरपोरेट्स को टैक्स ब्रेक दे रही हैं, लेकिन आम आदमी महंगाई और जीएसटी के बोझ तले दब रहा है। यह स्थिति मध्यम वर्ग के परिवारों में गहरी निराशा पैदा कर रही है, जहाँ माता-पिता बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

क्या सरकार सुनेगी जनता की पुकार?

अंत में, मणिपुर की पीड़िता की मौत और देश के युवाओं व मध्यम वर्ग का आक्रोश मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है। ‘विकसित भारत’ के नारे के बीच बढ़ती असमानता, बेरोजगारी और जातीय हिंसा लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर रही है। यदि सरकार ने समय रहते न्याय सुनिश्चित नहीं किया और अलग प्रशासनिक व्यवस्था जैसी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यह राजनीतिक तूफान का रूप ले सकता है। पीड़िता की बहन और माँ आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं, जबकि बलात्कारी आज भी आज़ाद घूम रहे हैं। यह स्थिति भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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