अमेरिकी कोर्ट की सख्ती और अडानी रिश्वत कांड: मोदी सरकार पर उठे सवाल
अडानी रिश्वत कांड मोदी सरकार की अदानी-केंद्रित नीतियों का सबसे काला अध्याय अब और गहरा हो गया है, जहां 14 महीनों से अधिक समय तक अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के समन को जानबूझकर नहीं पहुंचाया गया। यह कोई सामान्य देरी नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी संकट है।
नवंबर 2024 में SEC ने गौतम अदानी, उनके भतीजे सागर अदानी और अन्य एक्जीक्यूटिव्स पर $265 मिलियन (लगभग ₹2200 करोड़) की ब्राइबरी स्कीम का आरोप लगाया था। यह पूरा मामला अडानी ग्रीन एनर्जी के 2021 में $750 मिलियन बॉन्ड इश्यू से जुड़ा है।
संघीय जांचकर्ताओं का आरोप है कि भारतीय सरकारी अधिकारियों को भारी रिश्वत देकर सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल किए गए और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह करने के लिए झूठे बयान दिए गए। अब यह मामला अदालती चौखट से निकलकर कूटनीतिक गलियारों में आग लगा रहा है।
हेग कन्वेंशन और लॉ मिनिस्ट्री के तकनीकी बहानों का खेल
फरवरी 2025 से हेग कन्वेंशन के तहत भारत सरकार को समन सर्व करने के लिए दो बार आधिकारिक अनुरोध भेजे गए। लेकिन भारतीय कानून मंत्रालय ने इसे ठंडे बस्ते में डालने के लिए हर संभव तकनीकी अड़ंगा लगाया।
पहले “इंक सिग्नेचर और ऑफिशियल सील” की कमी का हवाला दिया गया, फिर यह अजीबोगरीब तर्क दिया गया कि “हेग कन्वेंशन का इस्तेमाल SEC के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता”।
यह स्पष्ट रूप से अडानी रिश्वत कांड को दबाने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है। अब जनवरी 2026 में SEC ने न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट से अपील की है कि समन ईमेल के जरिए डायरेक्ट सर्व किया जाए, क्योंकि भारत की तरफ से पैदा की गई रुकावटें अमेरिकी सिक्योरिटी लॉज को बाधित कर रही हैं।
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अहमदाबाद से न्यूयॉर्क तक: सुनियोजित देरी की पूरी टाइमलाइन
तथ्य बताते हैं कि यह देरी महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। मार्च 2025 में समन अहमदाबाद कोर्ट तक पहुंच तो गया था, लेकिन अक्टूबर 2025 बीत जाने के बाद भी वह अदानी तक नहीं पहुंच सका।
SEC की फाइलिंग में साफ तौर पर दर्ज है कि भारतीय अथॉरिटीज “सेवा प्रदान करने में असमर्थ” हैं, जबकि विडंबना यह है कि गौतम अदानी खुले आम देश-दुनिया में घूम रहे हैं।
कानून मंत्रालय द्वारा मई 2025 और दिसंबर 2025 में किए गए दो रिजेक्शन बताते हैं कि सरकार ने प्रक्रिया को ब्लॉक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह सिस्टेमेटिक प्रोटेक्शन दर्शाता है कि क्रोनी कैपिटलिज्म की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
बाजार में कोहराम और अडानी ग्रुप की मार्केट कैप में भारी सेंध
ग्लोबल इन्वेस्टर्स अब इस क्रोनीज्म को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। अडानी ग्रुप ने भले ही इन आरोपों को “बेसलेस” करार दिया हो, लेकिन शेयर बाजार की प्रतिक्रिया हकीकत बयां कर रही है।
जनवरी 2026 में जैसे ही SEC ने न्यूयॉर्क कोर्ट में ईमेल सर्विस के लिए मूव किया, अडानी ग्रुप की कंपनियों ने देखते ही देखते $12.5 बिलियन (लगभग ₹1.04 लाख करोड़) की मार्केट कैप गंवा दी।
अडानी ग्रीन एनर्जी के शेयरों में 14-15% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। अडानी रिश्वत कांड के साये में निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है, जिससे भारतीय बाजार की साख पर भी आंच आ रही है।
अडानी की कानूनी टीम का काउंटर-मूव और अस्तित्व का संकट
अमेरिकी न्याय व्यवस्था की ताकत को नजरअंदाज करना अब अडानी ग्रुप के लिए भारी पड़ रहा है। 14 महीनों की खामोशी के बाद, अडानी की लॉ फर्म ने पहली बार अमेरिकी कोर्ट में फाइलिंग की है। उन्होंने कोर्ट से गुजारिश की है कि SEC की ईमेल सर्विस रिक्वेस्ट पर रूलिंग को फिलहाल टाल दिया जाए (Defer)।
यह कदम किसी रणनीति से ज्यादा मजबूरी का प्रतीक नजर आता है। मोदी सरकार भले ही व्यक्तिगत या राजनीतिक नुकसान कम होने के कारण अमेरिका से टकराने का रिस्क ले ले, लेकिन अडानी के लिए यह उनके वैश्विक कारोबार के अस्तित्व का सवाल बन चुका है। ब्राइबरी स्कीम में पावर खरीद एग्रीमेंट्स हासिल करने के आरोप सीधे तौर पर मोदी राज में अडानी के तेज विस्तार की कहानी से मेल खाते हैं।
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भारत-अमेरिका संबंध और मोदी-ट्रंप दोस्ती की अग्निपरीक्षा
यह पूरा प्रकरण भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों को एक गंभीर जोखिम में डाल रहा है। एक तरफ मोदी-ट्रंप दोस्ती का ढोल पीटा जाता है, ट्रेड, टेक्नोलॉजी और डिफेंस में सहयोग की बातें होती हैं, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी न्याय विभाग और SEC जैसे संस्थान अडानी रिश्वत कांड पर शिकंजा कस रहे हैं।
SEC की फाइलिंग में स्पष्ट कहा गया है कि भारत की रुकावटों के कारण “हेग कन्वेंशन के ज़रिए आगे की कोशिशों के सफल होने की संभावना नहीं है”। यह जुरिकडीक्सनल टेंशन न केवल भारत की वैश्विक छवि खराब कर रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि सत्ता के करीबियों को बचाने के लिए देश की साख को दांव पर लगाया जा रहा है।
विपक्ष के तीखे हमले और ‘कैश काउ’ का सोशल मीडिया नैरेटिव
देश के भीतर भी इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान चरम पर है। विपक्षी नेता महुआ मोइत्रा और प्रशांत भूषण जैसे एक्टिविस्ट्स ने इसे “मोदी का कैश काउ” करार देते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।
सोशल मीडिया पर “मोदी सरकार समन को रोकने के लिए बेताब कोशिशें कर रही है” जैसे कमेंट्स और “US power vs Modi govt attempts” जैसे ट्रेंड्स वायरल हो रहे हैं।
जनता अब इस पैटर्न को पहचान रही है कि कैसे एक कॉर्पोरेट घराने को बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी ढाल बनकर खड़ी हो गई है। अडानी रिश्वत कांड अब केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक स्कैंडल बन चुका है।
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संस्थागत विफलता और लोकतंत्र बनाम ‘क्रोनी क्लब’ का सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे तीखी बात यह है कि अडानी का साम्राज्य घूस, सरकारी फेवर्स और जांच में जानबूझकर की गई देरी पर टिका हुआ नजर आता है। अगर सरकार एक अंतरराष्ट्रीय संधि (हेग कन्वेंशन) के तहत समन सर्व करने में खुद को “असमर्थ” बताती है, तो उसकी शासन क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
यह FCPA (फॉरेन करप्ट प्रैक्टिस एक्ट) जैसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का भी खुला उल्लंघन है। अंत में सवाल वही है: क्या मोदी के सत्ता संभालने के बाद भारत एक जीवंत लोकतंत्र रह गया है या महज एक “क्रोनी क्लब” बनकर सिमट गया है? देश की अर्थव्यवस्था और न्यायपालिका दोनों की साख दांव पर है। अब समय आ गया है कि सच्चाई सामने आए, चाहे कितनी भी देरी क्यों न की जाए।
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