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महाकाल VIP दर्शन विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

महाकाल VIP दर्शन विवाद

उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर में जारी महाकाल VIP दर्शन विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक जा पहुँचा है। इंदौर के एडवोकेट चर्चित शास्त्री ने एडवोकेट विष्णु जैन के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष याचिका दायर की थी, जिसमें मांग की गई थी कि आम भक्तों को भी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश और पूजा की अनुमति दी जानी चाहिए।

याचिका में तर्क दिया गया कि भारत और विदेशों से हर साल लाखों भक्त महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन उन्हें गर्भगृह के बाहर से ही दर्शन करने पड़ते हैं। वहीं दूसरी ओर, राजनेताओं और प्रभावशाली VIP लोगों को अंदर जाकर पूजा-अर्चना करने की पूरी आजादी है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह व्यवस्था धार्मिक समानता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

राजनेताओं का समर्थन और आम भक्तों के अधिकारों का सवाल

इस कानूनी लड़ाई के बीच स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी आम जनता की पीड़ा को स्वर दिया है। उज्जैन के सांसद अनिल फिरोजिया ने अधिकारियों को पत्र लिखकर और मुख्यमंत्री मोहन यादव के समक्ष सार्वजनिक मंचों पर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है।

करीब दो हफ्ते पहले उज्जैन के मेयर ने भी वर्तमान दर्शन व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए आम भक्तों को पवित्र गर्भगृह में प्रवेश देने की मांग की थी।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि जब भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष पाबंदी के बावजूद गर्भगृह में प्रवेश कर गए थे, तो आम जनता के लिए इसे क्यों बंद रखा गया है? यह महाकाल VIP दर्शन विवाद अब समानता और आस्था के बीच की एक बड़ी बहस बन गया है।

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दो वर्षों से बंद है गर्भगृह और महाकाल लोक का प्रभाव

मंदिर प्रशासन ने 4 जुलाई 2023 को श्रावण मास में उमड़ने वाली भारी भीड़ का हवाला देते हुए आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह के द्वार बंद कर दिए थे। शुरुआत में यह पाबंदी 11 सितंबर 2023 तक के लिए थी और अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि श्रावण बीतने के बाद इसे खोल दिया जाएगा।

हालांकि, एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। अक्टूबर 2022 में ‘महाकाल लोक’ कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में चार गुना वृद्धि हुई है।

पहले जहां रोजाना 20 से 30 हजार लोग आते थे, वहीं अब यह संख्या 1.5 से 2 लाख प्रतिदिन तक पहुंच गई है, जिससे भीड़ प्रबंधन (क्राउड मैनेजमेंट) प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

शुल्क आधारित दर्शन व्यवस्था और वर्तमान पाबंदियां

जुलाई 2023 से पहले की व्यवस्था के अनुसार, भक्त अभिषेक और विशेष पूजा के लिए 1,500 रुपये की रसीद कटाकर गर्भगृह में प्रवेश कर सकते थे। लेकिन वर्तमान में आम भक्तों को केवल गणेश मंडपम, कार्तिकेय मंडपम और नंदी हॉल से ही दर्शन करने की अनुमति है।

पवित्र गर्भगृह के भीतर आम लोगों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। इसी भेदभावपूर्ण व्यवस्था को लेकर महाकाल VIP दर्शन विवाद को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि जब प्रभावशाली लोग अंदर जा सकते हैं, तो आम भक्तों के साथ यह भेदभाव क्यों?

सुप्रीम कोर्ट का रुख: महाकाल के सामने कोई VIP नहीं

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने बेहद कड़ी और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “महाकाल की मौजूदगी में कोई VIP नहीं है।

” हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर के भीतर किसे प्रवेश मिलना चाहिए और किसे नहीं, यह तय करना कोर्ट का काम नहीं है। बेंच ने कहा कि अगर कोर्ट हर मंदिर के प्रवेश नियमों को रेगुलेट करने लगेगा, तो यह न्यायपालिका की मर्यादा और कार्यक्षेत्र से बाहर की बात होगी।

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याचिका खारिज और हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को इस याचिका को खारिज कर दिया और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उज्जैन के जिला कलेक्टर को यह तय करने का अधिकार दिया गया था कि कौन प्रवेश के लिए पात्र है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जिला कलेक्टर केस-बाय-केस आधार पर यह तय करने में सक्षम हैं कि विशेष परिस्थितियों में किसे अनुमति दी जाए।

कोर्ट के अनुसार, यदि कलेक्टर किसी विशेष दिन किसी को अनुमति देते हैं, तो उस समय के लिए वह व्यक्ति ‘VIP’ माना जाएगा, चाहे उसका पद कुछ भी हो। इस फैसले के बाद अब महाकाल VIP दर्शन विवाद में वर्तमान व्यवस्था ही लागू रहेगी।

अदालती हस्तक्षेप से इनकार और याचिकाकर्ता को सलाह

जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की कि अक्सर ऐसी याचिकाएं उन लोगों द्वारा दायर की जाती हैं जो वास्तविक भक्त नहीं होते, बल्कि उनके अन्य उद्देश्य होते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे धार्मिक नीतियों या गाइडलाइंस बनाने के लिए नहीं बैठे हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी और चर्चित शास्त्री को सलाह दी कि वे अपनी शिकायतों को लेकर संबंधित सरकारी अधिकारियों या मंदिर प्रबंधन कमेटी के पास ‘रिप्रेजेंटेशन’ दें। कोर्ट का मानना है कि प्रबंधन संबंधी निर्णय प्रशासनिक होते हैं और उन्हें अदालती आदेशों से नियंत्रित नहीं किया जाना चाहिए।

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भस्म आरती का महत्व और आस्था की परंपरा

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का आध्यात्मिक महत्व अतुलनीय है। यह आरती प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 3:30 से 5:30 बजे के बीच होती है। परंपरा के अनुसार, शिवलिंग को पंचामृत स्नान के बाद भांग और चंदन से सजाया जाता है। श्रद्धालु इस आरती के दर्शन को जीवन का परम सौभाग्य मानते हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह स्पष्ट है कि गर्भगृह में प्रवेश और VIP दर्शन की व्यवस्था जिला प्रशासन और मंदिर समिति के विवेकाधिकार पर ही निर्भर करेगी। भक्तों को अब भी उम्मीद है कि प्रशासन भीड़ प्रबंधन का ऐसा रास्ता निकालेगा जिससे आम जनता को भी गर्भगृह में प्रवेश मिल सके।

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