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मुकुल रॉय को सुप्रीम कोर्ट से राहत, दलबदल कानून और AI पर टिप्पणी

दलबदल कानून और AI

पश्चिम बंगाल की राजनीति के दिग्गज नेता मुकुल रॉय को एक बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें उन्हें भाजपा से तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शामिल होने के कारण विधायक के रूप में अयोग्य घोषित किया गया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दलबदल कानून और AI के बढ़ते प्रभाव के बीच इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आज के दौर में जब डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें मौजूद हैं, तो केवल किसी वीडियो के आधार पर किसी विधायक की सदस्यता रद्द करना उचित नहीं है जब तक कि उन सबूतों को पूरी तरह प्रमाणित न कर दिया जाए।

हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर अंतरिम रोक

कलकत्ता हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 13 नवंबर, 2025 को एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया था, जिसमें पहली बार अदालत ने अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए एक विधायक को सीधे अयोग्य घोषित किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस आदेश के संचालन को स्थगित कर दिया है। मुकुल रॉय, जो 2021 में भाजपा के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर निर्वाचन क्षेत्र से जीते थे, पर आरोप था कि जून 2021 में वे ममता बनर्जी की उपस्थिति में TMC में शामिल हो गए थे। इसी मामले में दलबदल कानून और AI की जटिलताओं को देखते हुए शीर्ष अदालत ने विपक्षी नेताओं सुवेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

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CJI की टिप्पणी: एआई के दौर में चेहरों की पहचान मुश्किल

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “देखिए, आज AI वगैरह है, हमें नहीं पता कि किसका चेहरा असली है और किसका नहीं। इलेक्ट्रॉनिक सबूत की गहराई से जांच करनी होगी।” कोर्ट का यह रुख दलबदल कानून और AI के अंतर्संबंधों को लेकर एक नई कानूनी बहस को जन्म देता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अयोग्य ठहराने के लिए पेश किए गए सोशल मीडिया पोस्ट या वीडियो फुटेज को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत प्रमाणित किया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने अर्जुन पंडितराव खोटकर मामले की मिसाल देते हुए कहा कि अयोग्यता की कार्यवाही में प्रमाणन की शर्तों में ढील देना न्यायसंगत नहीं होगा।

मुकुल रॉय की अस्वस्थता और बेटे की याचिका

चूंकि मुकुल रॉय वर्तमान में गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं और अस्पताल में भर्ती हैं, इसलिए उनकी ओर से उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। प्रतिवादियों के वकील गौरव अग्रवाल ने बेटे द्वारा याचिका दायर करने के अधिकार (लोकस) पर आपत्ति जताई, जिसे पीठ ने खारिज कर दिया। CJI कांत ने कहा, “अगर वह गंभीर स्थिति में हैं, तो परिवार का कोई सदस्य याचिका क्यों नहीं दायर कर सकता?” मुकुल रॉय की वकील प्रीतिका द्विवेदी ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने अपनी सीमित न्यायिक समीक्षा शक्तियों का उल्लंघन करते हुए विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है।

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विधानसभा स्पीकर का निर्णय और हाई कोर्ट का हस्तक्षेप

इस मामले की जड़ें 2021 के चुनाव परिणामों के तुरंत बाद की घटनाओं में हैं। भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय ने मुकुल रॉय के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर बिमान बनर्जी ने जून 2022 में इन याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि दलबदल साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं और पेश किए गए वीडियो साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के अनुसार प्रमाणित नहीं थे। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस फैसले को “गलत” करार देते हुए पलट दिया था और कहा था कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही में तकनीकी प्रमाणन का सख्ती से पालन आवश्यक नहीं है, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी है।

दलबदल के सबूत और प्रेस कॉन्फ्रेंस का विवाद

अधिकारी और अंबिका रॉय ने हाई कोर्ट में 11 जून, 2021 का एक वीडियो पेश किया था, जिसमें मुकुल रॉय और उनके बेटे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में TMC मुख्यालय में पार्टी में शामिल होते दिख रहे थे। हाई कोर्ट ने “संभावनाओं की प्रधानता” (Preponderance of Probabilities) के आधार पर फैसला सुनाया था कि मुकुल रॉय ने आरोपों से इनकार नहीं किया है और प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनकी मौजूदगी दलबदल का स्पष्ट प्रमाण है। कोर्ट ने रॉय के लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष के रूप में नामांकन को भी रद्द कर दिया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल कानून और AI के संदर्भ में कहा है कि नॉन-ट्रैवर्स (इनकार न करना) के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

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मई 2026 में कार्यकाल खत्म होने का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा का वर्तमान कार्यकाल मई 2026 में समाप्त होने वाला है और चुनाव में केवल चार महीने शेष हैं। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले पर रोक न लगाने के गंभीर परिणाम होंगे। बेंच ने गौरव अग्रवाल से कहा, “यदि वह दोबारा चुनाव लड़ते हैं, तो आप आवेदन दें, हम तब देखेंगे कि क्या करना है।” फिलहाल के लिए कोर्ट ने आदेश दिया है कि आगामी सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी और तब तक हाई कोर्ट का अयोग्यता वाला आदेश प्रभावी नहीं रहेगा, जिससे मुकुल रॉय की विधायक की कुर्सी फिलहाल सुरक्षित हो गई है।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और धारा 65B की अनिवार्यता

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस तर्क पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था कि अयोग्यता के मामलों में धारा 65B की आवश्यकता को कम किया जा सकता है। जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या केवल ट्रांसक्रिप्ट या वीडियो के आधार पर, जिसे कानूनन प्रमाणित न किया गया हो, किसी व्यक्ति की सदस्यता छीनी जा सकती है? यह मामला अब भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया है, जहाँ दलबदल कानून और AI जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के कारण उत्पन्न चुनौतियों का समाधान शीर्ष अदालत को करना है। इस राहत के बाद बंगाल की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है।

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