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 पुराना मुंबई बनाम आधुनिक मुंबई: पारले-जी फैक्ट्री का पुनर्विकास

पुराना मुंबई आधुनिक मुंबई

पुराना मुंबई आधुनिक मुंबई मुंबई के औद्योगिक इतिहास को आज एक नई शक्ल दी जा रही है। जहाँ कभी ताजे बेक्ड बिस्कुटों की खुशबू से गलियां महकती थीं, अब वहां आधुनिक कॉर्पोरेट जगत का दबदबा होगा।

विले पार्ले ईस्ट स्थित ऐतिहासिक पारले-जी बिस्कुट फैक्ट्री, जहाँ भारत का सबसे प्रतिष्ठित FMCG ब्रांड जन्मा था, अब एक विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बदलने जा रही है।

यह केवल एक इमारत का गिरना नहीं है, बल्कि पुराना मुंबई बनाम आधुनिक मुंबई के बीच चल रहे उस बदलाव का प्रतीक है, जिसमें शहर का औद्योगिक अतीत अब कांच, स्टील और बैलेंस शीट के सामने सिमट रहा है।

पारले-जी बिस्कुट के रैपर पर दिखने वाली बच्ची का रहस्य

दशकों से भारतीयों के मन में एक सवाल रहा है कि पारले-जी के पैकेट पर दिखने वाली वह मासूम बच्ची आखिर कौन है? अक्सर चर्चाओं में सुधा मूर्ति, नीरू देशपांडे और गुंजन गुंडानिया जैसे नाम सामने आते रहे हैं। लेकिन पारले-जी प्रोडक्ट्स के वाइस प्रेसिडेंट ने स्पष्ट किया है कि वह बच्ची कोई असली इंसान नहीं है।

यह तस्वीर केवल एक इलस्ट्रेशन (चित्रांकन) है, जिसे 1960 के दशक में कलाकार मगनलाल दहिया ने ‘एवरेस्ट क्रिएटिव’ एजेंसी के लिए बनाया था। इस डिजाइन का मुख्य उद्देश्य मासूमियत, पवित्रता और परिवार से जुड़ाव को दर्शाना था। इस रहस्यमयी पहचान ने ब्रांड को दशकों तक चर्चा में बनाए रखा, जो एक मास्टरस्ट्रोक मार्केटिंग रणनीति साबित हुई।

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विले पार्ले फैक्ट्री का शानदार सफर और भावनात्मक जुड़ाव

पारले प्रोडक्ट्स की स्थापना मोहनलाल दयाल चौहान ने साल 1929 में मुंबई के विले पार्ले इलाके में की थी। शुरुआत में यह फैक्ट्री कैंडी और टॉफी बनाने के लिए जानी जाती थी, लेकिन 1939 में इसने मीठे बिस्कुट बनाना शुरू किया। पारले-जी केवल एक बिस्कुट नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का हिस्सा बन गया।

चाय के साथ पारले-जी का कॉम्बिनेशन करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से जुड़ा है। विले पार्ले का नाम भी पैडले और इर्ले गांवों या विरलेश्वर और पारलेश्वर मंदिरों से प्रेरित माना जाता है। इसी इलाके की पहचान बनी इस फैक्ट्री ने 87 वर्षों के गौरवशाली सफर के बाद 2016 में उत्पादन बंद कर दिया था।

करोड़ों का निवेश और कमर्शियल पुनर्विकास की योजना

पुराना मुंबई बनाम आधुनिक मुंबई के इस संक्रमण काल में, पारले प्रोडक्ट्स ने अपनी 5.44 हेक्टेयर (13.45 एकड़) यानी 54,438.80 वर्ग मीटर की प्राइम जमीन को पुनर्विकसित करने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत ₹3,961.39 करोड़ आंकी गई है।

प्रस्तावित योजना के तहत यहाँ 1,90,360.52 वर्ग मीटर का कुल बिल्ट-अप एरिया विकसित किया जाएगा। इसमें फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) के तहत 1,21,698.09 वर्ग मीटर और नॉन-FSI के तहत 68,662.43 वर्ग मीटर का निर्माण शामिल है। यह बदलाव शहर की पुरानी औद्योगिक जमीन को रियल एस्टेट गोल्ड में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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पर्यावरण मंजूरी और निर्माण की रूपरेखा

7 जनवरी को महाराष्ट्र स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) ने इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है। इसके तहत साइट पर मौजूद 21 पुराने ढांचों को गिराने की अनुमति मिल गई है। योजना में चार मुख्य इमारतें शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक में दो बेसमेंट लेवल होंगे। पहली तीन इमारतों के ‘A-विंग’ में छह मंजिलें होंगी।

बिल्डिंग नंबर 1 के ‘B-विंग’ को कमर्शियल उपयोग के लिए तैयार किया गया है, जिसमें पहली, सातवीं और आठवीं मंजिल पर दुकानें और ऑफिस होंगे, जबकि दूसरी से छठी मंजिल पार्किंग के लिए आरक्षित होगी। इस परिसर में रिटेल आउटलेट्स, आलीशान रेस्टोरेंट और फूड कोर्ट भी प्रस्तावित हैं।

हवाई क्षेत्र की पाबंदियां और हरित विकास का संकल्प

चूंकि यह साइट एयरपोर्ट के एयर फनल जोन के करीब है, इसलिए एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने अक्टूबर 2025 में नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करते हुए इमारतों की ऊंचाई 30.40 मीटर और 28.81 मीटर तक सीमित रखने की शर्त रखी है। पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी दिखाते हुए कंपनी ने मियावाकी प्लांटेशन का प्रस्ताव दिया है।

वर्तमान में परिसर में मौजूद 508 पेड़ों में से 311 को सुरक्षित रखा जाएगा, जबकि 129 को काटने और 68 को ट्रांसप्लांट करने की योजना है। कुल 1,203 नए पेड़ लगाए जाएंगे, जिससे भविष्य में पेड़ों की कुल संख्या 2,230 हो जाएगी। यह हरित प्रयास पुराना मुंबई बनाम आधुनिक मुंबई के संतुलन को बनाए रखने की एक कोशिश है।

मुंबई के औद्योगिक परिदृश्य का री-इंवेंशन

मुंबई अब बिस्कुट बनाने के बजाय बैलेंस शीट बनाने की दिशा में बढ़ चुका है। यह बदलाव 1990 के दशक में कपड़ा मिलों के बंद होने के साथ शुरू हुआ था। लोअर परेल, वर्ली और महालक्ष्मी की तरह अब अंधेरी, कुर्ला और गोरेगांव जैसे उपनगरों में पुरानी फैक्ट्रियों की जगह IT पार्क और को-वर्किंग हब ले रहे हैं।

रेलवे और मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की जमीनों के साथ भी आने वाले समय में पुनर्विकास की नई लहर देखने को मिलेगी। पारले फैक्ट्री का यह विकास उसी सिलसिले की एक कड़ी है, जहाँ कंपनियां बेहतर रिटर्न के लिए औद्योगिक इकाइयों को शहर से बाहर ले जा रही हैं और शहर की कीमती जमीन को मोनेटाइज कर रही हैं।

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विरासत से भविष्य की ओर एक कदम

भले ही विले पार्ले की हवाओं में अब ताजे बिस्कुटों की वह मनमोहक खुशबू नहीं घुलेगी, लेकिन पारले-जी की विरासत हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगी। पारले कंपनी आज भी हाइड एंड सीक, क्रैकजैक, मोनाको के साथ-साथ मेलोडी, किस्मी और मैजेलो जैसी टॉफियों के जरिए बाजार में अपनी पकड़ बनाए हुए है।

पुराना मुंबई बनाम आधुनिक मुंबई की इस दौड़ में भले ही औद्योगिक ढांचा इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाए, लेकिन पारले-जी जैसा ब्रांड हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बना रहेगा।

21 जनवरी 2026 की तारीख उस बदलाव की गवाह बनी, जिसने मुंबई के औद्योगिक सफ़र को एक नए और आधुनिक मोड़ पर खड़ा कर दिया है।

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