JNU मुद्रीकरण विवाद: शिक्षा बजट में कटौती और गहराता संकट
शिक्षा से संघर्ष करने वाली व्यवस्था में JNU जैसी संस्था का वित्तीय संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित उपेक्षा और नीतिगत प्राथमिकताओं का क्रूर परिणाम है। JNU मुद्रीकरण विवाद के बीच 2024 में ही प्रशासन ने गोमती गेस्ट हाउस (मंडी हाउस के पास, FICCI के निकट) और 35 फिरोजशाह रोड की बेशकीमती संपत्ति को मुद्रीकृत करने की योजना बनाई है।
इसमें पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के जरिए पुनर्विकास या लीज पर देने का प्रस्ताव शामिल है। विश्वविद्यालय ने शिक्षा मंत्रालय से आधिकारिक अनुमति मांगी है कि कैंपस में स्थित 12 राष्ट्रीय संस्थानों से किराया वसूला जाए, क्योंकि वर्तमान में इनसे कोई आय नहीं होती।
कुलपति संतिश्री धुलिपुडी पंडित का तर्क है कि बढ़ती रखरखाव लागत और फंड की कमी के कारण बिना फीस बढ़ाए खर्च उठाना असंभव है, लेकिन छात्र-शिक्षक संगठन JNUTA इसे “प्राइवेटाइजेशन” और विश्वविद्यालय की संपत्ति बेचने की एक गहरी साजिश मान रहा है।
ऐतिहासिक संस्थानों का रियल एस्टेट के खेल में तब्दील होना
दिसंबर 2025 तक की स्थितियों पर JNUTA ने गंभीर आरोप लगाया है कि गोमती गेस्ट हाउस को विदेश मंत्रालय (MEA) के अधीन आईसीडब्ल्यूए (ICWA) को ट्रांसफर करने की एक गुप्त योजना चल रही है। यह सब उस दौर में हो रहा है जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अनुसंधान, लैब, फील्डवर्क और सेमिनार जैसी बुनियादी शैक्षणिक जरूरतों के लिए दाने-दाने को मोहताज है।
JNU मुद्रीकरण विवाद के इस दौर में एक ऐतिहासिक संस्थान को रियल एस्टेट के खेल में बदलना शिक्षा के प्रति घोर असंवेदनशीलता और विचारधारा-प्रेरित हमले को दर्शाता है। जब फंड की कमी के नाम पर जमीनों का सौदा होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि अकादमिक उत्कृष्टता अब प्राथमिकता नहीं रही।
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सरकारी स्कूलों की बंदी और ‘विकसित भारत’ के दावों की हकीकत
एक तरफ सरकार के समर्थक वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज बंद होने पर मिठाई बांटते हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों के बंद होने पर रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं। विकसित भारत का नारा और शिक्षा की यह दुर्गति—यह दोहरा मापदंड शिक्षा विरोधी मानसिकता को उजागर करता है।
UDISE+ डेटा (2014-15 से 2023-24) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुल 89,441 सरकारी स्कूल या तो बंद हुए या उनका विलय कर दिया गया। स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर 10,17,660 रह गई है, जो सीधे तौर पर 8% की गिरावट है। सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की है, जहाँ क्रमशः 29,410 और 25,126 स्कूल बंद हुए, जो देश के कुल क्लोजर्स का 60.9% हिस्सा है।
प्राइवेटाइजेशन का बढ़ता जाल और ग्रामीण शिक्षा का अंत
हैरानी की बात यह है कि इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या में 42,944 की वृद्धि हुई। 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि लो-एनरोलमेंट स्कूल (10 से कम छात्र वाले) 65,054 तक पहुंच गए हैं, जबकि अकेले मध्य प्रदेश में 2019-20 से अब तक 7,000 से अधिक स्कूल कम हुए हैं।
यह तालाबंदी ग्रामीण और गरीब बच्चों की शिक्षा तक पहुंच को खत्म कर रही है, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही एकमात्र सहारा थे। आज एलीट मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों पर तो फोकस बढ़ रहा है, लेकिन बुनियादी शिक्षा का ढांचा ध्वस्त किया जा रहा है। यह विकास का एक ऐसा क्रूर मजाक है जहाँ आम आदमी की शिक्षा की बलि देकर एलीटिज्म को पोषित किया जा रहा है।
JNU की अकादमिक आत्मा पर प्रहार और JNUTA का खुलासा
JNU को “धीरे-धीरे निपटाने” की तैयारी का आरोप अब ठोस सबूतों के साथ सामने है। JNUTA की 2025 की रिपोर्ट “JNU: The State of the University” में खुलासा हुआ है कि विश्वविद्यालय का अकादमिक खर्च 2017-18 के 38.37 करोड़ रुपये से गिरकर 2024-25 में मात्र 19.29 करोड़ रुपये रह गया है—यानी सीधे तौर पर आधा।
2015-16 से 2021-22 के बीच कुल अकादमिक खर्च में 57.8% की गिरावट आई और कुल मिलाकर 36% की कटौती दर्ज की गई। JNU मुद्रीकरण विवाद के बीच रिसर्च एडमिशन्स की संख्या भी 2016-17 के 5,432 से घटकर 2024-25 में 3,286 रह गई है। सामाजिक न्याय की स्थिति यह है कि SC छात्रों की संख्या 1,500 से घटकर 1,143 और ST छात्रों की 741 से घटकर 545 हो गई है, जो आरक्षण के निर्धारित स्तर से भी काफी नीचे है।
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गवर्नेंस संकट और नियुक्तियों में बढ़ती अनियमितता
विश्वविद्यालय में फैकल्टी नियुक्तियों का हाल भी बेहाल है। 2022 से 2025 के बीच 326 रिक्तियों में से 133 पदों पर “कोई उपयुक्त उम्मीदवार नहीं” (None Found Suitable) मिला। वर्तमान में महिलाओं का अनुपात महज 43.1% और रिसर्च छात्रों का 40.1% रह गया है।
JNUTA इसे एक बड़ा “गवर्नेंस संकट” करार दे रही है, जहाँ सीनियरिटी के नियमों को ताक पर रखा जा रहा है और डीन की नियुक्तियां मनमाने ढंग से हो रही हैं। यह स्पष्ट रूप से एक क्रिटिकल थिंकिंग वाले सेक्युलर संस्थान को कमजोर करने की कोशिश है, जिसे JNU मुद्रीकरण विवाद के पर्दे के पीछे अंजाम दिया जा रहा है।
धार्मिक भव्यता और शिक्षा बजट का असंतुलन
राष्ट्र की प्राथमिकताओं का विकृत क्रम तब दिखता है जब राम मंदिर पर 1,600 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जाते हैं (कुल अनुमानित लागत 1,900 से 2,150 करोड़ रुपये तक)। दीपोत्सव, नदियों को नहलाने और मोक्ष मार्ग के नाम पर सरकारी खजाने से हजारों करोड़ बहाए जा रहे हैं।
राम मंदिर ट्रस्ट ने 2023-24 में 776 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें 540 करोड़ केवल निर्माण पर थे। जबकि शिक्षा बजट 2025-26 में महज 1.28 लाख करोड़ रुपये रहा, जो जीडीपी का लगभग 4.6% (केंद्र और राज्य मिलाकर) है, जबकि NEP 2020 में 6% का लक्ष्य रखा गया था। आस्था पर भारी निवेश और भविष्य की नींव यानी शिक्षा को हाशिए पर रखना राष्ट्र की असली प्रगति पर सवाल खड़ा करता है।
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चीन से तुलना: ज्ञान के वैश्विक संघर्ष में पिछड़ता भारत
जब हम पड़ोसी चीन को देखते हैं, तो प्राथमिकताएं साफ नजर आती हैं। चीन ने 2023 में शिक्षा पर 906 बिलियन USD (6.46 ट्रिलियन युआन) का भारी निवेश किया, जो उसके जीडीपी का 4% है, लेकिन एब्सोल्यूट टर्म्स में यह भारत के शिक्षा निवेश से कई गुना अधिक है।
चीन ने प्री-स्कूल से लेकर रिसर्च और AI तक पर फोकस किया, जिससे वह विश्व नेता बना। भारत भले ही जीडीपी का 4.6% खर्च करने का दावा करे, लेकिन वास्तविक निवेश चीन के शिक्षा बजट का मुकाबला नहीं कर सकता, जो भारत की कुल जीडीपी के 25% के बराबर है।
फंड कटौती, स्कूल बंदी और संस्थानों को मुद्रीकृत करने की मजबूरी भारत को एक ऐसे ‘सिविलाइजेशनल लैग’ (Civilizational Lag) में धकेल रही है, जहाँ से वापसी कठिन होगी। अगर शिक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा नहीं माना गया, तो “विकसित भारत” केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।
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