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ममता बनर्जी की अपील: सुप्रीम कोर्ट में ‘लोकतंत्र बचाने’ की ऐतिहासिक गुहार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर एक नई मिसाल कायम की। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग (ECI) के खिलाफ अपनी लड़ाई को देश की सबसे बड़ी अदालत में ले जाते हुए, बनर्जी ने बेहद भावुक और तार्किक दलीलें पेश कीं। उन्होंने बेंच से “लोकतंत्र बचाने” की पुरजोर अपील की और हाथ जोड़कर अपनी बात रखने के लिए समय मांगा। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला करते हुए उसे “व्हाट्सएप कमीशन” करार दिया और आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए नहीं, बल्कि उनका नाम हटाने के लिए डिजाइन की गई है।

“न्याय दरवाजों के पीछे रो रहा है”: टैगोर का जिक्र और भावुक दलील

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच के सामने पेश हुईं बनर्जी ने अपनी बात की शुरुआत विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की पंक्तियों से की। उन्होंने कहा, “जब हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा होता है, जब न्याय दरवाजे के पीछे रो रहा होता है, जैसा कि रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, तभी हमने सोचा कि हमें अदालत आना चाहिए।” बनर्जी ने खुद को एक “बंधुआ मजदूर” और एक “आम परिवार का साधारण व्यक्ति” बताते हुए कहा कि वह अपनी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि बंगाल की जनता के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को छह पत्र लिखने के बावजूद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

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“व्हाट्सएप कमीशन” और 58 लाख नाम हटाने का गंभीर आरोप

मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग माइक्रो-ऑब्जर्वर के माध्यम से व्हाट्सएप पर निर्देश जारी कर रहा है, इसलिए इसे “व्हाट्सएप कमीशन” कहना गलत नहीं होगा। बनर्जी ने दावा किया कि SIR के पहले चरण में ही लगभग 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, जिनमें जीवित लोगों को मृत घोषित करना भी शामिल है। उन्होंने बेंच को बताया कि बंगाल में बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) को दरकिनार कर बीजेपी शासित राज्यों से आए 8,000 माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य बंगाल के लोगों को कुचलना और उन्हें मताधिकार से वंचित करना है।

“सिर्फ बंगाल ही क्यों?”: भेदभाव और टारगेट करने का सवाल

ममता बनर्जी ने अपनी दलीलों में क्षेत्रीय भेदभाव का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने पूछा कि असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में, जहां चुनाव होने वाले हैं, वहां SIR क्यों नहीं किया जा रहा है? उन्होंने कहा, “24 साल बाद, अचानक दो महीने में ऐसा करने की क्या जल्दी थी, जबकि इस काम में सामान्यतः दो साल लगते हैं? त्योहारों और फसल कटाई के मौसम में लोगों को नोटिस भेजकर परेशान किया जा रहा है।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस भीषण उत्पीड़न और तनाव के कारण 100 से अधिक लोगों और कई चुनाव अधिकारियों की मौत हो चुकी है।

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महिलाओं और प्रवासी मजदूरों के साथ अन्याय

अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर बनर्जी ने जमीनी स्तर की विसंगतियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि शादी के बाद सरनेम बदलने वाली महिलाओं और अपना घर बदलने वाले प्रवासी मजदूरों को “तार्किक विसंगतियों” (Logical Discrepancies) के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि बंगाल में आधार कार्ड, अधिवास प्रमाण पत्र और सरकारी आवास प्रमाण पत्रों को पहचान के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है, जबकि अन्य राज्यों में इन्हें अनुमति मिली हुई है। CJI ने इस पर कहा कि आधार की अपनी सीमाएं हैं और चूंकि SIR की वैधता पर फैसला सुरक्षित है, इसलिए वे इस पर अधिक टिप्पणी नहीं कर सकते।

चुनाव आयोग का बचाव: अधिकारियों की कमी का तर्क

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने इन आरोपों का खंडन किया। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने पर्याप्त संख्या में ग्रेड-टू अधिकारी (ERO के रूप में) उपलब्ध नहीं कराए, जिसके कारण माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। द्विवेदी ने दावा किया कि बंगाल सरकार ने केवल निचले रैंक के कर्मचारियों को ही इस प्रक्रिया के लिए दिया था। हालांकि, बनर्जी ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सभी 23 जिलों में आवश्यक संख्या में अधिकारी उपलब्ध कराए गए हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कोर्ट को बताया कि राज्य में चुनावी अधिकारियों के प्रति दुश्मनी का माहौल है।

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सुप्रीम कोर्ट का दखल और ईसीआई को नोटिस

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और सोमवार (9 फरवरी) तक जवाब मांगा है। बेंच ने ईसीआई को निर्देश दिया कि नाम में गड़बड़ी के आधार पर नोटिस भेजते समय पूरी सावधानी बरती जाए और किसी भी निर्दोष नागरिक का नाम सूची से न हटे। CJI कांत ने कहा, “हर समस्या का समाधान होता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि असली लोग मतदाता सूची में बने रहें। अगर रॉय, दत्ता या गांगुली जैसे नाम स्पेलिंग की गलती से छूट रहे हैं, तो यह स्वीकार्य नहीं है।” कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि राज्य सरकार उन अधिकारियों की सूची दे जिन्हें माइक्रो-ऑब्जर्वर की जगह तैनात किया जा सके।

टीएमसी ने बताया “ऐतिहासिक जीत”

सुनवाई समाप्त होने के बाद, तृणमूल कांग्रेस ने इसे एक बड़ी नैतिक और कानूनी जीत के रूप में प्रचारित किया। पार्टी ने ‘X’ पर पोस्ट कर कहा कि मुख्यमंत्री ने कोर्ट में वकील का कोट पहनकर तथ्यों के साथ बहस की और चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करवाई। बनर्जी ने 28 जनवरी को दायर अपनी याचिका में आशंका जताई थी कि यदि इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया, तो 2026 के विधानसभा चुनावों में “समान अवसर” (Level Playing Field) खत्म हो जाएगा। अब सबकी निगाहें सोमवार की सुनवाई पर टिकी हैं, जब चुनाव आयोग को इस “व्हाट्सएप कमीशन” वाले आरोपों और प्रक्रियात्मक खामियों पर अपना जवाब दाखिल करना होगा।

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