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पुणे पोर्श कांड: आरोपियों की जमानत पर उठे सवाल और आक्रोश

जमानत पर उठे सवाल

पुणे के हाई-प्रोफाइल पोर्श हिट-एंड-रन मामले में जमानत पर उठे सवाल अब और गहरे हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन प्रमुख आरोपियों—आदित्य अविनाश सूद, आशीष सतीश मित्तल और अमर संतोष गायकवाड़—को जमानत दिए जाने के फैसले पर जबलपुर के पीड़ित परिवार ने गहरा दुख और हैरानी जताई है।

19 मई, 2024 की उस काली रात ने दो होनहार सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स, अश्विनी कोष्टा और अनीश अवधिया की जान ले ली थी। अश्विनी के पिता सुरेश कोष्टा का कहना है कि यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करता है। उन्होंने आशंका जताई है कि आरोपियों के बाहर आने से सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है और गवाहों को डराया-धमकाया जा सकता है।

न्यायिक प्रक्रिया की मजबूती और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका

सुरेश कोष्टा ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि देश की सर्वोच्च अदालत भी निचली अदालतों की तरह ही सख्त रुख अपनाएगी। आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने एक्सीडेंट के बाद नाबालिग चालक के नशे में होने की बात छिपाने के लिए पूरे हॉस्पिटल सिस्टम में हेरफेर किया। आरोपियों ने भारी रिश्वत देकर ब्लड सैंपल बदल दिए थे।

ऐसे में उन्हें जमानत मिलना सिस्टम की शुचिता पर चोट है। कोष्टा परिवार ने पुलिस से अपील की है कि इन आरोपियों की हरकतों और उनकी बातचीत पर कड़ी नजर रखी जाए ताकि वे जांच को प्रभावित न कर सकें। इस हाई-प्रोफाइल मामले में जमानत पर उठे सवाल प्रशासन की सतर्कता पर भी एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं।

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ससून अस्पताल का ब्लड स्वैपिंग स्कैंडल और साजिश की परतें

जांच में खुलासा हुआ था कि पुणे के सरकारी ससून जनरल अस्पताल में पावर का गलत इस्तेमाल कर लीपापोती की गई थी। जब नाबालिग ड्राइवर को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया, तो कथित तौर पर उसका ब्लड सैंपल उसकी मां के सैंपल से बदल दिया गया था।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले इन आरोपियों की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज की थी कि इनका मकसद सरकारी मेडिकल रिकॉर्ड में हेरफेर करना था। कोर्ट ने इसे एक “पूर्व-नियोजित साजिश” करार दिया था। केमिकल एनालिसिस और डीएनए रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि रिश्वत के बदले गलत ब्लड सैंपल लेने के लिए पूरी प्रक्रिया को ही बदल दिया गया था।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की माता-पिता की जिम्मेदारी पर तीखी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने आरोपियों को 18 महीने जेल में बिताने के आधार पर जमानत दी, लेकिन साथ ही माता-पिता की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों पर नियंत्रण नहीं रख पाते, यह उनकी बड़ी विफलता है।

उन्होंने कहा कि बच्चों को बिना देखरेख के लग्जरी कारें, एटीएम कार्ड और बेहिसाब पैसा देना एक गंभीर सामाजिक समस्या है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब माता-पिता बच्चों के साथ समय नहीं बिताते और उन्हें केवल संसाधनों से नवाजते हैं, तो ऐसे ही दर्दनाक हादसे होते हैं। इन टिप्पणियों के बाद सामाजिक स्तर पर भी जमानत पर उठे सवाल चर्चा का विषय बन गए हैं।

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नाबालिग अपराधियों के लिए कानूनों में बदलाव की पुरजोर मांग

जबलपुर के पीड़ित परिवार ने एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर सवाल उठाया है। सुरेश कोष्टा ने मांग की है कि जघन्य अपराधों में शामिल 15 साल से अधिक उम्र के नाबालिगों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

उन्होंने उस संस्कृति की भी आलोचना की जहां अमीर माता-पिता अपने “बिगड़े हुए बच्चों” को तेज रफ्तार कारें गिफ्ट करते हैं। उन्होंने अश्विनी की अनुशासित परवरिश का जिक्र करते हुए कहा कि इस मामले में कानून का डर पैदा करने के लिए एक मिसाल कायम की जानी चाहिए थी। उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं की दर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की चिंताओं का भी हवाला दिया।

300 शब्दों का निबंध और सिस्टम का विरोधाभास

यह मामला तब और चर्चा में आया था जब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने शुरुआत में नाबालिग आरोपी को केवल 300 शब्दों का निबंध लिखने जैसी आसान शर्तों पर जमानत दे दी थी। हालांकि, जन आक्रोश और पुलिस की अपील के बाद बोर्ड ने अपना फैसला बदला और उसे सुधार गृह भेजा गया।

25 जून को बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे जमानत दी थी। 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से कार चलाकर दो जिंदगियां छीनने वाले आरोपी को मिली राहतों के कारण ही आज बार-बार जमानत पर उठे सवाल सुर्खियां बटोर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि वर्तमान जमानत का मतलब बरी होना नहीं है और ट्रायल अपनी मेरिट पर चलेगा।

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फॉक्सकॉन टैक्स विवाद और अजित पवार के जेट का ब्लैक बॉक्स एनालिसिस

इसी कानूनी गहमागहमी के बीच अन्य महत्वपूर्ण खबरें भी चर्चा में रहीं। कर्नाटक में फॉक्सकॉन कंपनी का एक ग्राम पंचायत के साथ स्थानीय टैक्स न चुकाने और नियमों के उल्लंघन को लेकर विवाद चल रहा है। स्थानीय लोग नौकरी न मिलने और टैक्स चोरी को लेकर विरोध प्रदर्शन की धमकी दे रहे हैं।

दूसरी ओर, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के क्रैश हुए जेट VT-SSK का ब्लैक बॉक्स विश्लेषण के लिए दिल्ली भेज दिया गया है। एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) इसकी जांच कर रहा है, जबकि बारामती एयरस्ट्रिप फिलहाल परिचालन के लिए बंद है।

इंसाफ की राह में चुनौतियों का अंबार

पुणे पोर्श कांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि रसूख और पैसे के बल पर कानून को ठेंगा दिखाने की कोशिश का प्रतीक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपियों को जेल में बिताए समय के आधार पर रिहाई दी हो, लेकिन पीड़ित परिवारों का घाव अब भी हरा है।

सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायणन द्वारा कोर्ट में बताए गए पैटर्न और जस्टिस नागरत्ना की सहमति यह दर्शाती है कि समाज में नशे, तेज रफ्तार और पैसे के अहंकार का जो कॉकटेल बन रहा है, उस पर लगाम लगाना जरूरी है। इंसाफ की यह लड़ाई अभी लंबी है और पूरा देश इस ट्रायल के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहा है।

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