काला घोड़ा फेस्टिवल विवाद: आनंद तेलतुंबडे का सेशन रद्द
मुंबई के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर इस समय काला घोड़ा फेस्टिवल विवाद गहरा गया है। 31 जनवरी से शुरू हुए और 8 फरवरी तक चलने वाले इस हाई-प्रोफाइल ‘काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल’ (KGAF) में एक बेहद चौंकाने वाला मोड़ आया है। फेस्टिवल आयोजकों ने ‘इनकार्सरेटेड: टेल्स फ्रॉम बिहाइंड बार्स’ नामक एक महत्वपूर्ण चर्चा को रद्द कर दिया है।
यह कार्यक्रम गुरुवार, 5 फरवरी की शाम 8 बजे से 9 बजे के बीच होना था। इस चर्चा में जेल के भीतर के अनुभवों और मानवाधिकारों पर विमर्श किया जाना था, लेकिन इसे अंतिम समय पर रोक दिया गया।
पुलिस के कथित ‘मौखिक’ आदेश पर लगा प्रतिबंध
बताया जा रहा है कि यह पूरा घटनाक्रम मुंबई पुलिस के कथित मौखिक निर्देश के बाद हुआ है। सूत्रों के अनुसार, आयोजकों ने कार्यक्रम का पूरा विवरण पुलिस विभाग के साथ साझा किया था, लेकिन बाद में उन्हें इसे रद्द करने के लिए सूचित किया गया। इस कदम से न केवल प्रतिभागी बल्कि कला प्रेमी भी हैरान हैं।
‘काला घोड़ा फेस्टिवल विवाद’ तब और बढ़ गया जब आयोजकों ने न केवल सेशन वापस लिया, बल्कि सोशल मीडिया से इससे संबंधित सभी प्रमोशनल पोस्ट हटाने के भी निर्देश दिए। प्रतिभागियों से भी आग्रह किया गया कि वे अपने स्तर पर की गई प्रचार सामग्री को हटा लें।
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नीता कोल्हाटकर और आनंद तेलतुंबडे की अनसुनी दास्तान
इस चर्चा के मुख्य पैनलिस्ट पत्रकार और लेखिका नीता कोल्हाटकर तथा एक्टिविस्ट व लेखक आनंद तेलतुंबडे थे। कोल्हाटकर की पुस्तक ‘द फियर्ड: कन्वर्सेशंस विद इलेवन पॉलिटिकल प्रिजनर्स’ जेल में बंद कैदियों के जीवन को बारीकी से चित्रित करती है।
वहीं, आनंद तेलतुंबडे की हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘द सेल एंड द सोल: प्रिज़न मेमोइर’ (2025) उनके ढाई साल के कारावास के अनुभवों पर आधारित है। दोनों वक्ताओं को स्क्रॉल के संपादक नरेश फर्नांडिस के साथ संवाद करना था, लेकिन इस रोक ने संवाद के इन दरवाजों को बंद कर दिया है।
आयोजकों के ईमेल और सुरक्षा का हवाला
पैनलिस्ट आनंद तेलतुंबडे ने बताया कि उन्हें आयोजकों से एक ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें कहा गया था कि पुलिस ने कार्यक्रम की प्रमोशनल सामग्री और समय में बदलाव के लिए बनाए गए ‘क्रिएटिव’ को देखने के बाद आपत्ति जताई है और सेशन रद्द करने का अनुरोध किया है।
जब इस विषय पर फेस्टिवल के प्रवक्ता से बात की गई, तो उन्होंने केवल इतना कहा कि “काला घोड़ा की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है” और इस विवाद पर आगे किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। हालांकि, इस संक्षिप्त प्रतिक्रिया ने कई अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए हैं।
लेखिका नीता कोल्हाटकर का तीखा पलटवार
इस फैसले पर गहरी निराशा जताते हुए नीता कोल्हाटकर ने कहा कि दोनों वक्ताओं के बीच समानता केवल ‘कैद’ का अनुभव थी। उन्होंने सवाल उठाया कि एक लोकतंत्र में हम इस तरह के शांतिपूर्ण कार्यक्रमों को कैसे रद्द कर सकते हैं? उन्होंने दक्षिणपंथी ट्रोल्स द्वारा खुद को ‘अर्बन नक्सल’ कहे जाने पर भी कड़ा एतराज जताया।
कोल्हाटकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि विचारों की असहमति स्वीकार्य है, लेकिन किसी को लेबल करना या अपमानजनक नाम देना गलत है। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार माना है।
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नरेश फर्नांडिस ने पुलिसिया कार्रवाई पर जताई हैरानी
इवेंट के मॉडरेटर नरेश फर्नांडिस ने भी पुलिस के इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त किया है। उन्होंने तर्क दिया कि तेलतुंबडे एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं जो विभिन्न समाचार पत्रों में नियमित कॉलम लिखते हैं और उन्होंने पहले भी कई मंचों पर अपनी किताब पर चर्चा की है।
फर्नांडिस ने स्पष्ट किया कि तेलतुंबडे कभी भी हिंसा के पक्ष में नहीं रहे हैं और उन्हें नक्सली या माओवादी कहना पूरी तरह निराधार है। उनके अनुसार, एक लेखक को अपनी जेल यात्रा साझा करने से रोकना कलात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ है।
भीमा कोरेगांव मामला और तेलतुंबडे का संघर्ष
आनंद तेलतुंबडे को 14 अप्रैल 2020 को NIA द्वारा भीमा कोरेगांव मामले में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। वह उन 16 बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं में शामिल थे, जिन पर 2018 की जातिगत हिंसा भड़काने का आरोप लगा था। मानवाधिकार समूहों ने हमेशा इसे विरोधियों को चुप कराने का हथियार बताया है।
तेलतुंबडे ने 31 महीने तलोजा सेंट्रल जेल में बिताए और नवंबर 2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद बाहर आए। उनकी किताब ‘द सेल एंड द सोल’ जेल की खराब स्थिति और वहां के अपमानजनक जीवन को उजागर करती है।
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जेल: सुधार का केंद्र या राज्य का हथियार?
फेस्टिवल में होने वाली चर्चा का मूल आधार यह था कि कैसे जेल, जिसका ऐतिहासिक उद्देश्य सुधार था, अब राज्य का बदला लेने का माध्यम बनती जा रही है। तेलतुंबडे की किताब एंजेला डेविस के विचारों की तर्ज पर भारतीय जेल प्रणाली की कमियों को दिखाती है।
काला घोड़ा फेस्टिवल विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कला के मंचों पर भी अब केवल ‘सेंसर’ की हुई आवाजों को ही जगह मिलेगी? बीएमसी, महाराष्ट्र पर्यटन विभाग और पुलिस के सहयोग से चलने वाले इस बड़े मेले में ऐसी पाबंदी सांस्कृतिक जगत के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
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