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सीजेआई (CJI )सूर्यकांत का संदेश: कानून केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं

सीजेआई सूर्यकांत का संदेश

सीजेआई सूर्यकांत का संदेश आज देश के हर लॉ स्कूल और अदालत के गलियारों में गूंज रहा है, जहाँ उन्होंने युवा कानून स्नातकों को उनके पेशे की असली गरिमा याद दिलाई है। रविवार, 22 फरवरी 2026 को एक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने स्पष्ट रूप से कहा कि कानून का पेशा केवल व्यक्तिगत लाभ या आर्थिक उन्नति के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कोई ‘करियर लेडर’ (सीढ़ी) नहीं है।

उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में युवा वकील न्याय की सेवा के बजाय कॉर्पोरेट सफलता और व्यक्तिगत उपलब्धियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि वकीलों का प्राथमिक कर्तव्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाना है, न कि केवल अपनी प्रोफेशनल प्रोफाइल को चमकाना।

किले से फोरम तक का सफर: कानून को सुलभ बनाने की सीजेआई की बड़ी अपील

अपने संबोधन के दौरान सीजेआई सूर्यकांत का संदेश बहुत स्पष्ट था कि हमें कानून को एक ‘अभेद्य किले’ (Fortress) से निकालकर एक ‘खुले मंच’ (Forum) में बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि अक्सर कानूनी भाषा और प्रक्रियाएं इतनी जटिल होती हैं कि एक सामान्य नागरिक के लिए उन्हें समझना नामुमकिन हो जाता है।

मुख्य न्यायाधीश ने युवा स्नातकों से आग्रह किया कि वे कानून को अधिक सुलभ और समझने योग्य बनाएं ताकि आम आदमी न्याय व्यवस्था से डरे नहीं, बल्कि उस पर भरोसा करे। उन्होंने कानून को ‘इंटेलिजिबल’ यानी बोधगम्य बनाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि समाज का हर वर्ग अपने अधिकारों को पहचान सके और उनका लाभ उठा सके।

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जड़ों से जुड़ा कानून: समाज और स्नातक के बीच बढ़ती दूरी पर सीजेआई की चिंता

मुख्य न्यायाधीश ने अपने भाषण में इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि कानून कभी भी समाज से कटकर काम नहीं कर सकता। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश यह था कि युवा स्नातकों को अपनी शिक्षा और प्रैक्टिस को सामाजिक वास्तविकता में जड़ें जमाकर रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर उच्च शिक्षण संस्थानों से निकलने वाले छात्र जमीनी स्तर की समस्याओं और ग्रामीण भारत की कानूनी चुनौतियों से अनजान होते हैं।

उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे केवल बड़े शहरों की ऊंची इमारतों तक सीमित न रहें, बल्कि उन समुदायों के बीच जाएं जिन्हें वास्तव में कानूनी सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता है। जब तक कानून समाज की नब्ज को नहीं पहचानेगा, वह अपनी सार्थकता खो देगा।

अभिजात वर्ग से परे न्याय: क्या कानून केवल अमीरों के लिए एक सुरक्षित मंच है?

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में मैंने देखा है कि न्याय अक्सर महंगा और पहुँच से बाहर होता है, और यही बात सीजेआई सूर्यकांत का संदेश भी उजागर करती है। उन्होंने युवा स्नातकों को सचेत किया कि वे कानून को केवल एक अभिजात वर्ग (Elite) के उपकरण के रूप में न देखें।

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कानूनी पेशे का असली मूल्य तभी है जब वह एक शोषित और गरीब व्यक्ति को भी उतना ही शक्तिशाली महसूस कराए जितना कि एक शक्तिशाली कॉरपोरेट घराने को। सीजेआई ने इस धारणा को तोड़ने का आह्वान किया कि न्याय केवल भारी फीस देने वालों के लिए सुरक्षित है। उन्होंने प्रो-बोनो (मुफ्त) कानूनी सहायता को करियर का एक अनिवार्य हिस्सा बनाने का सुझाव दिया।

कानूनी शिक्षा में बदलाव की जरुरत: डिग्री और नैतिकता के बीच का संतुलन

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस बात पर भी चर्चा की कि वर्तमान कानूनी शिक्षा प्रणाली में केवल ‘प्रक्रिया’ सिखाई जा रही है, न कि ‘नैतिकता’। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश संस्थानों के लिए भी एक चेतावनी था कि वे केवल ‘कानूनी टेक्नीशियन’ तैयार न करें, बल्कि ‘न्याय के प्रहरी’ तैयार करें।

उन्होंने कहा कि एक वकील की डिग्री तभी सफल है जब वह समाज में व्याप्त अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस रखती हो। उन्होंने लॉ स्कूलों से अपनी पाठ्यक्रम नीति में संशोधन करने और छात्रों को नैतिक नेतृत्व की शिक्षा देने की बात कही। करियर की भागदौड़ में अक्सर छात्र अपनी उस शपथ को भूल जाते हैं जो उन्होंने इस पेशे में कदम रखते समय ली थी।

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जेन-जी और मिलेनियल्स के लिए चुनौती: रीयल्स की दुनिया और रियलिटी के बीच कानून

आज की डिजिटल पीढ़ी के लिए यह संबोधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वे ‘इंस्टेंट सक्सेस’ के युग में जी रहे हैं। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश जेन-जी के उन वकीलों के लिए एक रियलिटी चेक है जो सोशल मीडिया और नेटवर्किंग को न्याय से ऊपर रखते हैं।

मिलेनियल्स को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सफलता के शॉर्टकट आपको ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं, लेकिन न्याय के प्रति आपकी प्रतिबद्धता ही आपको महान बनाएगी।

युवाओं के बीच बढ़ती हुई कॉम्पिटिटिव मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धा स्वस्थ होनी चाहिए और उसका उद्देश्य समाज का उत्थान होना चाहिए, न कि सहकर्मी को पीछे छोड़कर केवल आगे निकलना।

भविष्य का रोडमैप: सुलभ न्याय के लिए तकनीक और संवेदना का मेल

मुख्य न्यायाधीश ने भविष्य की ओर देखते हुए कहा कि तकनीक को कानून को सरल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश डिजिटल इंडिया के दौर में बहुत प्रासंगिक है, जहाँ ई-कोर्ट और ऑनलाइन विधिक सेवाओं के माध्यम से न्याय को अंतिम छोर तक पहुँचाया जा सकता है।

उन्होंने युवा वकीलों को तकनीक का उपयोग इस तरह करने की सलाह दी कि वे जटिल कानूनी दस्तावेजों को स्थानीय भाषाओं और सरल शब्दों में अनुवाद कर सकें। संवेदनशीलता और तकनीक का यह मेल ही भारत की न्याय प्रणाली को ‘सुलभ’ बना सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नई पीढ़ी अपने ज्ञान से न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता लाएगी।

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एक वकील के रूप में आपकी असली जीत क्या है?

अंततः, मुख्य न्यायाधीश के इस संबोधन का सार यही है कि कानून एक पवित्र जिम्मेदारी है, न कि व्यापार। एक वरिष्ठ संपादक के रूप में मेरा मानना है कि सीजेआई सूर्यकांत का संदेश एक रिमाइंडर है कि न्याय की कुर्सी और वकील की पैरवी के केंद्र में हमेशा इंसान होना चाहिए, कागज़ नहीं।

अगर युवा वकील कानून को अपनी करियर की सीढ़ी बनाने के बजाय उसे सेवा का माध्यम बनाएंगे, तभी भारत एक न्यायपूर्ण समाज बन पाएगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये युवा स्नातक इस संदेश को अपनी पेशेवर जिंदगी में कितनी गहराई से उतारते हैं। कानून की ताकत उसकी सुलभता में है, उसकी जटिलता में नहीं।

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