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न्यायमूर्ति सूर्यकांत CJI: अनुच्छेद 370 फैसला, ऐतिहासिक सफर की शुरुआत।

अनुच्छेद 370 फैसला

अनुच्छेद 370 फैसला सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत 24 नवंबर को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने वाले हैं, जो CJI बीआर गवई का स्थान लेंगे। हरियाणा के हिसार जिले के एक छोटे से गाँव से ताल्लुक रखने वाले कांत ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च न्यायिक पद तक पहुँचे हैं।

वह हरियाणा से इस पद पर आसीन होने वाले पहले व्यक्ति भी होंगे। उनका कार्यकाल फरवरी 2027 तक, यानी हाल के वर्षों में सबसे लंबे कार्यकाल में से एक होगा। उनके कार्यकाल की अवधि लगभग 14 महीने (या 15 महीने, जैसा कि कुछ स्रोतों में उल्लेख है, उनकी सेवानिवृत्ति 9 फरवरी, 2027 को होगी) की होगी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने संवैधानिक कानून, मानवाधिकार, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक न्याय और मीडिया विनियमन से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसलों से न्यायशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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CJI गवई की सिफारिश और उत्तराधिकार की प्रक्रिया

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) भूषण आर. गवई ने 23 नवंबर को अपनी सेवानिवृत्ति से पहले, न्यायमूर्ति सूर्यकांत के नाम की औपचारिक रूप से केंद्र सरकार को अपने उत्तराधिकारी के रूप में सिफारिश की, जिससे उनके भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बनने का रास्ता साफ हो गया।

यह सिफारिश कानून मंत्रालय द्वारा CJI गवई से उनके उत्तराधिकारी के लिए सुझाव मांगे जाने के जवाब में आई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जो वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं, न्यायमूर्ति गवई के सेवानिवृत्त होने पर पदभार ग्रहण करेंगे और 24 नवंबर को शपथ लेंगे।

प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) के अनुसार, जो न्यायिक नियुक्तियों को नियंत्रित करता है, सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश, जिन्हें पद के लिए उपयुक्त माना जाता है, को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।

CJI गवई ने मई 2025 में भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था। परंपरा के अनुसार, विधि मंत्रालय वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को उनकी सेवानिवृत्ति से लगभग एक महीने पहले पत्र लिखकर अगले वरिष्ठतम न्यायाधीश का नाम मांगता है।

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ऐतिहासिक फैसले: संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामले

न्यायमूर्ति सूर्यकांत का करियर कई महत्वपूर्ण फैसलों से चिह्नित है। सबसे प्रमुख निर्णयों में से एक अनुच्छेद 370 फैसला (2023) था। वह पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के हिस्से के रूप में शामिल थे, जिसने केंद्र सरकार के 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था।

पीठ ने यह फैसला सुनाया कि यह कदम संवैधानिक रूप से वैध था और संसद के अधिकारों के भीतर था। इसके अलावा, वह उस पीठ का हिस्सा थे जिसने औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून को स्थगित रखा (2022) और निर्देश दिया कि सरकार की समीक्षा लंबित रहने तक इसके तहत कोई नई प्राथमिकी दर्ज न की जाए।

शैक्षणिक संस्थान और पर्यावरण पर रुख

न्यायमूर्ति कांत ने शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) का अल्पसंख्यक दर्जा (2024) से संबंधित मामले में, कांत सहित सात-न्यायाधीशों की पीठ ने विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर पुनर्विचार करने के 1967 के एक पूर्व निर्णय को खारिज कर दिया।

इस फैसले में केंद्रीय कानून के तहत स्थापित संस्थाओं को विनियमित करने के संसद के अधिकार की जाँच की गई।

पर्यावरण के संबंध में, ‘लीगल मेस्ट्रोस बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण’ और ‘जितेंद्र सिंह बनाम पर्यावरण मंत्रालय’ के मामलों में (2019), उन्होंने दिल्ली रिज में पर्यावरण बहाली के लिए राज्य प्राधिकरणों को जवाबदेह ठहराया और इस बात की पुष्टि की कि तालाब और इसी तरह की सार्वजनिक उपयोगिताएँ अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं।

उन्होंने उत्तराखंड में चार धाम परियोजना को भी बरकरार रखा, जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के रणनीतिक महत्व के साथ संतुलित किया गया।

सामाजिक और लैंगिक न्याय की पहल

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लैंगिक न्याय और सामाजिक समरसता पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन सहित सभी बार एसोसिएशनों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएँ (2024)। इस फैसले का उद्देश्य भारत के विधिक संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व और लैंगिक संतुलन सुनिश्चित करना था।

उन्होंने गैरकानूनी रूप से पद से हटाई गई एक महिला सरपंच को बहाल किया और इस मामले में लैंगिक पूर्वाग्रह की निंदा की। इसके अतिरिक्त, उनकी पीठ सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों की स्थायी कमीशन में समानता की मांग वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई जारी रखे हुए है।

घरेलू कामगारों के लिए, उनकी पीठ ने कानूनी ढाँचे के अभाव पर चिंता जताई और केंद्र को इस असुरक्षित कार्यबल के लिए सुरक्षा का प्रस्ताव देने हेतु एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया।

चुनावी पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर सख्त रुख

चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता पर ज़ोर देते हुए, न्यायमूर्ति कांत ने चुनाव आयोग को बिहार की मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया (2025)। उन्होंने भ्रष्टाचार को एक “गंभीर सामाजिक खतरा” बताया है।

2023 के एक फैसले में, उन्होंने सीबीआई को 28 मामलों की जाँच करने का आदेश दिया, जिसमें घर खरीदारों के साथ धोखाधड़ी करने वाले “बैंकों और डेवलपर्स के बीच अपवित्र गठजोड़” का पर्दाफाश हुआ था। उन्होंने सीबीआई के आबकारी नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ज़मानत देने वाली पीठ का भी नेतृत्व किया और टिप्पणी की कि एजेंसी को ‘पिंजरे में बंद तोता’ होने की धारणा को दूर करने के लिए काम करना चाहिए।

इसके अलावा, भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजे का अधिकार (2025) पर फैसला सुनाते हुए, उन्होंने कहा कि उचित मुआवजे के निर्धारण के लिए नीलामी बिक्री मूल्यों का उपयोग किया जा सकता है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में, कांत उस पीठ में शामिल थे जिसने 2022 में प्रधानमंत्री की पंजाब यात्रा के दौरान हुई सुरक्षा चूक की स्वतंत्र जाँच का आदेश दिया था और कहा था कि ऐसे मामलों के लिए “न्यायिक रूप से प्रशिक्षित दिमाग” की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, उनकी पीठ ने सशस्त्र बलों के पूर्व सैनिकों के लिए एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) योजना की वैधता को बरकरार रखा (2022)।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में, उन्होंने आगाह किया है कि यह निरपेक्ष नहीं है। आपत्तिजनक ऑनलाइन टिप्पणियों पर विचार कर रही पीठ में शामिल कांत ने पाँच हास्य कलाकारों को विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने वाली टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने का आदेश दिया।

साथ ही, उन्होंने केंद्र को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री के विनियमन के लिए एक ढाँचा विकसित करने का निर्देश दिया (2025)। उन्होंने पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया की विवादास्पद टिप्पणियों पर भी चेतावनी दी कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करने का लाइसेंस नहीं है”।

उन्होंने एक मंत्री द्वारा की गई विवादास्पद टिप्पणी पर भी फटकार लगाते हुए कहा था कि मंत्री द्वारा बोला गया हर शब्द जिम्मेदारी की भावना के साथ होना चाहिए। इस संदर्भ में, यह जानना महत्वपूर्ण है कि अनुच्छेद 370 फैसला भी एक तरह से संवैधानिक अभिव्यक्ति की व्याख्या को ही दर्शाता है।

हिसार से सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर

10 फरवरी, 1962 को हरियाणा के हिसार जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 1981 में हिसार के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1984 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से कानून की डिग्री प्राप्त की।

उन्होंने 1984 में हिसार जिला न्यायालय में अपनी वकालत शुरू की और 1985 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में वकालत करने के लिए चंडीगढ़ चले गए। उन्होंने संवैधानिक, सेवा और दीवानी मामलों में विशेषज्ञता हासिल की।

उन्होंने 7 जुलाई, 2000 को हरियाणा के सबसे कम उम्र के महाधिवक्ता बनने का गौरव प्राप्त किया। मार्च 2001 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया। वह 9 जनवरी, 2004 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुए।

उन्होंने 5 अक्टूबर, 2018 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया और 24 मई, 2019 को उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया। सर्वोच्च न्यायालय में अपनी पदोन्नति के बाद से, वे 300 से अधिक पीठों का हिस्सा रहे हैं। वे भारतीय विधि संस्थान (ILI) की कई समितियों के सदस्य भी हैं।

अब, जब वे मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे, तो उन्हें लगभग 90,000 लंबित मामलों को निपटाने के कठिन कार्य का सामना करना पड़ेगा।

न्यायिक नियुक्तियों और स्थानांतरणों को नियंत्रित करने वाले प्रक्रिया ज्ञापन के अनुसार, अनुच्छेद 370 फैसला जैसी संवैधानिक चुनौतियों का सामना करने वाला यह न्यायिक व्यक्तित्व, शीर्ष न्यायपालिका का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

अनुच्छेद 370 फैसला सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक निर्णायक क्षण बन गया है। अदालत ने केंद्र सरकार के 2019 के फैसले को वैध करार दिया, जिसमें जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटाया गया था। यह फैसला भारतीय संघीय ढांचे और संविधान की व्याख्या के लिहाज से भी मील का पत्थर साबित हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ गठित की थी।मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने सर्वसम्मति से निर्णय सुनाया।केंद्र के कदम को संवैधानिक माना गया।

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