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महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े: गायब मां-बेटियों का दहला देने वाला सच!

महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े

महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े ने आज राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जो डेटा पेश किया, वह किसी की भी रूह कंपा देने के लिए काफी है।

पिछले दो वर्षों के दौरान महाराष्ट्र में कुल 1.17 लाख महिलाएं और नाबालिग लड़कियां लापता बताई गई हैं। फडणवीस ने सदन को सूचित किया कि जहां एक ओर लापता होने की संख्या डराने वाली है, वहीं पुलिस ने अपनी तत्परता दिखाते हुए एक बड़ी संख्या में उनकी ‘घर वापसी’ भी सुनिश्चित की है।

यह केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि उन हजारों परिवारों का दर्द और इंतजार है जो अपनी बेटियों की एक झलक पाने के लिए दिन-रात दुआएं कर रहे हैं।

ऑपरेशन मुस्कान की बड़ी सफलता: 86 हजार से अधिक चेहरों पर लौटी मुस्कुराहट

इस महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े की गंभीरता के बीच एक राहत भरी खबर यह है कि पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है। मुख्यमंत्री फडणवीस के अनुसार, 2024-25 के दौरान चलाए गए विशेष अभियानों और ‘ऑपरेशन मुस्कान’ के जरिए कुल 86,228 लापता महिलाओं और लड़कियों का पता लगाया गया है।

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग 72 प्रतिशत लापता महिलाओं और 80 प्रतिशत से अधिक नाबालिग लड़कियों को सफलतापूर्वक ट्रैक कर लिया गया है।

यह पुलिस की डिजिटल ट्रैकिंग, मुखबिर तंत्र और त्वरित कार्रवाई का ही परिणाम है कि गायब हुए 23 हजार बच्चों में से करीब 18 हजार से अधिक बच्चियां अब अपने माता-पिता के पास सुरक्षित हैं। यह रिकवरी रेट दर्शाता है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो अपराध के अंधेरे को मिटाया जा सकता है।

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एक साल में 48 हजार महिलाएं गायब: 2025 का वो डेटा जो नींद उड़ा देगा

टाइम्स ऑफ इंडिया और फ्री प्रेस जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। अकेले 2025 में महाराष्ट्र से 48,000 से अधिक महिलाओं के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज की गई। महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े में इस अचानक उछाल ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है।

हालांकि सरकार का दावा है कि इनमें से कई मामले पारिवारिक विवाद, प्रेम प्रसंग या अपनी मर्जी से घर छोड़ने के होते हैं, लेकिन मानव तस्करी (Human Trafficking) के एंगल को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का अचानक ओझल हो जाना समाज के भीतर सुलगती एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है जिसे सुलझाना केवल पुलिस नहीं, बल्कि समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है।

नाबालिग बच्चियों की सुरक्षा पर खतरा: 18 हजार लड़कियों के रेस्क्यू की पूरी दास्तां

जब हम नाबालिगों की बात करते हैं, तो महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े और भी संवेदनशील हो जाते हैं। पिछले दो सालों में करीब 23,000 नाबालिग लड़कियां लापता हुई थीं, जिनमें से 18,000 को पुलिस ने ढूंढ निकाला है। यह सफलता ‘ऑपरेशन मुस्कान’ के उस कड़े प्रोटोकॉल की वजह से मिली जहाँ रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और आश्रय गृहों की बारीकी से जांच की जाती है।

गायब होने वाली इन बच्चियों में से कई को जबरन मजदूरी या अनैतिक देह व्यापार के दलदल में धकेले जाने की साजिश थी, लेकिन समय रहते पुलिस की दखलंदाजी ने उन्हें बचा लिया। एनडीटीवी की रिपोर्ट बताती है कि तकनीक और सीसीटीवी फुटेज के बढ़ते उपयोग ने गुमशुदा बच्चों को ट्रैक करने की प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक बना दिया है।

विपक्ष का तीखा प्रहार: ‘लाडली बहन’ योजना बनाम सुरक्षा की हकीकत

विधानसभा के भीतर इन आंकड़ों पर जमकर राजनीति भी हुई। विपक्षी दलों ने सरकार की ‘लाडली बहन’ योजना पर तंज कसते हुए सवाल उठाया कि अगर राज्य की बहनें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो सरकारी योजनाओं का क्या लाभ? विपक्ष का आरोप है कि महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े यह साबित करते हैं कि राज्य में कानून का खौफ खत्म हो गया है और अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

फडणवीस ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि रिपोर्टिंग में सुधार आने की वजह से आंकड़े बढ़े हुए दिख रहे हैं, क्योंकि अब लोग खुलकर पुलिस के पास आ रहे हैं और मामले दर्ज हो रहे हैं। सरकार ने आश्वासन दिया है कि हर जिले में विशेष ‘मिसिंग सेल’ को और अधिक सक्रिय किया जाएगा ताकि एक भी मामला अनसुलझा न रहे।

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जेन-जी और सोशल मीडिया की भूमिका: रील की दुनिया और गुमशुदगी का कनेक्शन

आज की जेन-जी पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया एक वरदान है, लेकिन कई मामलों में यह गुमशुदगी का कारण भी बन रहा है। पुलिस की जांच में यह सामने आया है कि कई नाबालिग लड़कियां ऑनलाइन दोस्ती या रील बनाने के शौक के चलते अजनबियों के झांसे में आकर घर छोड़ देती हैं। महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े का एक बड़ा हिस्सा इसी डिजिटल ट्रैप से जुड़ा हुआ है।

साइबर सेल के अधिकारियों का मानना है कि युवाओं को डिजिटल साक्षरता देना अब बेहद जरूरी हो गया है। हालांकि, सोशल मीडिया का सकारात्मक पहलू यह भी है कि किसी के लापता होने पर उसकी जानकारी मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है, जिससे पुलिस को उन्हें ढूंढने में काफी मदद मिलती है। कई मामलों में व्हाट्सएप ग्रुप्स और इंस्टाग्राम स्टोरीज के जरिए ही लापता लड़कियों की लोकेशन ट्रेस की गई है।

साइकोलॉजिकल एंगल: घर से भागने और लापता होने के पीछे की मानसिक स्थिति

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लापता होने के हर मामले के पीछे केवल अपराध नहीं होता। अक्सर घरेलू हिंसा, पढ़ाई का दबाव या मानसिक तनाव के कारण महिलाएं और लड़कियां बिना बताए घर छोड़ देती हैं। महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े के विश्लेषण में यह पाया गया कि मध्यमवर्गीय परिवारों में संवाद (Communication Gap) की कमी के कारण युवा पीढ़ी अधिक विद्रोही हो रही है।

फडणवीस ने सदन में बताया कि कई बार महिलाएं वापस तो मिल जाती हैं, लेकिन वे दोबारा अपने घर नहीं जाना चाहतीं। ऐसी स्थिति में सरकार उन्हें सुरक्षित आश्रय गृहों और काउंसिलिंग की सुविधा प्रदान कर रही है। यह मामला केवल पुलिस फाइल का नहीं है, बल्कि यह हमारे पारिवारिक ढांचे की मजबूती पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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एक सुरक्षित भविष्य के लिए सामूहिक संकल्प की आवश्यकता

अंततः, महाराष्ट्र लापता महिलाएं आंकड़े हमारे लिए एक चेतावनी भी है और एक सबक भी। जहां 86 हजार से अधिक महिलाओं और बच्चियों का वापस मिलना पुलिस की बड़ी जीत है, वहीं बाकी बचे हुए हजारों लोगों का अब तक न मिलना एक टीस पैदा करता है।

एक सीनियर एडिटर के रूप में मेरा मानना है कि जब तक हम जड़ पर प्रहार नहीं करेंगे, तब तक ये संख्याएं बढ़ती रहेंगी। हमें महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए को बदलना होगा और सुरक्षा के ऐसे पुख्ता इंतजाम करने होंगे कि कोई भी बेटी अपने ही शहर में अजनबी न महसूस करे।

‘ऑपरेशन मुस्कान’ ने साबित किया है कि प्रयास कभी बेकार नहीं जाते, लेकिन मंजिल अभी दूर है। महाराष्ट्र को ‘लापता’ होने का टैग मिटाकर ‘सुरक्षित’ होने का गौरव हासिल करना ही होगा।

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