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इजराइल-ईरान युद्ध 2026 : क्या तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका है?

इजराइल-ईरान युद्ध 2026

इजराइल-ईरान युद्ध 2026 आज 28 फरवरी, 2026 को इजराइल-ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। तेहरान, इस्फहान, और कौम जैसे प्रमुख ईरानी शहरों में हुए धमाकों ने एक ऐसे संघर्ष को जन्म दिया है जो शायद सदियों तक याद रखा जाएगा। सुबह-सुबह जब तेहरान के निवासियों ने आसमान में रोशनी और धमाकों की आवाजें सुनीं, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की शुरुआत है।

अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से की गई इन स्ट्राइक्स ने मध्य-पूर्व की भू-राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया है। एक पत्रकार के रूप में, मैंने अपने 15 वर्षों के करियर में कई युद्ध और तनाव देखे हैं, लेकिन आज का मंजर कुछ अलग और अधिक भयावह महसूस हो रहा है, क्योंकि इस बार परमाणु साइटों और शीर्ष नेतृत्व के ठिकानों को निशाना बनाया गया है।

इजरायल और अमेरिका: ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की पटकथा

इजरायल के रक्षा मंत्री ने इसे एक ‘पूर्व-निवारक हमला’ करार दिया है, जिसका उद्देश्य उन खतरों को जड़ से खत्म करना है जो इजरायल के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकते थे। दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘मेजर कॉम्बैट ऑपरेशंस’ का नाम दिया है, जिसमें अमेरिका की सीधी भागीदारी स्पष्ट है।

यह हमला केवल एक सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति है जिसके तहत सैन्य ठिकानों, मिसाइल लॉन्चर्स और खुफिया प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया है।

यह स्पष्ट है कि पिछले कई महीनों से चल रही कूटनीतिक बातचीत के विफल होने के बाद, इन देशों ने सैन्य विकल्प को ही एकमात्र रास्ता चुना है। वाशिंगटन और तेल अवीव की यह संयुक्त कार्यवाही यह संकेत देती है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अब कोई समझौता नहीं होगा।

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ईरान की जवाबी कार्रवाई और क्षेत्रीय सुरक्षा का संकट

ईरान ने भी चुप बैठने के बजाय तुरंत प्रतिक्रिया दी है और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलें बरसाना शुरू कर दिया है। बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई में मौजूद ठिकानों पर हुए हमलों ने इस तनाव को पूरे अरब क्षेत्र में फैला दिया है। तेहरान का कहना है कि वे हर उस जगह को निशाना बनाएंगे जहाँ से उन पर हमला किया जा रहा है।

यह स्थिति न केवल ईरान के लिए बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को मिली चेतावनियों ने तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी तलवार लटका दी है। एक देश की तबाही अब कई देशों की अर्थव्यवस्था को नीचे खींच रही है।

तेहरान में तबाही और मानवीय त्रासदी का खौफ

जमीन पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। तेहरान की सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है और लोग सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भाग रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में आसमान में धुएं के गुबार साफ देखे जा सकते हैं। मिनब के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले में 85 छात्रों के मारे जाने की दुखद खबर ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है।

यह एक मानवीय त्रासदी है जो युद्ध के किसी भी दावे को फीका कर देती है। माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों और कार्यालयों से वापस लाने के लिए सड़कों पर हैं। अस्पतालों में आपातकालीन प्रोटोकॉल लागू कर दिए गए हैं और घायल लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो इस युद्ध के अमानवीय चेहरे को उजागर करती है।

न्यूक्लियर टेंशन: क्या हम एक वैश्विक तबाही की ओर हैं?

यह संघर्ष केवल सीमा विवाद नहीं है, बल्कि यह परमाणु हथियारों को लेकर मचे उस डर का नतीजा है जिसे लंबे समय तक कूटनीति के जरिए दबाने की कोशिश की गई थी। ट्रंप प्रशासन का यह स्पष्ट संदेश है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जाएंगे।

वहीं, ईरान अपनी संप्रभुता और आत्मरक्षा के अधिकार की बात कर रहा है। जब दुनिया के दो दिग्गज परमाणु शक्तियों के आसपास सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो खतरा हमेशा एक अनियंत्रित युद्ध का बना रहता है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका, तो आने वाले समय में दुनिया एक ऐसी तबाही देखेगी जिसकी भरपाई करना नामुमकिन होगा। हर गुजरता घंटा इस क्षेत्र को और भी अनिश्चितता की ओर धकेल रहा है।

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अमेरिका का ‘रेजीम चेंज’ एजेंडा और जनता की भूमिका

अमेरिकी राष्ट्रपति का ईरान की जनता को सीधे संबोधित करना और उन्हें अपनी सरकार को बदलने के लिए कहना एक अभूतपूर्व कदम है। इतिहास गवाह है कि बाहरी दबाव से जब भी शासन बदलने की कोशिश की जाती है, तो उसका परिणाम अक्सर अराजकता होता है।

ईरान की जनता के सामने अब एक दोराहा है: या तो वे इस युद्ध की आग में जलें या फिर अपने नेतृत्व को चुनौती दें। हालांकि, यह सोचना कि बाहरी हमले से लोकतंत्र स्थापित हो जाएगा, एक बड़ी भूल हो सकती है।

ईरान के क्रांतिकारी गार्ड्स अभी भी अपनी पकड़ बनाए हुए हैं और वे अपनी पूरी ताकत के साथ जवाब देने के लिए तैयार हैं। यह युद्ध अब केवल एक सैन्य टकराव नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक वर्चस्व की जंग भी बन गया है।

वैश्विक प्रतिक्रिया: कूटनीतिक हलचल और शांति की अपील

दुनिया भर के देश इस तनाव के बाद सकते में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने आपातकालीन बैठक बुलाई है और दुनिया के तमाम नेता ‘अधिकतम संयम’ बरतने की अपील कर रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी चिंता जताई है, हालांकि वे सीधे तौर पर इस युद्ध का हिस्सा बनने से बच रहे हैं।

भारत जैसे देश ने भी अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और शांति की अपील पर जोर दिया है। इस तरह के बड़े टकराव में कूटनीति अक्सर पीछे छूट जाती है और केवल हथियारों की भाषा सुनाई देती है। दुनिया को अब एक ऐसी आवाज की जरूरत है जो इस आग को बुझा सके, लेकिन वर्तमान हालात में ऐसी कोई आवाज अभी तक प्रभावी साबित नहीं हो रही है।

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अनिश्चित भविष्य: आने वाले दिनों की चुनौती

आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वह इतिहास में एक काला अध्याय की तरह दर्ज होगा। जब भी हम भविष्य में इजराइल-ईरान युद्ध पर चर्चा करेंगे, तो आज की इस हिंसा को एक चेतावनी के रूप में याद किया जाएगा। आने वाले हफ्तों में यह युद्ध किस दिशा में जाएगा, यह कहना बहुत मुश्किल है।

क्या ईरान अपनी जवाबी कार्रवाई को और तेज करेगा, या फिर इजरायल और अमेरिका अपने सैन्य अभियानों को और व्यापक बनाएंगे? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं।

मानवता के लिए, शांति ही एकमात्र रास्ता है, लेकिन वर्तमान में नफरत और प्रतिशोध का माहौल हर उस उम्मीद को खत्म कर रहा है जो शांति की ओर ले जा सकती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि विवेक की जीत हो, वरना यह आग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लेगी।

जिसे हम इजराइल-ईरान युद्ध 2026 के प्रभाव के रूप में देख सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संयम नहीं बरता गया,

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