ओमान में ईरान-अमेरिका परमाणु कूटनीति: मस्कट वार्ता से क्या युद्ध टलेगा?
ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान-अमेरिका परमाणु कूटनीति की एक नई और महत्वपूर्ण शुरुआत हुई है, जहाँ दोनों देशों ने महीनों के तनाव और सैन्य टकराव के बाद अप्रत्यक्ष बातचीत की मेज पर वापसी की है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस मुलाकात को एक ‘बहुत अच्छी शुरुआत’ करार दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस बातचीत का प्राथमिक लक्ष्य भविष्य की विस्तृत चर्चाओं के लिए एक ठोस ढांचा तैयार करना है। यह बैठक मस्कट के बाहरी इलाके में स्थित एक शाही महल में संपन्न हुई, जहाँ दोनों पक्षों के प्रतिनिधि अलग-अलग समय पर ओमान के शीर्ष राजनयिकों से मिले।
जून के युद्ध के बाद पहली बड़ी कूटनीतिक पहल
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जून 2025 में इज़राइल और ईरान के बीच हुए 12-दिवसीय युद्ध के बाद यह उनकी पहली औपचारिक मुलाकात थी।
उस समय अमेरिका ने ईरान के यूरेनियम संवर्धन स्थलों पर हमले किए थे, जिससे परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत पूरी तरह ठप हो गई थी। ओमान के विदेश मंत्री बदर बिन हमद अल बुसैदी ने इस दौरान दोनों पक्षों के बीच संदेशों और शर्तों के आदान-प्रदान में मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
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अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और कड़ा संदेश
इस बार की बातचीत में एक असामान्य मोड़ तब आया जब अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर भी बैठक में शामिल हुए।
कूपर की उपस्थिति को तेहरान के लिए वाशिंगटन के एक स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि यदि कूटनीति विफल होती है, तो सैन्य विकल्प अभी भी मेज पर है। वर्तमान में क्षेत्र में विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और अन्य युद्धपोतों की तैनाती ने तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान-अमेरिका परमाणु कूटनीति की यह प्रक्रिया भारी सैन्य दबाव के साये में आगे बढ़ रही है।
वार्ता का दायरा: परमाणु बनाम मिसाइल कार्यक्रम
ईरान ने स्पष्ट किया है कि बातचीत का दायरा केवल उसके परमाणु कार्यक्रम तक ही सीमित रहेगा। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना है कि किसी भी टिकाऊ समझौते के लिए ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय नीतियों पर भी चर्चा अनिवार्य है।
इसी बीच, मिस्र, तुर्की और कतर ने एक प्रस्ताव रखा है जिसके तहत ईरान तीन साल के लिए यूरेनियम संवर्धन रोक सकता है, लेकिन ईरान ने संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजने और मिसाइल कार्यक्रम को चर्चा में शामिल करने से साफ इनकार कर दिया है।
अविश्वास की गहरी खाई और भविष्य की चुनौतियां
अब्बास अराघची ने ईरानी राज्य टेलीविजन पर दिए साक्षात्कार में स्वीकार किया कि “जो अविश्वास पैदा हुआ है, वह बातचीत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।” उन्होंने कहा कि अगले कदमों के लिए वे अपनी राजधानियों से परामर्श करेंगे।
ईरान-अमेरिका परमाणु कूटनीति के इस दौर में अराघची ने सावधानीपूर्वक आशावादी रुख अपनाते हुए कहा कि अगर यह प्रक्रिया सही दिशा में चलती है, तो एक समझ विकसित हो सकती है। लेकिन अविश्वास की कमी अभी भी एक गंभीर बाधा बनी हुई है।
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अमेरिकी नागरिकों के लिए सख्त चेतावनी और सुरक्षा स्थिति
वार्ता के बीच अमेरिका ने एक नई सुरक्षा एडवाइजरी जारी कर अपने नागरिकों से तुरंत ईरान छोड़ने की अपील की है। इसमें हिरासत में लिए जाने के जोखिम और बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का हवाला दिया गया है।
यह एडवाइजरी दर्शाती है कि कूटनीतिक रास्तों के बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी अस्थिर है। ईरान-अमेरिका परमाणु कूटनीति के समानांतर, दोनों देशों ने अपनी-अपनी सैन्य तैयारियों को भी धार दी है।
ईरान की मिसाइल तैनाती और सैन्य जवाब की तैयारी
बातचीत की मेज पर बैठने से ठीक पहले ईरान ने अपनी सबसे शक्तिशाली मीडियम-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल, ‘खोर्रमशहर-4’ की फ्रंटलाइन तैनाती की पुष्टि की। मच 12 से अधिक की गति और 2,000 किलोमीटर की रेंज वाली यह मिसाइल पूरे इज़राइल और क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है।
खुफिया सूत्रों के अनुसार, ईरान ने अमेरिकी हमले की स्थिति में होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करने और साइबर हमलों सहित एक मल्टी-फेज़ जवाबी कार्रवाई की योजना भी तैयार कर ली है।
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भारत के साथ सहयोग और चाबहार का रणनीतिक महत्व
इतने तनाव के बावजूद ईरान भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों को लेकर प्रतिबद्ध है। भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली ने चाबहार बंदरगाह को एक “महत्वपूर्ण समुद्री केंद्र” बताया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद चाबहार का रणनीतिक स्थान और महत्व नहीं बदलेगा। ईरान को उम्मीद है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान उच्च स्तरीय वार्ताओं से भारत के साथ सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
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