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“राहुल गांधी मानहानि केस “में समन रद्द बॉम्बे हाईकोर्ट से झटका:

राहुल गांधी केस

राहुल गांधी केस कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को 2019 के मानहानि मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई विवादित टिप्पणी को लेकर जारी समन को रद्द करने की राहुल गांधी की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।

हालांकि, न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की एकल पीठ ने राहुल गांधी को राहत देते हुए मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष व्यक्तिगत पेशी पर लगी रोक को छह हफ्ते के लिए बढ़ा दिया है, ताकि वे इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में अपील दाखिल कर सकें।

क्या है पूरा मामला और विवादित बयान?

यह मामला सितंबर 2018 में राजस्थान में आयोजित एक जनसभा और उसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किए गए वीडियो से जुड़ा है:

विवादित बयान: राफेल फाइटर जेट सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए राहुल गांधी ने कथित तौर पर उन्हें “कमांडर-इन-थीफ” कहा था।

शिकायतकर्ता का दावा: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ता एम. एच. श्रीश्रीमाल ने गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का तर्क था कि चूंकि पीएम मोदी बीजेपी का चेहरा हैं, इसलिए यह बयान पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं और सदस्यों का अपमान है।

समन जारी: अगस्त 2019 में मजिस्ट्रेट अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ संज्ञान लेते हुए मानहानि मामले में समन जारी किया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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हाईकोर्ट ने खारिज की राहुल गांधी की दलीलें

सुनवाई के दौरान राहुल गांधी के वकीलों (सुदीप पासबोला और कुशल मोर) ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता इस मामले में ‘व्यथित पक्ष’ (Aggrieved Party) नहीं हैं, क्योंकि टिप्पणी एक व्यक्ति विशेष (प्रधानमंत्री) के खिलाफ थी, न कि किसी राजनीतिक दल के खिलाफ।

हालांकि, हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर ने इस दलील को मानने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

पार्टी के सदस्य प्रभावित: “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी का एक जाना-माना चेहरा हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई किसी भी अपमानजनक टिप्पणी से पार्टी के कार्यकर्ता व सदस्य प्रभावित होते हैं।”

सुनवाई का विषय: अदालत ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी की टिप्पणी व्यक्तिगत थी या राजनीतिक, इसका फैसला केवल सबूतों और गवाहों के बयानों की निष्पक्ष जांच (Trial) के दौरान ही किया जा सकता है।

निचली अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं: हाईकोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा जारी किए गए प्रक्रियात्मक आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या गैर-कानूनी बात नहीं पाई गई है।

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6 हफ्ते की अंतरिम राहत और आगे की राह

फैसला सुनाए जाने के बाद राहुल गांधी के कानूनी दल ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने के लिए आठ हफ्ते का समय मांगा था। शिकायतकर्ता के वकील ने इस स्थगन का विरोध किया, लेकिन अदालत ने संतुलन बनाते हुए अंतरिम आदेश को छह सप्ताह के लिए बढ़ा दिया।

इसका तात्पर्य यह है कि अगले छह हफ्तों तक राहुल गांधी को मुंबई की मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होना पड़ेगा।

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यदि वे इस समयावधि में सुप्रीम कोर्ट से रोक हासिल करने में सफल नहीं होते हैं, तो उन्हें निचली अदालत में ट्रायल का सामना करना पड़ेगा। हालिया घटनाक्रम में उच्च अदालत और निचली अदालतों में चल रहे राहुल गांधी मानहानि केस ने राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

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