“टाटा संस लिस्टिंग विवाद” बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को दिया 5 साल कार्यकाल,
भारत के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े औद्योगिक घरानों में से एक टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी ‘टाटा संस’ में शीर्ष नेतृत्व और कंपनी की लिस्टिंग को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
गुरुवार, 17 सितंबर को मुंबई में करीब तीन घंटे तक चली टाटा संस के निदेशक मंडल (Board of Directors) की अहम बैठक में एन चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त करने और कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध (Listing) करने की दिशा में कदम बढ़ाने का फैसला लिया गया।
हालांकि, टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत की नियंत्रक हिस्सेदारी रखने वाले ‘टाटा ट्रस्ट्स’ (Tata Trusts) ने बोर्ड के इन दोनों फैसलों का कड़ा विरोध किया है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने बोर्ड बैठक में इस कदम को पूरी तरह से “गैर-कानूनी” करार दिया है और संकेत दिए हैं कि ट्रस्ट्स इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती दे सकते हैं।
चंद्रशेखरन का दोबारा चयन और नेतृत्व की निरंतरता
63 वर्षीय एन चंद्रशेखरन फरवरी 2017 से टाटा संस की कमान संभाल रहे हैं। पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 2022 में उन्हें सर्वसम्मति से दूसरा कार्यकाल दिया गया था।
हाल ही में अगस्त में चंद्रशेखरन ने बोर्ड को सूचित किया था कि 20 फरवरी, 2027 को अपना मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद वे पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं।
हालांकि, टाटा संस की नामांकन और पारिश्रमिक समिति (NRC) तथा बोर्ड के सदस्यों के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया। बोर्ड के बहुमत सदस्यों का मानना था कि आगामी आईपीओ (IPO) की जटिल प्रक्रिया को देखते हुए शीर्ष प्रबंधन में निरंतरता (Continuity) बनाए रखना निवेशकों के विश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
निदेशक मंडल ने बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। हालांकि, इस पुनर्नियुक्ति पर अंतिम मुहर कंपनी की आगामी वार्षिक सामान्य बैठक (AGM) में शेयरधारकों की सहमति के बाद ही लगेगी।
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टाटा ट्रस्ट्स का विरोध और ‘गैर-कानूनी’ होने का दावा
टाटा संस के इस फैसले ने ग्रुप के भीतर के आंतरिक मतभेद को उजागर कर दिया है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया का स्पष्ट विरोध किया।
आंतरिक असहमति: नोएल टाटा का तर्क है कि चेयरमैन की चयन प्रक्रिया कंपनी के ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ (Articles of Association) के तहत गठित विशेष चयन समिति के नियमों के अनुरूप नहीं हुई है।
एयर इंडिया व अन्य नुकसानों पर चिंता: रिपोर्ट्स के मुताबिक, नोएल टाटा ने एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे नए व्यावसायिक उपक्रमों में हो रहे वित्तीय नुकसान पर भी चिंता जताई थी और वे नेतृत्व में बदलाव या कुछ शर्तों के साथ विस्तार के पक्ष में थे।
उम्मीदवारों की दौड़ रुकी: चंद्रशेखरन के विकल्प की तलाश के लिए सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने एक औपचारिक प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें टाटा स्टील के टीवी नरेंद्रन, टाटा संस के सीएफओ सौरभ अग्रवाल और एनएसई के सीईओ आशीष चौहान के नामों पर विचार हो रहा था। अब इस प्रक्रिया के रुकने की संभावना है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियम और लिस्टिंग का दबाव
टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने का फैसला भारतीय रिजर्व बैंक के कड़े नियमों के तहत लिया गया है।
अपर लेयर NBFC का दर्जा: 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को ‘अपर लेयर’ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC-UL) के रूप में वर्गीकृत किया था। इस नियम के तहत किसी भी अपर लेयर एनबीएफसी को तीन साल के भीतर यानी सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य है।
डी-रजिस्ट्रेशन की अर्जी खारिज: टाटा संस ने स्वयं को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में डी-रजिस्टर करने और अनिवार्य लिस्टिंग से छूट पाने के लिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकाया था और आरबीआई के पास आवेदन दिया था। हालांकि, 11 सितंबर को आरबीआई ने इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिससे कंपनी के पास लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
शेयरधारकों का रुख: शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप, जिसकी टाटा संस में लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लंबे समय से कंपनी की लिस्टिंग का समर्थन कर रहा है ताकि वह अपनी हिस्सेदारी का मूल्य अनलॉक करके अपना कर्ज चुका सके। दूसरी ओर, नोएल टाटा चाहते हैं कि होल्डिंग कंपनी प्राइवेट ही बनी रहे।
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भारत के इतिहास का सबसे बड़ा IPO होने का अनुमान
यदि टाटा संस शेयर बाजार में लिस्ट होती है, तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का सबसे बड़ा आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) साबित हो सकता है।
20 लाख करोड़ की वैल्यूएशन: टाटा संस के पास स्टील, ऑटोमोबाइल (टाटा मोटर्स), सॉफ्टवेयर (TCS), हॉस्पिटैलिटी (इंडियन होटल्स) और एविएशन जैसे प्रमुख क्षेत्रों की एक दर्जन से अधिक सूचीबद्ध कंपनियों में नियंत्रक हिस्सेदारी है।
1% हिस्सेदारी की कीमत: बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कंपनी अपनी मात्र 1 प्रतिशत हिस्सेदारी भी बाजार में बेचती है, तो उसका मूल्य लगभग 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये होगा। इसके आधार पर टाटा संस का कुल मूल्यांकन लगभग 20 लाख करोड़ रुपये (लगभग 230 बिलियन डॉलर) आंका गया है।
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आगे का रास्ता और कानूनी पेचीदगियां
टाटा संस ने स्पष्ट किया है कि वह लिस्टिंग से जुड़ी अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आरबीआई, टाटा ट्रस्ट्स और अन्य हितधारकों से मार्गदर्शन लेगा। चूंकि लिस्टिंग और चेयरमैन की नियुक्ति दोनों ही फैसलों के लिए एजीएम (AGM) में मंजूरी की आवश्यकता होगी, इसलिए आने वाले दिनों में टाटा ट्रस्ट्स का कानूनी रुख बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यदि टाटा ट्रस्ट्स इस फैसले को अदालत या नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में चुनौती देते हैं, तो टाटा समूह में एक बार फिर से वैसा ही कानूनी घमासान देखने को मिल सकता है जैसा कुछ साल पहले देखने को मिला था।
फिलहाल, बाजार विशेषज्ञों और निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बोर्ड और ट्रस्ट्स मिलकर इस गतिरोध का समाधान कैसे निकालते हैं। रिजर्व बैंक के अपर-लेयर श्रेणी के दिशानिर्देशों के तहत आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) लाने की अनिवार्यता से जुड़ा टाटा संस लिस्टिंग विवाद भारतीय शेयर बाजार और निवेशकों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
समूह द्वारा ऋण चुकाने और होल्डिंग कंपनी का ढांचा बदलने के विकल्पों के बीच टाटा संस लिस्टिंग विवाद न केवल कॉर्पोरेट गवर्नेंस के सिद्धांतों को रेखांकित करता है,
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