व्यापार कूटनीति या संप्रभुता संकट ? ट्रंप के बयान से बढ़ी कूटनीतिक हलचल
व्यापार कूटनीति के ज़रिए भारत-पाक युद्ध रोकने का दावा डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से दोहराया है सार्वजनिक मंच पर। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान अगर युद्ध करते हैं, तो अमेरिका उनके साथ व्यापार नहीं करेगा आगे। यह बयान उन्होंने ओवल ऑफिस में एलोन मस्क के साथ आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया। ट्रंप ने कहा कि उनका कड़ा संदेश ही युद्ध की संभावना को तत्काल टालने में निर्णायक साबित हुआ।
- ट्रंप बोले, “यदि गोलीबारी जारी रहती, तो हम व्यापारिक रिश्ते खत्म कर देते।”
- उन्होंने कहा, “मैंने दोनों प्रधानमंत्रियों को सीधे फोन कर स्थिति स्पष्ट रूप से बताई थी।”
- ट्रंप का दावा है कि दोनों नेताओं ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए संघर्ष से पीछे हटने का निर्णय लिया।
ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के नेताओं की परिपक्वता की सराहना करते हुए उन्हें महान बताया है।
भारत सरकार: कोई मध्यस्थता नहीं, सब कुछ सीधे संवाद से हुआ
सरकार ने कहा कि व्यापार कूटनीति की भूमिका को सिरे से नकारा गया है, यह भारत की स्वतंत्र कूटनीति के खिलाफ है।विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत किसी तीसरे पक्ष की दखल को स्वीकार नहीं करता है। संघर्षविराम भारत और पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों की सीधे संवाद के ज़रिए हुआ, बिना बाहरी हस्तक्षेप के। भारत की नीति है कि सभी सुरक्षा निर्णय पूर्ण रूप से उसकी संप्रभुता और राष्ट्रीय हित के अनुसार लिए जाते हैं।
- DGMO स्तर पर बातचीत के बाद सभी सैन्य गतिविधियों को तत्काल रोकने पर सहमति बनी थी।
- भारत ने साफ किया कि सभी फैसले भारतीय संस्थानों और सैन्य अधिकारियों द्वारा लिए गए हैं।
- विदेश मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि कोई भी तीसरा पक्ष भारत की सुरक्षा नीति तय नहीं कर सकता।
भारत ने स्पष्ट किया कि व्यापारिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण उसकी सुरक्षा और संप्रभुता है।
कांग्रेस का सवाल: मोदी की चुप्पी क्या ट्रंप के दावे को सच मानती है?
प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर कांग्रेस ने गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे ‘सहमति की चुप्पी’ बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि जब ट्रंप बार-बार ऐसा कह रहे हैं, तो प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री की चुप्पी भारत की विदेश नीति को कमजोर कर रही है वैश्विक मंच पर। जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या ट्रंप का दावा सच है या झूठा।
- “21 दिनों में 9 बार ट्रंप ने यही दावा दोहराया है, यह गंभीर कूटनीतिक मुद्दा बन गया है।”
- “क्या प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी इसका संकेत है कि वह ट्रंप की बातों से सहमत हैं?”
- “भारत को अपनी विदेश नीति और कूटनीतिक गरिमा की रक्षा के लिए स्पष्ट बयान देना चाहिए।”
कांग्रेस ने इस मुद्दे को संसद में उठाने और पीएम से जवाब मांगने की चेतावनी दी है।
सऊदी मंच पर भी गूंजा ट्रंप का व्यापारिक संदेश
ट्रंप ने सऊदी अरब-अमेरिका निवेश फोरम 2025 में भी व्यापार कूटनीति का ज़िक्र करते हुए दावा दोहराया था। उन्होंने कहा कि व्यापार एक ऐसा हथियार है जिससे परमाणु युद्ध जैसी स्थितियों को भी रोका जा सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि भविष्य में दोनों देश शांति से मिलकर व्यापार कर सकते हैं और अच्छा डिनर कर सकते हैं। यह बयान उस वक्त आया जब अमेरिका एशिया में अपने आर्थिक प्रभाव को और मजबूत करना चाहता है।
- ट्रंप बोले, “हम उन देशों को समर्थन नहीं दे सकते जो युद्ध के रास्ते पर चल पड़े हों।”
- उन्होंने कहा कि व्यापार से बड़ा कोई प्रोत्साहन नहीं है जो देशों को युद्ध से रोक सके।
- ट्रंप का उद्देश्य भारत-पाक संबंधों को आर्थिक मोर्चे पर जोड़ने का भी प्रतीत हुआ।
उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति के आपसी संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।
ऑपरेशन सिंदूर: अभी भी जारी है भारत की जवाबी रणनीति
भारत ने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ केवल एक बार की जवाबी कार्रवाई नहीं बल्कि एक सतत रक्षा नीति है। जयशंकर ने कहा कि यदि फिर से हमला होता है तो भारत आतंकियों के ठिकानों को फिर निशाना बनाएगा। भारत का रुख साफ है कि पहलगाम जैसे आतंकी हमलों पर चुप नहीं रहा जाएगा, जवाबी कार्रवाई की जाएगी। इस नीति का उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश देना और सीमापार खतरे को निष्क्रिय करना है।
- ऑपरेशन सिंदूर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, अगली कार्रवाई की योजना भी बनाई जा चुकी है।
- भारत ने पाकिस्तान को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि आतंकवाद नहीं रुका, तो कार्रवाई फिर होगी।
- भारत की नीति आत्मरक्षा की है, लेकिन वह जवाब देने में कभी पीछे नहीं हटेगा।
कूटनीति या संप्रभुता?
ट्रंप ने भले ही व्यापार कूटनीति से संघर्ष विराम का दावा किया हो, भारत ने इसे पूरी तरह खारिज किया है। भारत की स्थिति स्पष्ट है—सीधा संवाद और सैन्य संकल्प ही उसका आधार है।
- ट्रंप की भूमिका पर भारत की ओर से कोई पुष्टि नहीं हुई।
- भारत लगातार तीसरे पक्ष को वार्ता से बाहर रखता आया है।
- यह मामला सिर्फ युद्धविराम का नहीं, बल्कि नीति और प्रतिष्ठा का है।



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