अडानी अमेरिकी वारंट विवाद और भारत की संप्रभुता पर मंडराता बड़ा खतरा
अडानी अमेरिकी वारंट विवाद आज देश की संप्रभुता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। कल्पना कीजिए कि यदि अमेरिका, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की तर्ज पर ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ जैसे किसी सैन्य अभियान के जरिए भारतीय धरती से किसी उद्योगपति को उठाकर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश कर दे, तो यह भारत के लिए कितना अपमानजनक होगा।
नवंबर 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और SEC ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और छह अन्य लोगों पर 265 मिलियन डॉलर (लगभग 2,200 करोड़ रुपये) की रिश्वत और धोखाधड़ी के आरोप में पांच काउंट का अभियोग दर्ज किया था।
आरोप है कि 2020 से 2024 के बीच भारतीय सरकारी अधिकारियों को SECI से सौर ऊर्जा अनुबंध हासिल करने के लिए भारी रिश्वत दी गई, जिससे अगले 20 वर्षों में 2 अरब डॉलर से अधिक के मुनाफे की उम्मीद थी। अमेरिकी निवेशकों को गुमराह कर अरबों डॉलर जुटाने के इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
जनवरी 2026: गिरफ्तारी वारंट और भारत सरकार की रहस्यमयी चुप्पी
भले ही नवंबर 2024 में ही गिरफ्तारी वारंट जारी हो गए थे, लेकिन जनवरी 2026 तक भारत सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। अडानी अमेरिकी वारंट विवाद के इस दौर में SEC के समन पहुंचाने की प्रक्रिया भी बेहद सुस्त रही, जो Hague Service Convention के तहत धीमी गति से आगे बढ़ी।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का यह मौन और ढुलमुल रवैया देश को कमजोर दिखा रहा है। न्याय और पारदर्शिता के दावों के बीच, वैश्विक समुदाय यह देख रहा है कि कैसे एक गंभीर न्यायिक प्रक्रिया को नौकरशाही की जटिलताओं में उलझाया जा रहा है।
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मादुरो केस का खौफनाक उदाहरण और ट्रंप की आक्रामक नीति
निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी का वाकया इस पूरे प्रकरण को और भी भयावह बना देता है। जनवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन ने काराकास पर हवाई हमलों के साथ छापा मारकर मादुरो और उनकी पत्नी को जबरन USS Iwo Jima पर सवार किया और अमेरिका ले गए। उन पर नारको-टेररिज्म और ड्रग ट्रैफिकिंग के आरोप थे।
हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन था, लेकिन अमेरिका ने इसे “नशीले पदार्थों के खिलाफ युद्ध” का नाम देकर जायज ठहराया।
अडानी अमेरिकी वारंट विवाद में यदि Foreign Corrupt Practices Act (FCPA) के तहत ऐसी ही कोई कार्रवाई होती है, तो मोदी सरकार के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। क्या भारत अपनी सेना तैनात कर अडानी की रक्षा करेगा या सिर्फ कूटनीतिक विरोध दर्ज कराकर खामोश बैठ जाएगा?
कूटनीतिक टालमटोल और वैश्विक स्तर पर गिरता व्यापारिक ग्राफ
मोदी सरकार का रवैया इस पूरे मामले में अब तक पूर्ण टालमटोल और मौन का रहा है। फरवरी 2025 में ट्रंप से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इन आरोपों को “निजी मामला” बताकर किनारे कर दिया था। जून 2025 तक SEC के कई अनुरोधों के बावजूद समन की तामील नहीं हुई, जिसे कुछ रिपोर्ट्स में “राष्ट्रीय हित” का हवाला देकर टाला गया।
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी साम्राज्य को तगड़े झटके लगे। केन्या ने 2.5 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स रद्द कर दिए, श्रीलंका ने जनवरी 2025 में पावर डील्स की समीक्षा शुरू की और बांग्लादेश ने गोड्डा पावर प्लांट के टैरिफ पर विवाद खड़ा कर दिया। यह साफ है कि अमेरिकी इंडिक्टमेंट ने अडानी के ग्लोबल फुटप्रिंट्स को हिलाकर रख दिया है।
LIC का विवादास्पद बेलआउट: सार्वजनिक धन पर उठा जोखिम
भारत के भीतर, अडानी अमेरिकी वारंट विवाद के बावजूद सरकारी तंत्र उन्हें बचाने में जुटा रहा। मई 2025 में LIC ने 3.9 बिलियन डॉलर (लगभग 33,000 करोड़ रुपये) का एक विशाल “बेलआउट” प्लान चलाया। वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के आंतरिक दस्तावेजों से पता चलता है कि अडानी बॉन्ड्स में यह निवेश केवल “निवेशक विश्वास” बढ़ाने के लिए किया गया था।
LIC ने 30 करोड़ पॉलिसीधारकों की गाढ़ी कमाई का इस्तेमाल करते हुए अडानी पोर्ट्स के 585 मिलियन डॉलर के बॉन्ड को सब्सक्राइब किया। दिसंबर 2025 तक LIC का कुल निवेश 48,284 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो आर्थिक निर्भरता के खतरों को उजागर करता है।
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राष्ट्रवाद बनाम कानून: मोदी सरकार के सामने कठिन राह
आने वाले समय में मोदी सरकार की प्रतिक्रिया राष्ट्रवादी बयानबाजी और मीडिया मैनेजमेंट का मिश्रण हो सकती है। सरकार प्रत्यर्पण संधि की पेचीदगियों का हवाला दे सकती है और इन आरोपों को “भारत की प्रगति पर हमला” या “पश्चिमी ईर्ष्या” करार दे सकती है।
लेकिन सच्चाई यह है कि अमेरिकी न्याय विभाग के पास “Numero Uno” और “The Big Man” जैसे कोडनेम वाले पुख्ता सबूत और डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं। अडानी भले ही इन आरोपों को “बेबुनियाद” कहें, लेकिन यदि अमेरिका ने कोई सख्त कदम उठाया, तो भारत को व्यापार युद्ध या कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
क्रॉनी कैपिटलिज्म और विकसित भारत के सपने पर चोट
यह प्रकरण अब केवल एक उद्योगपति का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह मोदी के भारत का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट है। अमेरिकी इंडिक्टमेंट ने वैश्विक मंच पर भारत में “क्रॉनी कैपिटलिज्म” की जड़ों को नंगा कर दिया है।
यह एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है जहाँ कानून के ऊपर चंद उद्योगपतियों का हित सर्वोपरि है। अगर अमेरिका अपनी कार्रवाई में सफल होता है, तो “विकसित भारत” की अंतरराष्ट्रीय छवि चकनाचूर हो जाएगी। यह दिखाएगा कि हमारी आर्थिक नींव कितनी नाजुक और बाहरी प्रभाव के प्रति संवेदनशील है।
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जवाबदेही का समय: जनता का भरोसा और संप्रभुता की रक्षा
अंततः, सरकार की चुप्पी ने जनता के बीच गहरे संदेह पैदा कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर इसे “सांठगांठ” करार दिया जा रहा है। अब समय आ गया है कि सरकार स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करे और सार्वजनिक धन (LIC) की सुरक्षा के लिए जवाबदेही तय करे।
यदि संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता की रक्षा नहीं की गई, तो इसकी भारी कीमत आम नागरिकों को चुकानी होगी। क्रॉनी कैपिटलिज्म का यह खेल देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है, जिसका समाधान केवल पारदर्शिता और कठोर न्याय से ही संभव है।
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