पवार-अडानी का पुराना रिश्ता: राहुल गांधी के विरोध और गठबंधन की मजबूरी
पवार-अडानी का पुराना रिश्ता भारतीय राजनीति की एक ऐसी पहेली है जो वर्तमान दौर में गहरे विरोधाभासों से भरी हुई है। एक तरफ जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी गौतम अडानी को देश की संपत्तियों का दुश्मन बताते हुए मोदी सरकार पर तीखे हमले कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इंडिया गठबंधन के सबसे अनुभवी साथी शरद पवार स्वयं को अडानी का “मेंटर” यानी मार्गदर्शक मानते हैं।
यह विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब उनकी बेटी और सांसद सुप्रिया सुले सार्वजनिक रूप से गौतम अडानी को “बड़े भाई” जैसा संबोधित करती हैं। राजनीति के इस मंच पर जहां विचारधारा की लड़ाई की बात होती है, वहां यह व्यक्तिगत समीकरण कई सवाल खड़े करते हैं।
बारामती का एआई सेंटर और 30 साल की मित्रता का प्रमाण
हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। बारामती में ‘शरदचंद्र पवार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ का उद्घाटन एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में उभरा। इस अवसर पर गौतम अडानी ने खुद स्वीकार किया कि शरद पवार पिछले तीन दशकों से उनके मार्गदर्शक रहे हैं।
वहीं, सुप्रिया सुले ने स्पष्ट किया कि उनके परिवार और अडानी परिवार के बीच 30 साल पुरानी गहरी दोस्ती है। यह रिश्ता सिर्फ औपचारिक नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर इतना परिपक्व हो चुका है कि यह आज इंडिया गठबंधन की वैचारिक एकजुटता पर बड़े सवालिया निशान लगा रहा है।
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किंगमेकर और व्यवसायी: दो दशकों से अधिक का गहरा सफर
पवार और अडानी के बीच पवार-अडानी का पुराना रिश्ता दो दशकों से भी अधिक पुराना है। यह उस दौर की बात है जब गौतम अडानी एक उभरते हुए व्यवसायी थे और शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के निर्विवाद ‘किंगमेकर’ हुआ करते थे। अडानी ने कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से पवार की बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और उनके अथाह ज्ञान की प्रशंसा की है।
जवाब में, पवार ने भी अडानी की व्यावसायिक यात्रा को देश के युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बताया है। यह जुगलबंदी केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की कई बड़ी परियोजनाओं में अडानी की भागीदारी को अक्सर पवार के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है।
धारावी पुनर्विकास और राहुल गांधी के आरोपों पर पवार का रुख
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आता है जब हम धारावी पुनर्विकास परियोजना की बात करते हैं। राहुल गांधी इस प्रोजेक्ट को “अडानी-मोदी नेक्सस” का सबसे बड़ा प्रतीक बताते हैं और आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री देश की संस्थाओं को नष्ट कर राष्ट्रीय संपत्तियां अडानी को सौंप रहे हैं।
हालांकि, शरद पवार ने इन आरोपों को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए इसे पूरी तरह असंबंधित बताया है। पवार का यहाँ तक कहना है कि अडानी को इस प्रोजेक्ट में शुरू में कोई विशेष रुचि भी नहीं थी। यह बयान सीधे तौर पर राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर करता है जिसमें वे मोदी सरकार पर अडानी के लिए काम करने का दोष मढ़ते हैं।
सुप्रिया सुले का ‘बड़ा भाई’ संबोधन और पारिवारिक निकटता
राजनीतिक गलियारों में सुप्रिया सुले द्वारा अडानी को “बड़े भाई” कहना महज एक संबोधन नहीं, बल्कि उस पारिवारिक निकटता का प्रतीक है जिसने विपक्ष की रणनीति को उलझा दिया है। यह बयान ऐसे समय में आया जब बारामती में एआई सेंटर के उद्घाटन के दौरान शरद पवार और अजीत पवार, दोनों धड़ों ने एक साथ मंच साझा किया।
इस घटना ने न केवल एनसीपी के पुनर्मिलन की अफवाहों को जन्म दिया, बल्कि अजीत पवार द्वारा स्थानीय चुनावों के लिए शरद पवार गुट के साथ गठबंधन की घोषणा ने इसे और पुख्ता किया। लेकिन सवाल वही है कि यह पारिवारिक एकजुटता जनता के हित में है या केवल सत्ता बचाने का एक और खेल?
इंडिया गठबंधन के भीतर वैचारिक विरोधाभास और विश्वसनीयता
इंडिया गठबंधन में शरद पवार की एनसीपी (एसपी) एक मुख्य स्तंभ है, लेकिन पवार-अडानी का पुराना रिश्ता गठबंधन के आंतरिक विरोधाभासों को उजागर कर रहा है। राहुल गांधी अपने हर भाषण में “दो भारत” की बात करते हैं—एक तरफ अडानी-अंबानी और दूसरी तरफ आम जनता।
लेकिन जब उनके प्रमुख सहयोगी ही अडानी को अपना “मेंटर” बता रहे हों, तो गठबंधन की विश्वसनीयता पर आंच आना स्वाभाविक है। सोशल मीडिया (एक्स) पर चल रही चर्चाओं की मानें तो यह संबंध राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा भी हो सकता है, जहां पवार परिवार की एकता और अडानी की व्यापारिक परियोजनाएं कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
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संस्थाओं के विनाश का आरोप और एमवीए सरकार की भूमिका
नरेंद्र मोदी पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वे अडानी के लिए देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को “तहस-नहस” कर रहे हैं। मगर पवार के पुराने बयानों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि अडानी की कई परियोजनाएं वास्तव में महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार के कार्यकाल के दौरान ही तय की गई थीं।
2019 में महाराष्ट्र सरकार गिराने की पटकथा में अडानी की भूमिका को लेकर भी विवाद रहे हैं, लेकिन पवार स्वयं कहते हैं कि अडानी किसी भी राजनीतिक बैठक का हिस्सा नहीं थे। यह तथ्य दर्शाता है कि अडानी का प्रभाव सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों पर समान रूप से बना हुआ है, जिसे सोशल मीडिया पर लोग “पावर ब्रोकरों का खेल” कह रहे हैं।
राहुल गांधी के संघर्ष के सामने सहयोगियों की चुनौती
अंततः सवाल राहुल गांधी की रणनीति पर आकर टिकता है। क्या वे देश को “अंबानी-अडानी” से बचाने के अपने मिशन में पवार जैसे दिग्गजों से टकराव मोल लेंगे? या फिर वे इस विरोधाभास को नजरअंदाज करना पसंद करेंगे? क्योंकि पवार-अडानी का पुराना रिश्ता यह साबित करता है कि राजनीति में व्यक्तिगत संबंध अक्सर वैचारिक सीमाओं को लांघ जाते हैं।
राहुल का संघर्ष सराहनीय हो सकता है, लेकिन जब उनके अपने ही साथी अडानी के मेंटर और प्रशंसक हों, तो यह लड़ाई और भी अधिक कठिन हो जाती है। यह भारतीय राजनीति की उस प्रकृति को उजागर करता है जहां पर्दे के सामने जनता के लिए युद्ध होता है, लेकिन पर्दे के पीछे पूंजीपतियों के साथ अटूट रिश्ते बने रहते हैं।
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