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अमेरिकी कोर्ट में पाँचवीं बार टला अडानी, समन, भारत केस: न्याय का मज़ाक

अडानी समन भारत

अडानी, समन, भारत मामले में अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) की यह स्टेटस रिपोर्ट अब शर्मनाक और चौंकाने वाला तमाशा बन चुकी है।

आठ महीनों में पांचवीं बार फाइल की गई इस रिपोर्ट में न्याय की प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाने का स्पष्ट संकेत मिलता है। 12 दिसंबर 2025 को मजिस्ट्रेट जज जेम्स आर. चो को सौंपी गई इस दो पेज की रिपोर्ट में SEC के वकील क्रिस्टोफर एम. कोलोराडो ने बताया कि भारत के कानून और न्याय मंत्रालय ने अभी तक गौतम अडानी और सागर अडानी को समन नहीं सौंपे हैं।

यह देरी कोई तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से सत्ता के करीबी उद्योगपति को संरक्षण देने की रणनीति लगती है। हेग कन्वेंशन के तहत समन सर्व करने की प्रक्रिया फरवरी 2025 से शुरू हुई थी, लेकिन एक साल बीतने के बावजूद कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।

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बार-बार दोहराया जा रहा एक ही बहाना

SEC ने पहले भी अप्रैल, जून, अगस्त और अक्टूबर 2025 में इसी मामले पर स्टेटस रिपोर्ट दी थी, और हर बार वही एक बहाना दोहराया गया: “कोई ठोस प्रगति नहीं”।

एक साल से ज्यादा हो चुका है जब नवंबर 2024 में SEC ने गौतम अडानी, सागर अडानी और अन्य पर सिविल चार्जेस लगाए थे, जिसमें सैकड़ों मिलियन डॉलर की रिश्वतखोरी का बेहद गंभीर आरोप शामिल है। मामला अमेरिकी कोर्ट में दर्ज है, लेकिन भारतीय अधिकारियों की यह सुस्ती सवाल खड़े करती है।

हेग सर्विस कन्वेंशन के आर्टिकल 5(a) के तहत भारत के कानून मंत्रालय को समन सौंपने की जिम्मेदारी दी गई थी। मंत्रालय ने इसे आगे अहमदाबाद की लोकल कोर्ट को फॉरवर्ड करने के अलावा कोई कार्यवाही नहीं की।

SEC बार-बार संपर्क कर रही है, लेकिन जवाब में सिर्फ खामोशी या जानबूझकर की गई देरी मिल रही है।

संरक्षण की रणनीति या सोवरिन्टी की आड़?

भारत ने हेग कन्वेंशन में रिजर्वेशन रखे हैं कि डायरेक्ट सर्विस नहीं हो सकती, सब कुछ मंत्रालय के जरिए ही होगा, और अगर उसे सोवरिन्टी (संप्रभुता) को खतरा लगे तो वह समन को रिजेक्ट भी कर सकता है।

क्या यही वजह है इस सुस्ती की? आलोचक इसे कोई संयोग नहीं, बल्कि सत्ता और पूंजी के गठजोड़ को उजागर करने वाली एक सुनियोजित रणनीति मानते हैं।

मार्च 2025 में मंत्रालय ने समन अहमदाबाद कोर्ट को भेजा, लेकिन उसके बाद कोई एक्शन नहीं लिया गया, जो संरक्षण का स्पष्ट सबूत है।

आम नागरिकों पर केस होते ही समन तुरंत पहुंच जाते हैं, लेकिन एक अरबपति के लिए डेढ़ साल बीतने को हैं। हेग कन्वेंशन के तहत सामान्यतः 6-8 महीने लगते हैं, पर अडानी, समन, भारत केस में देरी हास्यास्पद स्तर तक पहुँच चुकी है।

गौतम अडानी पर लगे गंभीर आरोप: $250 मिलियन की रिश्वतखोरी

गौतम अडानी पर आरोप बेहद गंभीर हैं। आरोप है कि उन्होंने $250 मिलियन से ज्यादा की रिश्वत देकर सोलर एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल किए।

इसके अलावा, अमेरिकी निवेशकों को धोखा देने और अडानी ग्रीन एनर्जी के जरिए $175 मिलियन से ज्यादा फंड्स जुटाते समय एंटी-करप्शन पॉलिसी के बारे में झूठे बयान देने का भी आरोप है।

ये रिश्वतें भारतीय अधिकारियों को दी गईं ताकि ऊंचे रेट पर बिजली खरीदी जाए, जिससे अडानी ग्रुप को $2 बिलियन डॉलर से ज्यादा का फायदा हुआ। इन आरोपों की गंभीरता के बावजूद, भारत सरकार का कानून मंत्रालय क्यों इतना सुस्त है?

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मोदी सरकार की दोस्ती और क्रोनी कैपिटलिज्म

कई विश्लेषक इस देरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति गौतम अडानी की उस करीबी दोस्ती का नतीजा मानते हैं, जो कथित तौर पर अडानी को हर संकट से बचाती आई है।

यह मामला न केवल रिश्वतखोरी का है, बल्कि संस्थागत संरक्षण और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की विफलता का भी है, जो भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। यह पांचवीं रिपोर्ट (अप्रैल 23, जून 27, अगस्त 11, अक्टूबर 13 और दिसंबर 12, 2025) यह दर्शाती है कि न्याय को नहीं, बल्कि शक्ति के दुरुपयोग और क्रोनी कैपिटलिज्म को उजागर किया जा रहा है।

SEC ने डायरेक्टली अडानी और उनके वकीलों को नोटिस भेजे, वेवर ऑफ सर्विस मांगा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। कोलोराडो ने साफ लिखा कि “पिरियोडिक संपर्क” के बावजूद मंत्रालय ने सर्विस इफेक्ट नहीं की है।

अंतरराष्ट्रीय छवि पर गहरा कलंक

भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर यह घटना एक गहरा कलंक है। हेग कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन न करना दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत में कानून अमीरों और सत्ता के करीबियों के लिए अलग चलता है।

SEC का केस सिविल है, लेकिन पैरलल DOJ (डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस) का क्रिमिनल इंडिक्टमेंट भी है, जो अब एक ही जज निकोलस गारौफिस के पास है।

अडानी, समन, भारत मामले में भारत सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ देरी की गई। यह न सिर्फ न्याय में बाधा है, बल्कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स के भरोसे को भी तोड़ता है।

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बचाव की आड़ में समय खींचने की कोशिश

अडानी ग्रुप ने आरोपों को बार-बार “बेबुनियाद” बताया है, कहा है कि वे सभी लीगल रेकॉर्स का इस्तेमाल करेंगे, और यह भी दावा किया है कि एक इंडिपेंडेंट रिव्यू कराया गया जहाँ कोई अनियमितता नहीं मिली।

लेकिन अगर वे सच में निर्दोष हैं, तो समन स्वीकार करके अमेरिकी कोर्ट में कानूनी लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? लगातार देरी से तो यही लगता है कि समय खींचकर सबूत कमजोर करने या राजनीतिक प्रेशर का इंतजार किया जा रहा है।

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मोदी जी की दुविधा और अंतिम परीक्षा

यह मामला भारत की न्याय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की असली परीक्षा है, और फिलहाल भारतीय पक्ष फेल होते दिख रहा है। अमेरिकी कोर्ट को बार-बार अपडेट देना पड़ रहा है, जबकि भारतीय अधिकारी चुप हैं।

SEC की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जब तक भारत सरकार सक्रिय रूप से सहयोग नहीं करती, यह केस लटका रहेगा। हेग कन्वेंशन के आर्टिकल 15 के तहत अमेरिकी कोर्ट डिफॉल्ट जजमेंट भी दे सकता है अगर देरी ज्यादा हो। जनता सवाल पूछ रही है, आखिर अडानी इतने खास क्यों हैं कि कानून उनके लिए रुक जाए?

अंतिम पेंच यह है कि इसी बीच अमेरिका में एक और बड़ा घटनाक्रम हुआ है। SEX ट्रैफिकर “जेफरी एपस्टीन” की फाइल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का नाम आने की बात सामने आ रही है!

इस कठिन परिस्थिति में सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि मोदी जी खुद की साख बचाएँ या मित्र को बचाएँ? यह एक जटिल राजनीतिक एवं कानूनी जाल है जिसका परिणाम जल्द ही सामने आएगा।

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