गुजरात में अघोषित इमरजेंसी: हाईकोर्ट का धारा 144 पर बड़ा फैसला
गुजरात में अघोषित इमरजेंसी गुजरात हाईकोर्ट का हालिया फैसला न सिर्फ एक कानूनी झटका है, बल्कि लोकतंत्र की धमनियों में दौड़ते डर का आईना भी है। जब अदालत पूछती है कि “क्या गुजरात में स्थायी इमर्जेंसी लागू है?”, तो ये सवाल सिर्फ सेक्शन 144 की बर्बादी पर नहीं, बल्कि मोदी-शाह सरकार की उस मानसिकता पर चोट करता है जो विरोध को ही खतरा मानती है।
2016 से 2019 तक अहमदाबाद पुलिस ने एक के बाद एक नोटिफिकेशन जारी कर दिए, बिना किसी ठोस कारण के, बिना किसी पारदर्शिता के, जैसे कि धारा 144 कोई चाय की थैली हो जिसे दोबारा-दोबारा इस्तेमाल किया जाए।
ये नहीं है कानून का पालन, ये है कानून को ही कुचलने जैसा है, जहां शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए आपातकालीन प्रावधान को स्थायी जंजीर बना दिया गया।
अदालत ने साफ कहा: ये प्रावधान “उभरती स्थितियों” के लिए है, न कि “स्थायी या अर्ध-स्थायी” दमन के लिए। लेकिन गुजरात सरकार ने इसे आदत बना लिया, क्योंकि असली खतरा राज्य के लिए किसान की पुकार या CAA के खिलाफ आवाज नहीं, बल्कि सत्ता की चमक पर पड़ने वाली छाया है।
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विकास पुरुष या डर के सौदागर?
मोदी-शाह की जोड़ी, जो खुद को विकास पुरुष बताती है, वास्तव में डर के सौदागर साबित हो रही है। 2019 के CAA विरोध में प्रोफेसरों, बिजनेसमैन और आम नागरिकों पर FIR दर्ज हुईं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने चार से ज्यादा लोगों के साथ इकट्ठा होकर असहमति जताई।
अदालत ने इन नोटिफिकेशनों को “मनमाना, अनुचित और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन” करार दिया, और सही कहा “क्योंकि जब पुलिस बिना कारण बताए, बिना सोशल मीडिया पर सूचना दिए, सिर्फ गजेट में छापकर आदेश जारी करती है, तो ये लोकतंत्र नहीं, राजशाही का नमूना है।
” राजदीप सरदेसाई की तरह कई पत्रकारों ने 2025 में खुलासा किया कि गुजरात के 33 जिलों में 2015 से लगातार सेक्शन 144 लगा हुआ है, दस साल का “अघोषित इमर्जेंसी”।
पाटीदार आंदोलन से शुरू होकर CAA तक, हर विरोध को कुचलने के लिए ये हथियार चले। लेकिन सरकार का तर्क? “कानून-व्यवस्था”।
हास्यास्पद! अगर हर असहमति कानून-व्यवस्था का खतरा है, तो लोकतंत्र का क्या मतलब बचा? ये जोड़ी, जो राष्ट्रीय स्तर पर “विकास” का ढोल पीटती है, गुजरात में तो अभिव्यक्ति की आजादी को ही कैद कर देती है।
न्यायालय की तीखी टिप्पणी: शक्तियों का ‘यांत्रिक’ दुरुपयोग
अदालत की टिप्पणी तीखी है, लेकिन सच्ची: “धारा 144 की शक्तियां असाधारण हैं, इन्हें तत्काल रोकथाम या त्वरित उपाय के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।” फिर भी, अहमदाबाद पुलिस ने इसे “यांत्रिक” तरीके से जारी किया, बिना किसी खतरे की जानकारी के, बिना किसी कम विकल्प की कोशिश के।
ये सिर्फ CAA विरोधियों पर नहीं, बल्कि हर उस नागरिक पर हमला है जो सड़क पर उतरकर सरकार से सवाल पूछना चाहता है। गुजरात मॉडल का सच यही है, उच्च विकास दरें, लेकिन निचले स्तर पर दमन की दरें। जब न्यायमूर्ति एम.आर. मेंगड़े कहते हैं कि “नोटिफिकेशनों में कोई ऐसी स्थिति का उल्लेख नहीं जो आपातकाल की मांग करती”, तो ये सरकार की नाकामी का प्रमाण-पत्र है।
सोशल मीडिया के दौर में गजेट नोटिस काफी नहीं, अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसे आदेशों को व्यापक प्रचारित किया जाए। लेकिन क्या होगा? सरकार तो पहले ही IT सेल के जरिए ट्रोल आर्मी खड़ी कर चुकी है, जो असहमति को “राष्ट्र-विरोधी” ठहराती है। यह सच है कि गुजरात में अघोषित इमरजेंसी चल रही है।
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संवैधानिक हत्या: मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
ये स्थायी सेक्शन 144 सिर्फ कानूनी उल्लंघन नहीं, संवैधानिक हत्या है। अनुच्छेद $19(1)(b)$ और $(c)$ के तहत शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति का अधिकार मौलिक है, लेकिन गुजरात में ये “अनुमति-आधारित” हो गया है, और वो भी पुलिस की मर्जी पर।
2012 से ही, जैसा कि पूर्व पुलिस अधिकारी गोपाल इटालिया ने बताया, ये आदेश छह-छह महीने के अंतराल से जारी हो रहे हैं, लेकिन असली इरादा विरोध रोकना है। CAA जैसे विवादास्पद कानूनों के खिलाफ आवाज दबाने के लिए ये हथकंडा परफेक्ट रहा। लेकिन अब अदालत ने चेतावनी दी: “कम से कम प्रतिबंध लगाएं, और वो भी सिर्फ तब जब अन्य उपाय नाकाफी हों।”
मोदी सरकार, जो इंदिरा गांधी के इमर्जेंसी को कोसती है, खुद उसी की नकल कर रही है, बस नाम बदलकर “अघोषित”। जावेद सिरकर जैसे पूर्व IAS ने सही कहा: ये इंदिरा की इमर्जेंसी से भी बदतर है, क्योंकि ये चुपचाप, नोटिफिकेशनों के जंगल में छिपा हुआ है। गुजरात के लोग, जो “विकास” के नाम पर वोट देते हैं, कब जागेंगे?
राजनीतिक निहितार्थ: दमन मॉडल की राष्ट्रीय चेतावनी
इसके पीछे राजनीतिक निहितार्थ गहरा है: ये फैसला सिर्फ अहमदाबाद तक सीमित नहीं, पूरे देश के लिए चेतावनी है। जब केंद्र की सरकार राज्य स्तर पर दमन को बढ़ावा देती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर क्या उम्मीद? CAA विरोध में IIM अहमदाबाद के प्रोफेसर जैसे बुद्धिजीवी FIR का शिकार हुए, क्योंकि उन्होंने चार लोगों से ज्यादा के साथ विरोध जताया।
अदालत ने FIR रद्द कर दीं, लेकिन नुकसान किसका? वर्षों का डर, मुकदमों का बोझ। मोदी-शाह की “गुजरात मॉडल” अब “दमन मॉडल” बन चुकी है, जहां विरोधी को “अराजक” ठहराकर चुप करा दिया जाता है।
X पर ट्रेंडिंग पोस्ट्स दिखाते हैं कि विपक्षी नेता इसे “गुजरात में अघोषित इमरजेंसी” कह रहे हैं, और सही कह रहे हैं। अगर गुजरात, जो BJP का गढ़ है, में ये हो रहा है, तो बाकी राज्यों का क्या हाल होगा? ये सत्ता का केंद्रीकरण नहीं, लोकतंत्र का क्षय है।
डिजिटल युग की मांग और सरकार की मनमानी
अदालत ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया: सेक्शन 144 जैसे आदेशों को सोशल मीडिया पर प्रचारित करें, क्योंकि गजेट में छापना आम आदमी तक पहुंच ही नहीं पाता। ये डिजिटल युग की मांग है, लेकिन गुजरात सरकार के लिए ये चुनौती भी, क्योंकि सोशल मीडिया पर तो असहमति की बाढ़ आ जाती है।
पुलिस ने कारण दर्ज नहीं किए, खतरे का आकलन नहीं किया, सिर्फ आदेश जारी कर दिए। ये “यांत्रिक” दुरुपयोग है, जैसा अदालत ने कहा। लेकिन सवाल ये कि क्या सरकार सुनेगी?
या फिर अगला नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा, किसी नए बहाने से? विब्स ऑफ इंडिया और द वायर जैसे मीडिया ने इसे “लोकतंत्र की बहाली” कहा, लेकिन हकीकत में ये सिर्फ एक झलक है उस सड़न की, जो सत्ता के गलियारों में फैली है।
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सवालिया निशान: क्या सरकार अदालत की सुनेगी?
नागरिकों को विरोध का अधिकार है, और अदालत ने उसे पुनर्स्थापित किया, लेकिन बिना सतर्कता के, ये फिर दब जाएगा। पुलिस ने कारण दर्ज नहीं किए, खतरे का आकलन नहीं किया, सिर्फ आदेश जारी कर दिए।
अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसे आदेशों को व्यापक प्रचारित किया जाए, लेकिन क्या सरकार सुनेगी? यह सवाल आज भी बरकरार है, क्योंकि सत्ता की चमक पर पड़ने वाली छाया को खतरा मानकर दमन जारी रखा जा सकता है।
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भविष्य की राह
अंत में, ये फैसला उम्मीद की किरण है, लेकिन तीखा सबक भी: सत्ता अगर डर से चलती है, तो लोकतंत्र मर जाता है। गुजरात हाईकोर्ट ने न सिर्फ नोटिफिकेशनों को रद्द किया, बल्कि सरकार को आईना दिखाया, कि आपातकालीन शक्तियां स्थायी नहीं हो सकतीं।
मोदी-शाह सरकार को अब फैसला करना है: क्या वो “विकास” का मॉडल अपनाएगी, या दमन का? अगर इतिहास से सीखना है, तो इंदिरा का इमर्जेंसी 1977 में उलट गया।
गुजरात में अघोषित इमरजेंसी का ये “अघोषित” संस्करण भी उलटेगा, नागरिक जागें, विपक्ष लड़े, और अदालतें सतर्क रहें, वरना, सेक्शन 144 न सिर्फ सड़कों पर, बल्कि संविधान की आत्मा पर भी लग जाएगा। यह समय चुप्पी का नहीं बल्कि सवालों का है।



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