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एआई और नौकरियों का संकट: क्या रोबोट छीन लेंगे आपका रोज़गार?

एआई और नौकरियों संकट

एआई और नौकरियों संकट दिल्ली में 16-20 फरवरी 2026 तक आयोजित “India AI Impact Summit” ने वैश्विक AI गवर्नेंस को एक नया आयाम देने का दावा किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की तर्ज पर “Sarvajana Hitaya, Sarvajana Sukhaya” के नारे के साथ पेश किया।

यह ग्लोबल साउथ की पहली बड़ी AI सभा थी, जहां 86 देशों ने ‘Delhi Declaration’ पर हस्ताक्षर किए। इसमें अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और कनाडा जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हुए, जिसकी संख्या पिछले सम्मेलनों से कहीं अधिक है। हालाँकि, यह डिप्लोमैटिक सफलता जितनी भव्य दिखी, उतनी ही इसमें कमियां और अधूरे वादे भी उजागर हुए।

घोषणापत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें तो की गईं, लेकिन वे ज्यादातर स्वैच्छिक रह गईं। इस बीच, एआई और नौकरियों का संकट सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा, क्योंकि फ्रंटियर AI जोखिमों पर कोई सख्त नियंत्रण या बाध्यकारी नियम तय नहीं किए गए।

बिल गेट्स का विवाद और नैतिकता पर उठते गंभीर सवाल

समिट की सबसे विवादास्पद घटना बिल गेट्स का आखिरी समय पर अपना कीनोट रद्द करना रही। एपस्टीन (Epstein) फाइल्स की नई रिलीज ने गेट्स फाउंडेशन और जेफरी एपस्टीन के पुराने संबंधों को फिर से हवा दे दी। हालांकि गेट्स भारत आए थे और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी मिले, लेकिन अपनी स्पीच से ठीक पहले उन्होंने हाथ पीछे खींच लिए।

फाउंडेशन ने अंकुर वोरा को उनकी जगह भेजा। यह घटना AI गवर्नेंस की नैतिकता पर गहरा सवाल उठाती है। जो लोग प्राइवेसी और एथिकल AI की वकालत करते हैं, जब वे खुद ऐसे विवादास्पद कनेक्शन्स से घिरे होते हैं, तो समिट जैसे मंचों पर नैतिकता की बातें पाखंडपूर्ण लगने लगती हैं।

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सैम ऑल्टमैन की चेतावनी: नौकरियों पर मंडराता असली खतरा

समिट में OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि एआई और नौकरियों का संकट वास्तविक है और यह जॉब मार्केट को “निश्चित रूप से प्रभावित” करेगा। ऑल्टमैन के अनुसार, रिपिटिटिव और डेटा-ड्रिवन रोल्स वाले जॉब्स सबसे पहले डिसरप्ट होंगे।

हालांकि उन्होंने ऐतिहासिक पैटर्न का हवाला देते हुए भरोसा दिलाया कि “हम हमेशा कुछ नया ढूंढ लेते हैं,” लेकिन उन्होंने “AI Washing” जैसी टर्म का भी जिक्र किया, जहां कंपनियां AI का बहाना बनाकर पहले से तय छंटनी (Layoffs) करती हैं। भारत जैसे देश के लिए, जहां 50 करोड़ से अधिक युवा वर्कफोर्स है, यह विस्थापन अगले कुछ सालों में एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

अधूरे वादे और निवेश के आंकड़ों के पीछे की कहानी

नौकरियों के खतरे को कम करने के लिए ‘Reskilling’ और ‘Workforce Development’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल किया गया। रिलायंस और अडानी ने $210 बिलियन से ज्यादा के AI इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का ऐलान किया है, वहीं OpenAI ने टाटा और एंथ्रोपिक ने इंफोसिस के साथ साझेदारी की है।

लेकिन आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा बताए गए $250 बिलियन के निवेश कमिटमेंट्स ज्यादातर निजी क्षेत्रों से हैं। ग्राउंड लेवल पर कोई ऐसा $100-250 बिलियन का ग्लोबल फंड या मास रिस्किलिंग प्लान नहीं दिखा जो एआई और नौकरियों का संकट झेल रहे युवाओं को सुरक्षा दे सके। बिना किसी ठोस सरकारी एक्शन के, यह ‘एआई फॉर ऑल’ का नारा महज ‘एआई फॉर एलीट्स’ बनकर रह सकता है।

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प्राइवेसी और प्रोग्रेस: चर्चाएं खोखली या विडंबनापूर्ण?

समिट में “Trusted AI Commons” और “Safe and Trusted AI” जैसे तीन सूत्र घोषित किए गए। लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों ने इसे सरकारों और टेक कंपनियों की खतरनाक आदतों पर लगाम न लगाने वाला बताया। विडंबना यह है कि भारत खुद आधार और DPI जैसे टूल्स का उपयोग करता है, जहां प्राइवेसी पर सवाल उठते रहे हैं।

अब AI के साथ मास सर्विलांस का खतरा और बढ़ सकता है। दिल्ली डिक्लेरेशन में मानवता के साथ लाभ साझा करने की बात तो है, लेकिन फ्रंटियर AI के रिस्क असेसमेंट के लिए कोई बाइंडिंग मैकेनिज्म नहीं है। भारत ने अमेरिकी दबाव के आगे “No Global Governance” के स्टैंड को भी मौन रूप से स्वीकार कर लिया है।

पॉक्स सिलिका और चीन विरोधी सप्लाई चेन की राजनीति

यह समिट टेक पॉलिसी से ज्यादा जियोपॉलिटिक्स का मंच साबित हुई। मोदी सरकार का “डिज़ाइन एंड डेवलप इन इंडिया” का नारा ‘Pax Silica’ (US-India AI Coalition) के साथ मिलकर चीन-विरोधी सप्लाई चेन पर ज्यादा केंद्रित दिखा। ग्लोबल साउथ के लिए $3 बिलियन फंड की बातें भी हुईं, लेकिन उनकी वास्तविकता पर संदेह है।

यूरोप रेगुलेशन चाहता है, अमेरिका इनोवेशन और चीन अपना मॉडल थोपना चाहता है। इस खींचतान में भारत खुद को ब्रिज बनाने की कोशिश में फंसा नजर आया। असल पावर डायनामिक्स अब भी वाशिंगटन और बीजिंग के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि एआई और नौकरियों का संकट आम आदमी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

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घरेलू राजनीति और युवाओं का सड़क पर विरोध

AI अब केवल पॉलिसी का मुद्दा नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति का हॉट इश्यू बन चुका है। युवा कांग्रेसियों का ‘शर्टलेस’ प्रदर्शन यह दिखाता है कि युवा वोटर्स AI के कारण होने वाली बेरोजगारी से डरे हुए हैं। बीजेपी और कांग्रेस के बीच यह जुबानी जंग अब टेक पॉलिसी से हटकर वोट बैंक की ओर मुड़ गई है।

यदि भारत अपने सॉवरेन AI मॉडल्स और ‘BharatGen’ जैसी पहलों में तेजी नहीं दिखाता, तो ग्लोबल साउथ की लीडरशिप का दावा खोखला साबित होगा। युवाओं को फोटो-ऑप्स नहीं, बल्कि रोजगार की गारंटी और सही स्किलिंग की जरूरत है।

मिस्ड ऑपर्च्युनिटी: सिद्धांतों से आगे कंक्रीट एक्शन की दरकार

अंत में, यह समिट एक “मिस्ड ऑपर्च्युनिटी” की तरह नजर आती है। दुनिया को एकजुट करने के बजाय, यह पावर गेम्स और एपस्टीन-गेट्स जैसे स्कैंडल्स की छाया में दब गया। हालांकि दिल्ली डिक्लेरेशन ऐतिहासिक है, लेकिन अगर अगले कुछ वर्षों में कंक्रीट रिस्किलिंग प्रोग्राम और प्राइवेसी सेफगार्ड्स नहीं दिखे, तो यह केवल एक ट्वीट-स्टॉर्म बनकर रह जाएगा।

सच्ची प्रोग्रेस तभी होगी जब ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं, जैसे अफोर्डेबल कंप्यूट और डेटा सॉवरेनिटी को तरजीह दी जाएगी। वरना, AI का भविष्य केवल कुछ सुपरपावर्स के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएगा।

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